आज भगत का बर्थडे नहीं है, लेकिन ज़रूरत आज भी याद करने की है

Posted on October 24, 2016 in Hindi, History

प्रवीण कुशवाहा:

शहीद भगत सिंह ने फाँसी पर चढ़ने से कुछ समय पहले कहा था -“जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वो पछ्ताते है। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रन्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरुरत होती है , अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को गलत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह जरुरी है कि क्रांती की स्पिरिट ताज़ा की जाय , ताकि इंसानियत की रूह में एक हरकत पैदा हो।”

भगत सिंह जब यह कह रहे थे तो वे इतिहास के सिद्धांतों की गहरी भावना को समझते हुए , अपने समय के बहुत आगे भविष्य के लिये एक अहम सन्देश दे रहे थे। शायद इसी समझ को उन्होंने अपने अंतिम भेंट के समय भी प्रकट किया था जब उन्होंने कहा था कि अँग्रेज़ की जड़े हिल गयी है और 15 साल में वो यहाँ से चले जायेंगे। बाद में काफी अफरा-तफरी होगी तब लोगो को मेरी याद आएगी।
देश की विशेषतः उत्तर भारत की स्थिति को देखते हुए , जब एक ओर प्रतिक्रियावादी शक्तियों की ताकत बढ़ रही है और दूसरी ओर फ़ासिस्ट रुझान पनप रहे हैं और साथ ही साथ इनके पैरानॉयड और विजिलैंटी सोशल वैंडलिस्म को थोप रहे है तो शहीद भगत सिंह के उपरोक्त कथन की सार्थकता स्वतः सिद्ध हो जाती है।

आज हमें पुनः शहीद भगत सिंह के शब्दों का विश्लेषण करने की महज आवश्यकता ही नहीं अपितु समाज व देश की समकालीन परिस्थितियों से खुद निबटारा करने की आवश्यकता है। चाहे वो मामलात देश के आतंरिक समस्याओं (धर्मविवाद , जातिविवाद , वामपंथ व दक्षिणपंथ की आइडियोलॉजीकल कॉन्फ्लिक्टस और इन सब के बीच में कुछ नॉन-आईडेंटिकल विंग की उलझन भरी साइकोफैंसी व चरमराहट भरी उकताती हुई सांझ की फीकी फिसड्डी बड़बोलापन) की हो अथवा पड़ोस के आतंकवाद के ठिकानो की। जवाब और परमानेंट सॉल्यूशन की आवश्यकता है।

मशहूर थियैट्रिक्स पीयूष मिश्रा जी की एक पंक्ति है , “रातों को मोबाइल पे चलती हैं उंगलियां , सीने पे किताब रखके सोये काफी अरसा हो गया।”
अब आग और उकसाती हुयी झनझनाहट साइबर वर्ल्ड में ही रह जायेगी या फोन और ट्विटर – फेसबुक से बाहर भी आएगी और बोलेगी , “कुर्सी है जनाज़ा नही , अगर कुछ कर नही सकते तो उठ क्यों नही जाते “

(बैनर इमेज आभार-फेसबुक)

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.