भाई भतीजा ठीक है लेकिन मुलायम के युवराज बस अखिलेश हैं

Posted on October 26, 2016 in Hindi, News, Politics, Specials

केपी सिंह:

समाजवादी पार्टी के महासम्मेलन में शिवपाल सिंह यादव ने अखिलेश के खिलाफ जब यह कहा कि वे गंगाजल और अपने इकलौते पुत्र की सौगंध उठाकर कहते हैं कि अखिलेश ने मुझसे यह कहा था कि वे अपनी अलग पार्टी बनाएंगे या किसी दूसरी पार्टी से मुख्यमंत्री का चेहरा बन जाएंगे, तो अनुभवी होते हुए भी वे नादानी की पराकाष्ठा कर रहे थे। वे यह भूल गए कि चाहे वह हों या अखिलेश, समाजवादी पार्टी में कद्दावर राजनीतिक हैसियत में हैं तो इसलिए कि वे सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह का परिवार हैं। वे मुलायम सिंह जिनकी निगाह में उत्तर प्रदेश की सियासत उनकी पुश्तैनी जागीर है जिसमें निर्णायक हैसियत उन्हीं के खानदान के लोगों की हो सकती है।

निश्चित रूप से यह राजवंशी मानसिकता का सूचक है लेकिन राजवंशी परम्परा के कुछ नियम हैं जिसमें सत्ता का उत्तराधिकार सम्राट के बेटे को ही है भाई या परिवार के किसी भी और घनिष्ट सदस्य को नहीं। इसी संविधान के चलते विपक्ष में सपा के नेता विधानमंडल की भूमिका का लगातार निर्वाह करने के बावजूद पार्टी का बहुमत आने पर मुलायम सिंह ने शिवपाल के बजाय अपने पुत्र अखिलेश को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी। सपा में कोई पार्टी सिस्टम नहीं है। यह पार्टी मुलायम सिंह की जागीर है इसलिए उनका बेटा गुस्से में पार्टी के लिए या उनके लिए कुछ भी कह दे लेकिन विरासत पर हक उसी को मिलेगा।

इसीलिए मुलायम सिंह ने उनके रहस्योद्घाटन पर कोई गम्भीरता नहीं दिखाई जबकि शिवपाल सोच रहे थे कि मुलायम सिंह अखिलेश के पार्टी का गुनहगार होने के सबूत सामने आऩे के बाद रामगोपाल की तरह उन्हें भी सबक सिखाने के लिए बिफर जाएंगे। सगा भाई हो या चचेरा भाई हो उसका पार्टी का अहित करने का दुस्साहस तो नाकाबिल-ए-बर्दाश्त होगा लेकिन युवराज पर यह कानून लागू नहीं किया जा सकता। अब स्थितियां धीरे-धीरे स्पष्ट होती जा रही हैं कि मुलायम सिंह सब कुछ अखिलेश के करियर की सुरक्षा के लिए कर रहे हैं। अगर वह अखिलेश को खुले मंच से डांटते-फटकारते हैं तो इसकी वजह किसी भाई के प्रति उनका प्रेम नहीं है, इसके पीछे उनके घरेलू द्वंद्व का एक और कोण है।

अखिलेश पर इस तरह दबाव बनाने का उनका एक ही मकसद रहा है कि वे अपनी सौतेली मां साधना और उनके बेटे प्रतीक के आर्थिक हितों में कोई समस्या पैदा न करें। अखिलेश खेमा भी मुलायम सिंह की बौखलाहट की जड़ समझ चुका है इसीलिए सोमवार को दिन में पार्टी दफ्तर में हुए घमासान के बाद रात में टेलीविजन चैनलों पर यह खुलासा आ गया कि प्रतीक को मुलायम सिंह ने भले ही अपने पुत्र के रूप में अपना लिया हो पर सीबीआई रिक़ॉर्ड में पहले से यह दर्ज है कि वे मुलायम सिंह के नहीं चंद्रप्रकाश गुप्ता के जैविक पुत्र हैं। इस खुलासे से सपा की असली ताकत यादव बिरादरी को यह संदेश चला गया कि मुलायम सिंह की प्रतीक के लिए जरूरत से ज्यादा चिंता और हठधर्मिता मान्य नहीं की जा सकती चूंकि वह घर और बिरादरी दोनों का सगा नहीं है।
हालांकि जैसे ही प्रतीक के बारे में उक्त रहस्योद्घाटन की खबरें टीवी चैनलों पर चलना शुरू हुईं वैसे ही मैनेज करने वाली कम्पनी सक्रिय हो गई। इसका असर कुछ ही देर में सामने आ गया जब यह सनसनीखेज खबर अचानक सभी चैनलों पर ब्लैक आउट हो गई। इससे मीडिया कितनी बेकाबू हो चुकी है, यह हकीकत एक बार फिर नुमाया हुई है।

बहरहाल इस तीर ने नेताजी को भी बुरी तरह विचलित कर दिया। इससे वह मंगलवार को बैकफुट पर पहुंच चुके थे। उनकी प्रेस कांफ्रेंस के पहले टीवी चैनलों पर अखिलेश द्वारा हटाए गए मंत्रियों की नेताजी के फरमान से वापसी की खबरें सुर्खियां बनी हुई थी। साथ-साथ मुलायम सिंह की प्रेस कांफ्रेंस में अखिलेश के भी मौजूद रहने की खबर को असंदिग्ध सूचना के बतौर सभी चैनलों पर बार-बार दिखाया जा रहा था। लेकिन जो हुआ वह एंटी क्लाइमेक्स का इंप्रेशन देने वाला था। नेताजी की प्रेस कांफ्रेंस में आना अखिलेश ने कतई गवारा नहीं किया। दूसरी ओर मुलायम सिंह बेटे की इस बगावती अदा के सामने सरेंडर मुद्रा में दिखे। मुलायम सिंह जब प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों के इससे जुड़े सवालों का सामना कर रहे थे उनके बेहद नरम और हल्के अंदाज से शिवपाल सिंह एंड कम्पनी के चेहरे पर डिप्रेशन की मनःस्थिति के अख्श उभरते साफ देखे जा रहे थे। शिवपाल खेमा सोमवार को बहुत आक्रामक था लेकिन मंगलवार को मुलायम सिंह को पैंतरा बदलते देख वह उतना ही पस्त दिखाई देने लगा।

प्रेस कांफ्रेंस में मुलायम सिंह के सुर और अंदाज में ज़मीन-आसमान का परिवर्तन था। उन्होंने इसी के तहत कहा कि अखिलेश सीएम रहें इस पर क्या पार्टी या परिवार में कोई आपत्ति की खबर आपको मिली है। उन्होंने शिवपाल वगैरह की ओर इंगित करके जब यह सवाल उछाला तो शिवपाल ठगे से रह गए। उन्होंने मुख्यमंत्री पद की कमान उनके द्वारा संभालने की शिवपाल की मंशा पर भी इससे जुड़े सवाल आने पर बहुत खूबसूरती से पानी फेर दिया। उन्होंने कहा कि अब दो-ढाई महीने के लिए वह मुख्यमंत्री क्यों बनें, जब इस बीच चुनाव आचार संहिता लागू होने की वजह से मुख्यमंत्री और मंत्री कर्मचारियों को तनख्वाह बंटवाने के अलावा कोई काम करने की हालत में नहीं रह जाएंगे। अखिलेश को अगली बार भी मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में पेश करने के सवाल पर भी उन्होंने बेहद सियासती जवाब दिया। ऊपरी तौर पर तो यह नज़र आया जैसे उन्होंने अखिलेश की दावेदारी पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया हो लेकिन इसमें वे प्रक्रिया का हवाला देने लगे जिससे उनका मंतव्य पूरी तरह डाईल्यूट हो गया। उनकी इस मामले में कलाबाजी का निहितार्थ हर समझदार आदमी ने पढ़ लिया कि सपा के भविष्य के रूप में उन्होंने अखिलेश का नाम तय कर दिया है। शिवपाल के लिए मुलायम सिंह के यह तेवर बहुत बड़े झटके की तरह रहे होंगे।

मुलायम सिंह ने सार्वजनिक प्रदर्शन में मंगलवार को अखिलेश के सम्बंध में एक और भूल सुधार करने की चेष्टा दिखाई। सोमवार को उन्होंने अखिलेश के व्यक्तित्व और यूपी के मुख्यमंत्री के पद की वजनदारी को ठेस पहुंचाने में अनजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी जबकि वे यह सियासी बिसात की तौर पर कर रहे थे लेकिन जब उन्हें यह अहसास हुआ कि यह उनकी निंदा और अखिलेश के करियर की नुकसान की बहुत बड़ी चूक थी तो उन्होंने मंगलवार को इसकी भरपाई करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में तू-तड़ाक की बजाय सीएम और अपने बेटे को बार-बार अखिलेश जी के संबोधन से नवाज़ा। साथ ही मुख्यमंत्री का अथॉरिटी को फिर से बहाल करने का प्रयास करते हुए कहा कि हटाए गए मंत्रियों को दोबारा कैबिनेट में शामिल करने या न करने का अधिकार सीएम को है, इसलिए इस बारे में जो पूछना है वह सीएम से पूछें।
इस तरह मुलायम सिंह ने पारिवारिक सत्ता संघर्ष का पटाक्षेप अखिलेश को निरापद रास्ता देते हुए कर दिया है। हालांकि उन्हें पता है कि यूपी में सपा का बैंड बज चुका है जिसके कारण अगले वर्ष होने वाले चुनाव में पार्टी की सत्ता में वापसी की उम्मीद बहुत कम रह गई है। लेकिन शायद उन्हें इस बात पर संतोष है कि पारिवारिक संघर्ष में निर्णय लेने की क्षमता दिखाकर उनके बेटे ने अपनी छवि को स्वतंत्र तौर पर इतनी मजबूती से स्थापित किया है कि वे प्रदेश की जनता में अक्षुण्य विकल्प के रूप में जगह बना चुके हैं।

रामगोपाल अपने को अखिलेश के बैरम खां के रूप में सायास प्रयास कर उनके व्यक्तित्व के स्वतंत्र विकास में अड़ंग लगाए हुए थे जिनका इलाज मुलायम सिंह ने अपने तरीके से कर दिया। लेकिन मुलायम सिंह अखिलेश के दूसरे चाचा शिवपाल के मामले में भी गफलत नहीं कर रहे। जैसा कि लग रहा है सपा नये चुनाव के बाद अगले पांच वर्षों तक विपक्ष में बैठने को मजबूर होगी और ऐसी हालत में अखिलेश तो विकल्प के रूप में अपनी हैसियत बरकरार रख पाएंगे लेकिन शिवपाल स्वतः खत्म हो जाएंगे। जिससे अखिलेश का भविष्य पूरी तरह निष्कंटक हो जाएगा।

मंगलवार की प्रेस कांफ्रेंस में भी मुलायम सिंह ने यही दोहराया कि 2012 में लोगों ने अखिलेश नहीं उनके नाम पर सपा को वोट दिए थे लेकिन यह भी हकीकत है कि उन्हें अपने अंदर कहीं न कहीं यह अहसास है कि नयी पीढ़ी नए ज़माने में अखिलेश ने जो स्वीकार्यता बनाई है उसी की बदौलत पार्टी को स्पष्ट बहुमत की ताकत मिली। इस बीच हालिया घटनाक्रम ने उनके तिरस्कार ने अखिलेश की इमेज बिल्डिंग में टॉनिक का काम किया। उनके इसी तिरस्कार की बदौलत अखिलेश को अपनी फॉ़लोइंग विस्तारित करने का मौका मुहैया हुआ है। अखिलेश के प्रति अब जो समर्थन है वह उनके पुत्र की वजह से नहीं है। अखिलेश को प्रदेश की कोढ़ बन चुकी राजनीतिक कुरीतियों के उन्मूलन में अवतार के रूप में तस्दीक किया जा रहा है। इस नाते आज प्रदेश में सत्ता के खिलाड़ियों में उनका नाम सबसे वजनदार हो गया है। अखिलेश की इस उपलब्धि से मुलायम सिंह में तृप्ति भाव है। इस आंकलन में गलत क्या है।

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