धनतेरस के वादे पर फूट रहा है महंगाई बम

Posted on October 22, 2016 in Culture-Vulture, Hindi, Specials

विवेकानंद सिंह:

उर्दू में एक बड़ी मशहूर कहावत है – ‘कबाब में हड्डी’! अब सोचिए पूरे साल आपने अपनी बेगम से वादा किया हो कि इस धनतेरस आपके लिए जरूर कुछ खास रहेगा।

आप दुकान जाकर उस खास चीज की कीमत भी पता कर आये हों। लेकिन, जब आप उसे पैक करवाने पहुंचें, तो पता चले की उसकी कीमत एकाएक बढ़ गयी। साहब, उसके बाद जो आपको फीलिंग आयेगी, उससे आपको उस हड्डी का पता चल जायेगा।

भारत में मंहगाई को जांचने के लिए कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) है। इसके अलावा भी कई इंडेक्स हैं, लेकिन मोटे तौर पर खुदरा कीमतों में वृद्धि और कमी का सूचकांक सीपीआई रेट ही तय करते हैं।

पिछले महीने यानी सितंबर में ही इस इंडेक्स का हनीमून पीरियड शुरू हुआ और यह 5.5 प्रतिशत से घट कर साल के सबसे निचले पायदान 4.3 प्रतिशत तक जा पहुंचा। सबकुछ ठीकठाक चल रहा था, मॉनसून को भी अच्छा माना जा रहा था, लेकिन, अचानक दलहन, तिलहन, धातु, खानेवाले तेल, ईंधन की कीमतों में वृद्धि ने सारा खेल ही बिगाड़ कर रख दिया है।

रघुराम राजन का कार्यकाल पूरा होने के बाद नये आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने 04 अक्टूबर को रेपो दरों में .25 बेसिस की कटौती का निर्णय लिया और 20 अक्टूबर तक आते-आते चना, आटा, सरसों तेल जैसी बुनियादी चीज़ों की कीमतें बढ़ गयी। हो सकता है, इन दोनों तथ्यों का आपस में कोई लेना-देना न हो, लेकिन मंहगाई में हुई वृद्धि आम आदमी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। मकान लेने के लोन सस्ते जरूर हुए हैं, लेकिन रोटी मंहगी हो रही है।

यह मंहगाई सरकार की मौद्रिक नीति पर भारी पड़ सकती है। डिपार्टमेन्ट ऑफ़ कंज्यूमर अफेयर्स के आंकड़े (दिल्ली में) बताते हैं कि 20 अक्टूबर 2015 को चना की कीमत जहाँ 71 रुपये प्रति किलो थी, वह 20 अक्टूबर 2016 तक 136 रुपये प्रति किलो हो गयी। यानी कि साल भर में 90% से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गयी है। वहीँ चीनी की कीमत तब 31 रुपये प्रति किलो थी, जो अब बढ़ कर 43 रुपये प्रति किलो हो गयी है। यही हाल तेल की कीमतों का भी है।

कई बार तो मुझे उपभोक्ता सामानों की कीमत देख कर मंहगाई दर के आंकड़ों पर ही संदेह होने लगता है। लेकिन ऐसे समय में, जब उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चुनाव है और पर्व-त्योहारों का समय चल रहा है। यह मंहगाई मुझे कबाब में हड्डी-सी चुभ रही है।

शायद आपको भी चुभ रही है। शायद मेरी तरह आपको भी अच्छे दिनों के वादे पर संदेह हो रहा हो। फिर भी उम्मीद करते हैं कि उर्जित पटेल जी और सरकार अपनी मौद्रिक नीतियों के जरिये मंहगाई को नियंत्रित करेगी। अगर, नहीं करेगी, तो फिर झेलते रहिए हड्डी।

 

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