पुराने मैसेज फॉरवर्ड करने वालों तुमको ‘दिवाली मुबारक नहीं’

Posted on October 30, 2016 in Hindi, Society

सुबह जब आखें मलता हुआ उठता हूं और आधी खुली आंखों से ही फोन की खुली खिड़की से झांकता हूं तो 15 से 20 दिवाली की बधाइयां होती हैं। 20 में से 16 मैसेज में कोई GIF या वीडियो फाइल होती हैं, जो कि मैं दूसरी से पंद्रहवी मर्तबा देख रहा होता हूं। ये अमूमन उन लोगों के द्वारा भेजे मैसेज होते हैं जो एक ही मैसेज को अपनी पूरी कॉनटैक्ट लिस्ट में निःस्वार्थ रूप से  ब्रॉडकास्ट कर देते हैं। इनकी मेहेरबानी से इन 16 में से 4 मैसेज तो ऐसे नंबरों से आये होते हैं जो कि मैं कभी सेव करना ज़रूरी नहीं समझता और इनकी पहचान जानने के लिए मुझे या तो पहले की बातचीत पढ़नी पड़ती है या इनकी तस्वीर को गौर से जांचना पड़ता है।

बाकी दो मैसेज अंग्रेज़ी में लिखे पुश्तैनी मैसेज होते हैं, यानी कि वो इस धरती के बनने से आज-तक यूं ही हमारे परिवेश में घूम रहे हैं। ये वो सन्देश हैं जो या तो लोगों को समझ नहीं आये, या फिर इतने समझ आ गए कि आख़िरकार किसी ने उनसे छेड़छाड़ करना ज़रूरी नहीं समझा। बाकी आखरी बचे 2 मैसेज में से एक अपनी हिंदी के ज्ञान को बघारता हुआ या सृष्टि की संरचना से वक़्त से स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा छोड़ा हुआ, अंग्रेज़ी के मैसेज का भाई लगता है। अगर हम अपने पुराण ठीक से खंगाले तो ऐसे 2 मैसेज भाइयों की कहानी निस्संदेह मिलेगी।

दिवाली

कुछ मैसेज पैकेज के साथ आते हैं, यानी धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन और भाई-दूज की एक साथ बधाई। ऐसे लोगों का बस चले तो करवाचौथ की भी बधाई दे डालें। इन सब मैसेज के अलावा कुछ मैसेज ऐसे भी होते हैं जो शहरी समूहों के अन्दर आवारा से छोड़ दिए जाते हैं, जिन-जिन को वो अपने से लगते हैं, वो गोद ले लेता है।

ये सब पढ़ के कुछ मैसेज का जवाब मैं तभी लिखने लग जाता हूं और आधे में ही उकता के सोचता हूं कि जब वक़्त मिलेगा तब ही लिखूंगा, या फिर मैं सब को ऐसा ही कोई सन्देश ब्रॉडकास्ट करके जमात का एक आदर्श हिस्सा बन जाता हूं, या फिर अपनी स्थिति या ‘status’ को बदल के Happy Diwali कर देता हूं।

अगर आपको पढ़ने की आदत है तो शायद आपने ये नोटिस किया हो कि हम कई बार ऐसी किताबें लेकर आ जाते हैं जो सीधा बुक शेल्फ में जगह बनाती हैं, कभी हाथो में नहीं आती हैं। आज जब भागती ज़िन्दगी से थोड़ा सा वक़्त मिला है तो मैं आपको सीधे शब्दों में यह कहना चाहता हूं कि मुझे ये किताबें नहीं चाहियें। अगर आप उपमाएं और रूपक समझने में चुनौती महसूस करते आयें हैं तो स्पष्ट करने के लिए कह दूं कि मेरी तरफ से आपको दीपावली मुबारक नहीं है। मैं ऐसी किसी भी भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहता। मैं भी अपने दिमाग से शहरी हूं और इसलिए ये भली भांती रूप से समझता हूं कि दिवाली के धुएं में आकर किसी को दिवाली की मुबारकबाद देना आज सात समंदर लांघने से कम नहीं है और मैं ये किसी से उम्मीद भी नहीं करता (मगर ऐसे कुछ हनुमान भी हैं जो ऐसा काम दिन में एक बार नहीं, कई बार कर जाते हैं)।

मगर आप अगर सही में मुझे दीपावली की बधाई देना चाहते हैं तो पांच मिनट कि एक कॉल तो कर सकते हैं? पांच मिनट कहा, 2 मिनट ही क्योंकि मुझे आपसे वो मोबाइल वाला मैसेज या फिर ‘आपको 15 और लोगों से बात करनी है’, ये कतई नहीं सुनना। दोस्त मैं आपको मुबारकबाद देना चाहता हूं, हाल और हालात सुनना चाहता हूं, कुछ कहना चाहता हूं,कुछ सुनना भी चाहता हूं। मैं जानना चाहता हूं कि तुम कैसे हो? ज़िन्दगी में क्या कर रहे, क्या करना चाहते हो? किस चुनौती को कैसे सुलझा रहे हो, तुम्हारी खैरियत और तुम से अपनी खैरियत चाहता हूं। तुम्हें कम से कम फोन से ही, दिल से गले लगाना चाहता हूं, क्या ज्यादा चाहता हूं?

अगर आप ध्यान से देखें तो ये पायेंगे कि तरह-तरह के त्यौहार ज़िन्दगी में इंसान ने इसीलिए बनाए हैं ताकि हम एक सी चलती ज़िंदगी में थोड़ा सा रुकें, किसी बरगद तले बैठें, घर की बनायी रोटी बाटें, थोड़ी सी ज़िन्दगी बाटें, कंधे पर लटकी टेंशन की पोटली को थोड़ा हल्का करें,  कुछ देर के लिए ही सही मगर ज़िन्दगी जियें। इसलिए आप से एक गुज़ारिश है, इस बार की दिवाली, ईद, क्रिसमस या नानक पर्व को किसी काम की तरह ना लें। उसे मनाएं, उनके साथ जो आपके लिए एहमियत रखते हैं, दोस्तों से दिल कि ख़ुशी बाटें, ऐसे कुछ लम्हें बनाएं जो बूढ़े हो कर याद कर सकें। और अगर ऐसा कुछ नहीं करना चाहते तो अपनी ज़िन्दगी की असल खुशियों की तरह मेरी बातों को भी नज़रंदाज़ कर दें मगर मेरी हाथ जोड़ के विनती है कि मुझे दिवाली की मुबारकबाद का मैसेज ना भेजें। वैसे आपके फोन का मुझे इंतज़ार रहेगा और सुनोगे तो तुम्हारे फोन की घंटी भी मैं ज़रूर बजाऊंगा और कहूँगा ‘दिवाली मुबारक हो दोस्त’।

 

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