“सर वो मुसलमान है, मुसलमान तो आतंकवादी होते हैं”

Posted on October 31, 2016 in Hindi, Human Rights, Specials

बात 19 अक्टूबर 2016 की है जैसे ही मैंने ट्यूटोरियल में विद्यार्थियों-शिक्षकों/शिक्षिकाओं से चर्चा शुरू करने के लिए कहा वैसे ही एक विद्यार्थी-शिक्षक ने 18 अक्टूबर को स्कूल विज़िट के दौरान हुए अपने एक अवलोकन का बयान करना शुरू कर दिया। मैंने यह कहते हुए उसे रोकने की कोशिश की कि स्कूल-अवलोकन पर चर्चा वह अपने मेंटर के साथ करे, ट्यूटोरियल में हम किसी और मुद्दे पर बात करेंगे। लेकिन उसने यह कहते हुए अपना पक्ष रखा कि वह “कल” से बहुत परेशान है और उस अवलोकन पर बात करना चाहता है। उसकी परेशानी को भांपकर मैंने उसे उसके द्वारा किए गये अवलोकन को प्रस्तुत करने की अनुमति दे दी।

उसने जो बताया उसका सार निम्नलिखित है:

18 तारीख को स्कूल-अवलोकन के दौरान वह छठी क्लास में गया और उस क्लास के विद्यार्थियों के साथ परिचय बढ़ाने के मकसद से एक विद्यार्थी से उसका नाम पूछा। उस विद्यार्थी ने अपना नाम अरमान बताया। विद्यार्थी-शिक्षक ने उसके नाम की तारीफ़ करते हुए परिचय को आगे बढ़ाया और कहा –“अरे वाह! बड़ा सुंदर नाम है” उसकी बात को सुनकर आस-पास खड़े अन्य विद्यार्थियों में से एक बोला –“किस बात का सुन्दर सर ?” उसकी प्रतिक्रिया का कारण जानने के मकसद से शिक्षक ने प्रतिक्रिया देने वाले उस विद्यार्थी से सवाल पूछा “क्यों सुन्दर क्यों नहीं है ?” इसके जवाब एक दूसरा ही विद्यार्थी बोला कि – “यह तो मुसलमान है ।” इस बात पर शिक्षक ने पूछा– मुसलमान है तो क्या हुआ ?  इसके जवाब में आस-पास के विद्यार्थी एक साथ बोल उठें, “मुसलमान तो आतंकवादी होते हैं”।

अभी तक तो वह अकेला ही इस परेशानी को झेल रहा था, लेकिन अब हमारा पूरा समूह भी उसके द्वारा महसूस की जा रही परेशानी की गिरफ्त में आ चुका था।

कहाँ से आ रहा है इतना ज़हर ? कौन फैला रहा है यह ज़हर ? कौन हैं जो अपने मकसद में इतने सफल हो रहे हैं ? इतने सफल कि छठी कक्षा के/की लड़के/लडकियाँ अपने साथ पढ़ने वाले, अपनी ही उम्र के किसी लड़के को सरेआम इस कारण से आतंकवादी कह रहे हैं कि संयोग से उसका जन्म किसी मुसलमान परिवार में हुआ। कौन हैं वे लोग और संगठन जिन्होंने मासूमियत की जगह हिंसा की भाषा को नन्हें-नन्हें बच्चे-बच्चियों के ज़हन और ज़ुबाँ पर बैठा दिया है ? वे लोग और संगठन बहुत खतरनाक हैं। वे किसी भी वक्त मेरे और आपके बेटे-बेटी, भाई-बहन को हत्यारा बना देंगे और हमें पता भी नहीं चलेगा कि हमारा अपना प्यारा या हमारी कोई प्यारी हत्यारी बन गयी है।

मेरे ख्याल से शिक्षक और शिक्षिकाओं के समुदाय के सामने इस तरह की चुनौती एक बड़ी चुनौती है।

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