मोहम्मद की रामलीला: आज राम होते तो क्या धर्म का भेद करते?

Posted on October 10, 2016 in Hindi, Politics, Society

मुकुंद वर्मा:

सीधे मुद्दे पर आने से पहले एक बैकग्राउंडर ले लीजिए थोड़ा कहानी के तरीके से। 10 साल का एक लड़का, एक छोटे से शहर का रहनेवाला। पढ़ाई में ज़्यादा तेज़ नहीं था, लेकिन बाकि चीज़ों में सबसे आगे। अपने शहर में होनेवाले हर नाटक, नौटंकी में पार्ट लेता और ऐसा ज़बरदस्त एक्टिंग करता कि देखने वाले वाह-वाह करते। धीरे-धीरे उसका नाम उस छोटे से शहर से निकल कर बड़े शहरों में होने लगा, फिर पूरे देश में। लोग उसके अभिनय का लोहा मानने लगें।

फिर एक दिन उसे एक रामलीला में एक्टिंग करने का मौका मिला। निभाना था उसे राम का किरदार। एक चुनौती थी उसके सामने राम बनकर लोगों के सामने जाने का, और उनके दिलों में उतर जाने का। रोल मुश्किल था लेकिन वो भी कहाँ हार मानने वाला था।

स्टेज तैयार था और राम की एंट्री होने ही वाली थी की तभी कुछ शोर हुआ। पता चला कुछ धर्म के ठेकेदार आये हैं और अपने को रामभक्त तो कहते हैं लेकिन रामलीला रुकवाने आये हैं।
“बंद करो, बंद करो, ये रामलीला बंद करो,”
किसी ने पूछा, “कौन हो भाई तुमलोग?”
“हम हैं जनता के सेवक।” शोर ने शोर किया।
“कहाँ से आये हो?”
“दिल्ली से।”
“क्या चाहते हो?”
“हम ये रामलीला रोकने आये हैं।”
“मगर क्यों, तुम्हारा राम से क्या बैर?”
“बैर राम से नही है, लेकिन एक मुसलमान राम नही बन सकता.”

“और क्या ये खुद श्रीराम कह कर गए हैं?”

“फालतू बातों के लिए हमारे पास वक़्त नही है, बंद करो ये रामलीला.”

“लेकिन राम ने तो…..”

समाज शराफत से कहता रहा लेकिन ठेकेदार तो ठेकेदार ठहरे। रामलीला रुकवा दी गयी। राम के कपड़े पहने मोहम्मद से कपड़े उतरवा लिए गए। एक कलाकार को नंगा कर दिया गया। लेकिन दरअसल नंगा कलाकार नहीं हुआ था, नंगा समाज हुआ था, ठेकेदारों के हाथों।

रामलीला किसी धर्म से ज़्यादा हमारे समाज का प्रतीक है। डायलॉग्स भले राम के हो, लेकिन माइक टेस्टिंग कोई इरफ़ान या गुलाम भी कर के देता है। कपड़े सीता के हो लेकिन वो किसी इम्तियाज़ या रहमान टेलर मास्टर के हाथों भी सिल कर निकलते हैं। प्रसाद भले राम का हो, जिन बर्तनों में वो बनता है, वो किसी अज़हर या शमीम कैटरिंग वाले के यहाँ से भी आते हैं।

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी हमारा पड़ोसी है। कहीं पाकिस्तान में वो रामलीला नहीं कर रहे थे, उनका अपना घर था बुढ़ाना, जहाँ वो पले-बढे हैं, जहाँ की मिटटी की ऐसी खुशबू है की उनका बचपन से सपना था रामायण में मारीच बनने का। एक कलाकार को आपने सरेआम तमाचा मारा है, एक बच्चे के बचपन का सपना तोड़ा है।

मुझे पता है आप राम को नहीं जानते, न उनके बारे में पढ़ा है, नहीं तो जिस राम की रामलीला आप रुकवा रहे हैं, ये वही राम है जिन्होने शबरी के जूठे बेर खाए थे, ये वही राम है जिन्होंने रावण के सामने अपना सर झुका कर आशीर्वाद माँगा था, ये वही राम हैं जिन्होंने अपने वनवास का दोषी न किसी को ठहराया न किसी से बदला ही लेने का सोचा। आज राम होते तो नवाज को गले लगा लेते, और लक्ष्मण के समकक्ष उनको खड़ा करके भाई बना लिया होता। अच्छा हुआ आज राम नहीं है, नही तो क्या पता, ये धर्म के ठेकेदार आज उनको फिर किसी और वनवास पर भेज दिए होते। और क्या आज के दौर में राम होते तो वो भी धर्म का भेद करते?

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