बचपन की फैंटसी वाली दिवाली Vs. मोरालिटी वाली दिवाली

Posted on October 30, 2016 in Specials

भास्कर झा:

मैं देखता हूँ कि अचानक ही मेरे चश्में का पावर बढ़ गया है और मेरी आँखों के नीचे जमी सफेद काई मोरालिटी से लसलसा गयी है। उस लस्से को गोल-गोल घुमाते हुये मैं पार्क में घूमने निकल जाता हूँ और देखता हूँ कि छोटे बच्चे पतले पतले (बीड़ी) बम में नन्हीं ख्वाइशों को , जिसे शायद रात भर इस आशा में पाले बिना दूध रोटी खाये सो गए थे, फोड़ने में उतारू हैं। ग़लती से भाई ने बम का पैकेट बालकनी में छुपा दिया था और सीत (मसलन ओंस) के मारे फुस्स हो गया था। पहले एक बच्चा रोया, फिर दूसरा फिर बारी- बारी से सभी बच्चे किसी आंत्रनाद में तानसेन बन पड़े थे। मेरी मोरालिटी (प्री-दिवाली) ने मुझे रोका और मैं उस बच्चे को चुप कराने लगा। बच्चा शायद समझदार था, उसने ग़ौर से मेरी बात सुनी और ज्यों ही मैं मोरालिटी का ज्ञान देते हुए उसे pollution के बारे में बताने को हुआ, वह बच्चा एक दम से चिल्ला पड़ा और उसकी चीख की गूँज ठीक कुछ वैसी ही थी जब मेरे कान के पास एक चॉक्लेट बम फट गया था और मैं आधे घण्टे के लिए सुन्न ही गया था।

मैंने लाख समझाने की कोशिश की लेकिन सब बेकार। मैंने कहा ,’चॉकलेट खाओगे?’ उसने एक भयंकर लुक दी, साथ खड़ा बच्चा बोल पड़ा, ‘मम्मी ने मना किया है,’। मैं समझ गया होशियार बच्चा है। मैंने सोचा पूछ लूँ , ‘मम्मी ने मना नही किया है’ फिर सोचा बच्चे को क्या समझ आएगा? ‘ बच्चा’ काफ़ी अच्छा शब्द है। अद्भुत उम्र और फैंटसी की उड़ान, मैं हर बार, हर पर्व में लौटता हूँ अपने बचपन में। साला (माफ़ी) क्या उम्र है! मुझे आज भी याद है कि कैसे एक चॉक्लेट बम के लिए पूरे दिन धूप में बम्ब को सुखाते थे, धूप में सेके जाने से बम बहुत तेज़ फटता था। पश्चिम बंगाल के छोटे शहर कूचबिहार में उन दिनों ऑप्शन्स कम थे लेकिन जो थे वह ललचाने भर के लिये काफ़ी थे।

बम को जलाकर सबसे ऊँचा फोड़ने की प्रतियोगिता दूसरी अहम फैंटसी थी जिसके चक्कर में कई बार दोस्तों के हाथ जले,कान हव्वा हुआ और गालियां मिली सो अलग। पर जनाब हौसला उस वक़्त भर-भर कर होता है। पापा का वह थैला भरकर पटाखा लाना सब महज़ एक सुखद याद है जिसका रिपीट टेलीकास्ट मुश्किल है। हाँ तो फैंटसी की लहर ऐसी थी कि उस वक़्त पेट भर जाता था पर मन नहीं। हम एक आध बम बचा कर रखते थे, कि दीवाली के अगले दिन शाम को बम्ब फोड़कर सबको जलाएंगे। मुझे दिवाली में बम फोड़ने से ज़्यादा ख़ुशी बचा कर रखने में होती थी।

इन्हीं ख्वाइशों के संग बड़ा हुआ और एक शाम दिल्ली में (जहां ऑप्शन्स अनगिनत हैं) मैं बम फोड़ रहा था और अचानक एक आवाज़ से मैं डर गया, कान सुन्न हो गया और फैंटसी किसी कोने में दुबक गया। खाना खाया और सो गया। सुबह उठा तो देखता हूँ फैंटसी उड़ गया था और एक अजीब सी घबराहट घर कर रही थी। लगा कुछ देर और सो जाता हूँ। कह सकते हैं कि ‘मोरालिटी’ अपने गोद में लिये लोरियाँ गया रहा था। दिवाली के समय आजकल कई सारे वीडियोस ऑन हैं, एक तरफ जहां चाइनीज़ चीज़ों का बहिष्कार हो रहा है वहीं दूसरी ओर क्रैकर फ्री दिवाली का वीडियो और मैसेज धराधर सोशल मीडिया पर चालू है। अब ऐसे में बच्चे और उनकी फैंटसी एक सोच के आगे नतमस्तक हो जाती है। अधर में फसा अपना मन पेंडुलम की तरह झूलता रहता है। और हमें लगता है कि एक बम फोड़ेंगे। बस! मैं देखता हूँ कि ऐसे मैसेज और वीडियो को सब भूल जाते हैं और खूब जम के पटाखा फोड़ते हैं। हाँ यकीनन मैसेजेस हम भी फॉरवर्ड कर देते हैं क्योंकि हम फॉरवर्ड करते हैं, पढ़ते नहीं। पढ़ते तो ऐसी ही फैंटसी के गुब्बारे में उड़कर हमने भी सोचा कि बम फोड़ेंगे, सोचा कई साल हो गए इस साल , वही एक बस!!

मैंने अपने भतीजे से ‘ एक बम’ मांगा और पाया कि उसने भी अपने सारे बम अपने दोस्त को दे दिए थे धूप में सुखाने को और फ़िर बालकनी वाला किस्सा हुआ जिसका ज़िक्र में पहले कर ही चुका हूँ। मैंने पाया कि मेरा भतीजा रो-रो कर माचिस की तिल्लियाँ जला रहा था क्योंकि बम फुस-फुसा कर रह जाता था। मुझे हंसी आई और मेरे फैंटसी ने मुझे फिर गुदगुदाया जब मेरा भांजा मुस्कुराते हुए बोला , ‘ एक अनार जलाएं, मैंने छुपा कर रखी थी’। हम तीनों की फैंटसी अब दौड़ रही था, मोरालिटी ने मुझे फिर सहलाया लेकिन शायद बच्चों की फंतासी के आगे वह चुप था। मैं आपसे कोई अपील नहीं कर रहा बस एक याद साँझा कर रहा हूँ। कुछ दिए जलाउंगा और पेट भर खाऊंगा, बाक़ी फैंटसी की गूँज काफ़ी है।

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