जब ‘देश’ है तो कोई ‘लावारिस’ कैसे हो सकता है?

Posted on October 18, 2016 in Hindi, Society

दीपक भास्कर:

एक तस्वीर, हमारे ज़ेहन से शायद ओझल हो गयी है। ऐसा तो होना ही है, जब ऐसी तस्वीरें आये दिन, सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती हों। आखिर, हम कितनी तस्वीरों को याद रख पाएंगे? वैसे भी हम इतने बड़े देश हैं, जहां छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं। और जब तस्वीर ‘पाकिस्तान’ की सामने आ जाये, तो बस और कितनी ही तस्वीरों का दफन होना लाज़मी है। लेकिन सच तो यही है कि देश वो होता है जो छोटी सी तस्वीर को भी समझे और उस तस्वीर में अपने को देखे। उस तस्वीर में न दिखने वाली कमियों को गौर से देखे, उसमें रिक्त स्थानों को सुनहरे रंगों से भरे, उस बदरंग तस्वीर को बेहतर तस्वीर बनाने के लिए अंत-अंत तक प्रयास करे।

इसी तरह की एक बदरंग तस्वीर जो आपके ज़हन में कही ओझल हो गयी है उसे याद कीजिये। याद कीजिये झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की उस मरीज़ को, जिसे अस्पताल वालों ने फर्श पर खाना परोसा था। वो भी एक दिन नही बल्कि महीनों से वो जमीन पर फेंका हुआ नहीं, परोसा हुआ खाना खाती थी। हम इतने इंसान तो हैं ही कि कुछ घंटे दुखी हो जाते हैं, फोटो शेयर कर देते हैं और वो वायरल भी हो जाता है। अस्पताल प्रशासन ने मरीज को लावारिस बता दिया और हम शांत हो गए कि वो बेचारी लावारिस है, अगर उसका कोई अपना होता तो महज दस-पंद्रह रूपये की थाली तो ले ही आता। बेशक! जिस देश की अर्थव्यवस्था ट्रिलियन डॉलर में हो, उसमें इतनी छोटी सी रकम की कौन सोचता है।

बहरहाल, अस्पताल प्रशासन का जवाब है कि वो महिला ‘लावारिस’ है, पर सवाल यह है कि जब ‘देश’ है तो कोई लावारिस कैसे हो सकता है? वो महिला इस देश की ‘नागरिक’ है। अगर वह ‘नागरिक’ है तो वो ‘लावारिस’ तो कतई नही है। किसी देश के होते हुए भी अगर कोई व्यक्ति लावारिस है तो वो देश के होने पर सवाल है। प्रसिद्द दार्शनिक ‘प्लेटो’ ने कहा था की राज्य/देश या स्टेट व्यक्ति का ही वृहद् रूप है। प्लेटो के ही शिष्य और राजनीती के पिता कहे जाने वाले दार्शनिक ‘अरस्तु’ ने कहा था कि व्यक्ति स्वंय अपनी जरूरतें खुद पूरा नही कर पाता इसलिए परिवार का निर्माण होता है, परिवार भी सारी आवश्यकताओं को पूरा नही कर पाता तो समाज का निर्माण किया जाता है, समाज भी न कर पाए तो तो व्यक्ति अपने ‘स्वतंत्रता’ का समझौता कर राज्य का निर्माण करता है।

मतलब, जब कोई भी नही, तो राज्य होता है। राज्य ‘संविधान’ के द्वारा चलता है और संविधान में व्यक्ति ‘संख्या’ नही बल्कि ‘नागरिक’ होता है। नागरिक के मूलभूत अधिकार होते हैं और राज्य को उसके मानवाधिकार और आत्मसम्मान की अंत-अंत तक रक्षा करनी होती है। आधुनिक युग के दार्शनिक फुको ने कहा की राज्य गड़रिए की तरह होता है और इसका मुख्य काम नागरिक का ख्याल रखना होता है। तो वो गरीब महिला “लावारिस” कैसे हो सकती है? उस महिला नागरिक का, परिवार नहीं हो सकता है, शायद समाज भी नही हो लेकिन ये देश अथवा राज्य तो उसका अपना ही था।

प्रसिद्द राजनितिक शास्त्री ‘थॉमस हॉब्स’ ने अपनी किताब ‘लेवियाथन’ में राज्य की संकल्पना को एक चित्र के हिसाब से दिखाता है। इसमे हरेक व्यक्ति से ही राज्य का निर्माण हो रहा है और उस तस्वीर की ख़ास बात यह है कि हर व्यक्ति से बना “लेवियाथन” के बृहद शरीर में हर व्यक्ति का चेहरा अन्दर की तरफ है और सर का पिछला हिस्सा ही दिखता है। जाहिर है, हॉब्स के राज्य के सिद्धांत में, “राज्य” ही सब कुछ है और व्यक्ति के लिए माँ-बाप, परिवार और समाज से बढ़कर है। इसी तरह के कई और भी सिद्धांत हैं जिसमें राज्य की संकल्पना ही इसी आधार पर है।

बात साफ है कि किसी भी राज्य में “अनाथ” होना ही उस राज्य के आधारभूत संरचना के ऊपर सवाल है। राज्य/देश की महत्ता कितनी अधिक है यह प्रसिद्द राजनितिक दार्शनिक “रूसो” की कहानी से साबित होता है। उनके बच्चे को उन्होंने पालने से मना कर दिया और कहा की जब हमने राज्य को अपनी सारी शक्तियां दे दीं है तो यह राज्य की जिम्मेदारी है की वह इसे पाले। असल में जब तक राज्य है हम ‘अनाथ’ नही हैं। आधुनिक राज्य/देश ऐसा क्यूँ हो गया है कि जब उसे देशवासी पर ‘शक्ति’ का उपयोग करना होता है तो हर उन शक्तियों का उपयोग करता है, जिसका उपयोग कई बार देश के लोगों के खिलाफ भी हो जाता है। लेकिन जब भी राज्य को उसका कर्तव्य निभाना होता है तो वो व्यक्ति को “लावारिस” कह दिया जाता है।

राज्य, यह कहकर कितनी आसानी से अपना पल्ला छुड़ा लेता है की वो सब कुछ तो नही कर सकता। सच यह है राज्य/देश ऐसा कह ही नही सकता, राज्य को असीम शक्तियां इसलिए ही दी गयी हैं। कुछ लोग यह कह देते हैं कि लोगों के पास काम नही है। जिस देश में लोगों के पास काम नही तो इसका जिम्मेदार राज्य है न की लोग। राज्य/देश कितना जरूरी होता है कि हमारी कमाई का पहला हिस्सा राज्य को ही जाता है न की परिवार को। बहरहाल, कुछ विद्वान राज्य को प्राकृतिक/दैविक संस्था मानते है तो विवेकानंद ने सही कहा था की वो ऐसे भगवान को नही मानते जो गरीबों, विधवाओं के आंसू नही पोछ सकता। कोई ये भी तो कह ही सकता है की जिस देश में ‘नागरिक’ “लावारिस” माने जाते हैं तो वो ऐसे देश को नही मानते और उस सामजिक अनुबंध जिससे राज्य का निर्माण हुआ था, उसे तोड़ रहे हैं।

खैर! इस देश के लिए वो महिला ‘नागरिक’ न होकर ‘लावारिस’ हो लेकिन हम सब के लिए वो तो ‘नागरिक’ ही है। सहज बात यह है कि या तो भारत ‘देश/राज्य’ है और वो महिला ‘लावारिस’ नही, और अगर वो महिला ‘लावारिस’ है तो फिर भारत ‘देश’ नही है। अंत में, एक बार उस तस्वीर को फिर से देखिये और सोचिये। कई बार कुछ तस्वीरें हमारे सोचने का नजरिया बदल देता है।

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