“BHU सभ्यता और संस्कृति के नाम पर पुरुषवादी सोच का गढ़ बन चुका है”

Posted on October 1, 2016 in Campus Watch, Hindi, Specials

 दीपश्री तिवारी:

“काशी हिन्दू विश्वविद्यालय” एक विख्यात नाम है शिक्षा के क्षेत्र में | सर्व विद्या की राजधानी का तमगा ऐसे ही नहीं प्राप्त होता किसी भी शिक्षण संस्थान को। एक मुकाम है ये जिसे हासिल करना पड़ता है| अब तो इस संस्थान ने अपने 100 वर्ष भी पूरे कर लिए हैं| इस विश्वविख्यात संस्थान में जब कोई विद्यार्थी प्रवेश करता है तो कितनी आशाएं, कितने सपने, कितनी उम्मीदें होती हैं उसकी आँखों में । लेकिन विश्वविद्यालय का कड़वा सच उनकी आशाओं को तोड़ने में पल भर नहीं लेता।

हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, जहां स्त्रियों को भी पुरूषों के समान संवैधानिक आज़ादी,समान अवसर एवं संभावनाएं प्राप्त है। भारत देश जहां संविधान की सर्वोच्चता है , वहीं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सभ्यता और संस्कृति के नाम पर पुरुषवादी मानसिकता का गढ़ बना हुआ है । महिला महाविद्यालय (MMV) जो कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का एक अभिन्न अंग है, यहां आपको लैंगिक विभेदता (gender discrimination) का एक अच्छा उदाहरण मिलेगा। सम्माननीय कुलपति महोदय के अनुसार “लड़कियों का रात्रि अध्ययन ही अव्यवहारिक है”

छात्राओं को शाम 8 बजे के बाद MMV परिसर के अन्दर बंद कर दिया जाता है । रात 10 बजे के बाद छात्राओं को परिसर के अंदर ही दूसरे छात्रावास में जाने की अनुमति नहीं होती । छात्रों के साथ ऐसा कोई नियम नही है। छात्राओं का माँसाहार खाना मालवीय-मूल्यों के खिलाफ है पर छात्र इन मूल्यों से परे हैं।ये कैसी नाइंसाफ़ी है ? सिर्फ इसलिए की हम औरते हैं । छात्राओं के किसी भी छात्रावास में wifi या LAN की सुविधा नहीं दी गयी जबकि प्रत्येक छात्रों का छात्रावास पूर्णतः wifi सुविधायुक्त है। MMV में professors की नियुक्ति भी समय पर नहीं होती। आज जो दिखता है वही बिकता है इसलिये विश्वविधालय अपने प्रॉस्पेक्टस में तो MMV सारी सुविधाओं से परिपूर्ण बताता है । website पर भी आपको देखकर पता नहीं चलेगा कि ऐसा लैंगिक विभेद यहां है और चर्मोत्कर्स पर है।

अभिव्यक्ति का अधिकार जो हमारी मौलिक आज़ादी है वो भी हमे यहां अनुपस्थित दिखाई पड़ती है। यहां आप अपनी मांगे प्रशासन के सामने नहीं रख सकते, विरोध तो बस सपनों में कर सकते हैं। आपने किसी अनुचित कार्य का विरोध किया तो आपको छात्रावास से निलंबित करने की धमकी दी जाती है। छात्रावास आबंटन के समय ही बच्चों और उनके अभिभावकों से एक शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर करा लिया जाता है,जिसमे ये लिखा होता है कि अगर आपकी पुत्री किसी भी प्रकार के विरोध प्रदर्शन में शामिल होती है तो उसकी छात्रावास सीट निरस्त कर दी जायेगी।

संस्कृति और सभ्यता के नाम पर अगर हमसे हमारे मूलभूत अधिकार छीन लिए जाएं तो हमें नहीं चाहिए ऐसी संस्कृति। हम अपनी नई संस्कृति बना लेंगे । एक स्त्री ये नहीं चाहती की वो देवी की तरह पूजित हो बस वो चाहती है आप उसे अपने तुल्य इंसान समझें। यहां जब लड़कियां खुद को सुरक्षित महसूस न करें 8 बजे के बाद गेट के अंदर बंद कर दी जाएँ तो अन्य जगहों से हम क्या आशा करें।ऐसे विभेद, ऐसी असमानता ऐसा अत्याचार बंद करिये । आज हमको अधिकार मिलें हैं उस आज़ादी को जीने तो दीजिये। काशी हिन्दू  विश्वविधालय उन अधिकारों का गला घोट रहा है। इसलिए आज भी गुलज़ार की दो पंक्तियां सच ही जान पड़ती हैं।
“कितनी गिरहे खोली हैं मैंने कितनी गिरहे बाकि हैं”

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