हिन्दू धर्म में मांसाहार

Posted on October 29, 2016 in Hindi

उदित राज ने कहा कि उसेन बोल्ट ने बीफ खाया तो उन्होंने ओलंपिक में नौ स्वर्ण पदक जीते। मैं यह तो नहीं जानता कि किसी खास तरह के भोजन का पदक जीतने के साथ क्या रिश्ता है लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि उदित राज से बहुत पहले विवेकानंद ने मांसाहार और स्वास्थ्य के बीच सकारात्मक संबंध देखा था। वर्ष 1898 में बेलूड़ मठ के निर्माण के समय अपने एक शिष्य के साथ संवाद के दौरान शिष्य द्वारा पूछे गये एक सवाल के जवाब में उन्होंने मांसाहार के सकारात्मक पक्षों को सामने रखा |(परिच्छेद 27. पृष्ठ-230.विवेकानंद के संग.शरच्चन्द्र चक्रवर्ती. रामकृष्ण मठ. नागपुर.1986) शिष्य ने सवाल किया कि “मछली और मांस खाना क्या उचित तथा आवश्यक है?” स्वामीजी ने जवाब दिया “खूब खाओ भाई, इससे जो पाप होगा वह मेरा। तुम अपने देश के लोगों की ओर एक बार ध्यान से देखो तो, मुहँ पर मलीनता की छाया, छाती में न साहस न उल्लास, पेट बड़ा, हाथ-पैरों में शक्ति नहीं-डरपोक और कायर !”

विवेकानंद जी ने मांसाहार को सिर्फ स्वास्थ्य के साथ ही नहीं जोड़ा बल्कि उल्लास और साहस के साथ भी जोड़ा। आप उदित राज को तो ठिकाने लगा सकते हो। लेकिन विवेकानंद का क्या करोगे?

विवेकानंद से भी बहुत पहले ब्राह्मणवादी संगठनों के पितामह मनु ने क्या कहा, ज़रा उसे भी पढ़ लें :

मनु ने लिखा कि मनुष्यों के पितर तिल, चावल से एक महीने तक तृप्त रहते हैं (अध्याय-3.श्लोक 267) मछली के मांस से दो महीने तक, मेंढक के मांस से चार महीने तक और पक्षियों के मांस से पांच महीने तक तृप्त रहते हैं (वही.श्लोक 268), बकरी के मांस से छ: महीने, तथा रुरुनाम हिरण के मांस से नौ महीने तक तृप्त रहते हैं (वही.श्लोक 269), भैसें के मांस से दस, खरगोश और कछुए के मांस से ग्यारह महीने तक तृप्त रहते हैं (वही.श्लोक 270),पितर गैंडे के मांस से अनंत वर्ष तक तृप्त रहते हैं (वही.श्लोक 272)।

अब सोचिए कि इस पितामह का क्या किया जाए, जिसके विधान को ब्राह्मणवादी संगठन भारत का विधान बनाना चाहते हैं और जगह-जगह पर शाकाहार का प्रचार कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में मिड-डे मील से शाकाहार के नाम पर अंडा उठा लिया गया है।

यह बड़े खेद का विषय है कि देश के सामने एक-से-एक बड़ी समस्याएं मुह बाए खड़ी हैं और हम लिलिपुट राज्य की तरह इस बात पर लड़ रहे हैं कि अंडे को आड़ा तोड़ा जाए या खड़ा तोड़ा जाए। देश के खानपान की एकल व्याख्या खतरनाक और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।

(मनुस्मृति का स्रोत: मनुस्मृति. पण्डित रामेश्वरभट्टकृत्या.सम्यक प्रकाशन.2015)

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