“BHU पर थोपी जा रही है RSS की विचारधारा”

Posted on October 3, 2016 in Hindi, Specials

रौशन पांडेय:

देश के प्रधानमंत्री आज डिजीटल इंडिया व स्मार्ट सिटी पर बात कर रहे हैं,  इंटरनेट की पहुंच अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित करने के वादे हो रहे हैं तथा सरकार द्वारा दुकानों तथा मॉल समेत कई अन्य सेवाओं को 24×7 करने की बात हो रही है। दूसरी ओर पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी का समय 24×7 करने की माँग पर 9 छात्रों का निलंबन कर दिया जाता है।

BHU की पहचान एक बड़े क्षेत्र के लिए गुणवत्तायुक्त शिक्षा को आम लोगों तक मुहैय्या कराने वाले संस्थान के रूप में की जाती है। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि BHU प्रशासन हमेशा से अपने तानाशाही रवैये के कारण आलोचना का शिकार रहा है। अभी के कुलपति महोदय के निर्णयों ने इस तानाशाही रवैय्ये को और मज़बूत किया है। हाल के दिनों में लाइब्रेरी के मुद्दे पर चल रहे आन्दोलन, सेक्शुअल हरास्मेंट के दोषी व्यक्ति को सिर्फ एक ही जाति का होने के कारण चिकित्सा अधीक्षक बना देना, महिला छात्राओं के लिए जारी फरमानों, नियुक्तियों में भ्रष्टाचार एवं वित्तीय अनियमितताएं जैसे मामलों के सामने आने से लगातार यूनिवर्सिटी की छवी धूमिल होती जा रही है

24×7  लाइब्रेरी समेत शैक्षणिक सुविधाओं की मांग करता छात्र समुदाय

यह वर्ष विश्वविद्यालय का शताब्दी वर्ष है। इन 100 वर्षों में शोध के साथ-साथ राजनीति, कृषि, चिकित्सा व तकनीकी समेत हर क्षेत्र में इसका बड़ा योगदान रहा है। निसंदेह किसी भी विश्वविद्यालय की तरह ही इन उपलब्धियों को प्राप्त करने में यहां की शैक्षणिक सुविधाओं का अहम योगदान रहा है। बदलती शिक्षा ज़रुरतों और स्टूडेंट्स की मांग को ध्यान में रखते हुए कुलपतियों ने समय समय पर ज़रूरी बदलाव किए।

पिछले कुलपति के समय साईबर लाइब्रेरी का निर्माण और उसे स्टूडेंट्स के लिए 24×7 उपलब्धता इसी कड़ी का एक हिस्सा है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों के बड़े तबके को बेहतर और मॉडर्न शिक्षा उपलब्ध कराना था। यह बात सभी जानते हैं कि हॉस्टल से बाहर रहने वाले स्टूडेंट्स को किस हद तक बिजली, पानी और इत्यादि समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसी उद्देश्य से इस लाइब्रेरी का समय 24×7 किया गया। इसी क्रम में छात्राओं की दिक्कतों को देखते हुए गर्ल्स हॉस्टल से लाइब्रेरी तक बस की व्यवस्था की गयी।

नवम्बर 2014 में आए नए कुलपति प्रो. गिरीश चंद त्रिपाठी ने लाइब्रेरी का समय कम कर 15 घंटे कर दिया तथा लाइब्रेरी की उपयोगिता पर ही सवाल खड़ा कर दिया। BHU के कुलपति की नज़र में लाइब्रेरी अय्याशी का अड्डा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि छात्र जिस लाइब्रेरी की मांग कर रहे हैं उसे  विश्वविद्यालय अपने प्रास्पेक्टस में आज भी देने का दावा करता है। विरोध के लोकतांत्रिक तरीकों से भी  प्रशासन पर दबाव बनाने कि कोशिश की गई। छात्रों ने अपनी मांगों के समर्थन में 3000से अधिक हस्ताक्षर कराए, 17 रातें स्ट्रीट लाइट में पढ़ाई कर अपना विरोध दर्ज कराया तथा अंततः प्रशासन की उदासीनता से दुखी होकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का निर्णय लिया ।

भूख हड़ताल के दौरान इस आन्दोलन को समाप्त करने के सारे हथकंडे अपनाये गए। सत्याग्रह कर रहे छात्रों के चरित्र पर सवाल खड़ा किया गया, उनकी मांगों को विश्वविद्यालय के आदर्शों, मूल्यों व परंपराओं के खिलाफ बताया गया, उनके घर फोन कर उनका करियर बर्बाद करने की धमकियां दी गयी तथा उनके धरने कि जगह पर कभी पानी सप्लाई बंद करके, कभी बिजली काटने जैसे हथकंडे अपना कर उन्हें परेशान किया गया।

फोटो आभार- शांतनु, निंलंबित छात्र, BHU
फोटो आभार- शांतनु, निलंबित छात्र, BHU

और अंत में अनशन कर रहे 9 छात्रों को कुलपति ने बिना किसी जांच समिति की रिपोर्ट के ही अपनी “विशेष शक्ति” का इस्तेमाल करते हुए निलंबित कर दिया।

इस पूरी घटना के दौरान छात्रों को अपना पक्ष रखने का भी मौका नहीं मिला। 9 दिनों तक चले इस भूख हड़ताल के 8वें दिन रात को सो रहे 12 छात्रों को पुलिस हिरासत में लिया गया और उनसे ज़बरदस्ती भूख हड़ताल को तुड़वाया गया। ये छात्र कैम्पस के सवालों को लगातार लोकतांत्रिक तरीके से उठाते रहें हैं जिससे ये प्रशासन की आंखो का कांटा बन चुके हैं। हाल ही में हुई मारपीट की घटना में बिना किसी सबूत के लाइब्रेरी आंदोलन मे शामिल इन 9 छात्रों को IPC की 307, बलवा जैसी गंभीर धाराओं में फंसाया गया है।

कैम्पस में लैंगिक भेदभाव ( जेंडर डिस्क्रिमिनेशन) व शोषण

खुद को मालवीय और मानवीय मूल्यों के संरक्षक के रूप में पेश करने वाले कुलपति जी ने लड़कियों का मांसाहारी होना मालवीय मूल्यों के खिलाफ बताकर गर्ल्स हॉस्टल  में मांसाहार (non-veg)  को प्रतिबंधित कर दिया है । छात्राओं व उनके अभिभावकों से छात्रा का किसी विरोध व प्रतिवाद हिस्सा ना होने का affidavit लिखवाया जा रहा है। छात्राओं का रात को लाइब्रेरी में पढ़ना अव्यवहारिक बताया जाता है। कुलपति प्रो त्रिपाठी का यह बयान कि लडकियां अपने फेलोशिप के पैसे से दहेज इकट्ठा करती है, उनकी सोच व  व्यवस्था की सच्चाई उजागर करने के लिए काफी है। कैम्पस में  यौन  शोषण के कई ऐसे मामले सामने आए जिसमे आरोपी पर कार्रवाई करने के बजाय छात्रा के चरित्र पर ही प्रशासन ने सवाल खड़ा कर दिया। प्रगतिशीलता किसी भी विश्वविद्यालय का एक चरित्र है।   छात्राओं को  अगर यहाँ  आकर भी  वही रूढियों का समाज मिले तो सवाल विश्वविद्यालय के उद्देश्य पर भी खड़ा होता है।

कैम्पस में भ्रष्टाचार 

कैम्पस में होने वाली नियुक्तियों में धांधली एक सामान्य सी बात होती जा रही है, नियुक्तियों में आरक्षण के नियमों को दरकिनार किया जा रहा है जिससे एक तरफ सामान्य के तय सीटों से भी अधिक नियुक्तियां हुई हैं वही आरक्षित वर्ग की ढेरों सीटें खाली है।MFA और M.SC (AG) की प्रवेश परीक्षाओं में दो वर्षों से धांधली सामने आ रही है जिसमें कम अंक वाले छात्रों का प्रयोग परीक्षा के लिए चयन और एक ही  क्लास के सभी परिक्षार्थियों के चयनित होने की बात आ रही है वहीं प्रवेश परीक्षा में खुलेआम नकल का वीडियो भी सार्वजनिक हुआ है। कैम्पस में आदर्शों व परंपराओं की आड़ में खुलेआम भ्रष्टाचार हो रहा है जहां पुराने कर्मचारियों को विश्वविद्यालय नियम के अनुसार स्थाई नहीं किया जा रहा, उनके स्वास्थ्य की गारंटी नहीं है तथा उनको पेंशन से भी वंचित रखा गया है । नियमितीकरण की मांग को लेकर 90 दिनों से धरनारत कर्मचारी पिछले 35 दिनों से भूख हड़ताल पर हैं लेकिन उनके स्वास्थ्य परीक्षण के लिए अभी तक कोई टीम नहीं आयी।

कैम्पस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

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फोटो आभार- शांतनु निलंबित छात्र

वह BHU जो कभी सामाजिक व राजनीतिक बदलावों के लिए मुखर रहता था, जिसने आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई आज उसी कैम्पस में न्यूनतम लोकतांत्रिक क्रियाकलाप भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। 1997 के बाद से यहां छात्रों, शिक्षकों व कर्मचारियों को अपनी बात रखने का कोई लोकतांत्रिक मंच नहीं है। कैम्पस में शांतिपूर्ण विरोध, पर्चे व पोस्टर के साथ-साथ किसी सामाजिक व राजनैतिक मुद्दे पर बैठकर बहस करने पर भी पाबंदी है। जहां इस तरह के माहौल में एक तरफ छात्रों को उनके  अभिव्यक्ति की आज़ादी से दूर किया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ संघ की शाखाएं, संघ के नेताओं के कार्यक्रम व भगवा रैलियां प्रशासन के संरक्षण में खुले तौर पर आयोजित कराई जा रही है। कुछ दिन पहले संघ के पदाधिकारी छात्र के कमरे से बम और लोहे की रॉड का मिलना उसको मिलने वाले संरक्षण की पुष्टि करता है। इस तरह पक्षपातपूर्ण नियम कुछ और नहीं बल्कि पूरे देश में एक विचारधारा को थोपने की चल रही मुहिम का हिस्सा है।

यूनिवर्सिटी में इस तरह की व्यवस्था वर्तमान शिक्षा के उद्देश्यों पर भी सवाल खड़ा करती है। विश्वविद्यालय हमेशा से आलोचनात्मक विश्लेषण का केन्द्र रहा है। इसे एक ऐसे संस्थान के रूप में मान्यता प्राप्त है जहाँ से एक प्रगतिशील समाज की बुनियाद रखी जाती है। विश्वविद्यालय के इसी उद्देश्य को पूरा करते हुए छात्र समुदाय के जनतांत्रिक मूल्यों व सामाजिक न्याय के सवालों पर आंदोलनों का एक इतिहास रहा है। इस तरह की स्थिति पिछडे़ सामाजिक रूढ़ियों व विचारों को फलने-फूलने के लिए ज़मीन तैयार करती है। आज शिक्षा पर हो रहे चौतरफे हमलों के बीच कैम्पसों से उठ रही आवाज़े इस देश में शिक्षा बचाने का ही एक संघर्ष है।

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