’84 दंगों के बाद हर निगाह में हम भी गुनहगार थे

Posted on November 16, 2016 in Hindi, Human Rights, My Story

हरबंस सिंह:

1984 के “ब्लू स्टार” ऑपरेशन और श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या से भड़के दंगों ने हज़ारों सिखों की जान ली। इस नफरत की आग ने सदियों पुराने इंसानियत के रिश्ते को भी दागदार किया। मेरे पापा और ताऊ जी उन दिनों गुजरात रोडवेज़ में ड्राइवर की नौकरी किया करते थे और श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, कई दिनों तक घर पर ही रहे थे। सारा सिख समाज भयभीत था और हमें डर लगा रहता था, शब्दों के तीर लगातार चल रहे थे। घर पर हमें कहा गया था, “अगर कोई कुछ कहे तो सर झुका के चले जाना, किसी को भी पलट के जवाब मत देना।”

इस दौरान ये भी सुना कि “गोल्डन टेम्पल तो आंतकवादियों का गढ़ बन गया है।” यह मेरी छठी कक्षा की हिंदी की टीचर ने कहा था। बारहवीं क्लास के कैमिस्ट्री के टीचर ने भरी क्लास में कहा था “क्या पगड़ा पहन के आ जाते हो।” मुझे कई बार दोस्तों द्वारा “पिंडा” कहकर भी बुलाया जाता था। मैं बस चुप था, लड़ाई करूं तो किससे? सामने वाला चेहरा आखिर है तो मेरी जान पहचान का ही।

लेकिन एक घटना मुझे अक्सर याद आती है, जहाँ चेहरा नही था बस बंदूक की आवाज़ थी। दादा जी की मौत के बाद, पंजाब में गांव के घर पर ताला ही होता था, हम लोग वहां गर्मियों की छुट्टियों में ही जाया करते थे। 1990 की गर्मियों में मैं, मेरा 8 साल का भाई, दादी, पापा और माँ हम सभी पंजाब गये हुये थे। गर्मी के दिन और बिजली का ना होना घर के आंगन में सोने को मजबूर करता था।

हम बस सोने की तैयारी ही कर रहे थे कि घर के पीछे से गोली चलने की आवाज सुनाई दी। हम सब भागकर घर के सबसे बड़े कमरे में इकट्ठे हो गये। बिजली ना होने की वजह से, हमें खिड़की से कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। इतने में गांव के अलग-अलग कोनों से गोलियों की आवाजें आने लगी और एक ट्रक के हॉर्न बजाते हुये जाने की आवाज़ सुनाई दी। मैनें उस दिन जाना की डर क्या होता है।

कमरे की खिड़की से पानी की सुराही बांध रखी थी, लेकिन किसी में हिम्मत नहीं थी कि उसमे से पानी निकल सके। छोटा भाई, प्यास से तड़प रहा था और मेरी ही माँ उसे बड़ी दबी ज़ुबान से चुप करवा रही थी। लेकिन वो ज़्यादा समय तक खुद को रोक ना सकी और हिम्मत कर सुराही से एक गिलास पानी निकाल कर मेरे भाई और मेरी दादी को दिया। घर का आंगन रात के साथ और अंधेरे में डूबता जा रहा था, हवा से हिल रहे झाड़ के पत्ते भी किसी परछाई से लग रहे थे। वो रात इतनी लम्बी हो रही थी कि हम सूरज की पहली किरन को तरस गये थे। जैसे ही सूरज की रोशनी आंगन में उतरी, हमारी सांस एक बार फिर शरीर में बहने लगी।

दूसरे दिन, किसी में इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि पूछे, “गोली चलाने वाला कौन था?” उसने पगड़ी पहनी थी या नहीं? कुछ दिनों बाद अफवाह फैलने लगी कि लुटरे थे। लेकिन उन दिनों किसी में इतना साहस नहीं था कि पुलिस के पास जाए, जिसे हर कोई आतंकवादी लगता था। फिर वो थे कौन? ये राज़ बस राज़ ही रह गया, लेकिन ये भी सच है कि अगर उस दिन हमारे पूरे परिवार का क़त्ल हो गया होता तब भी कातिल का पता नही चलता। दो बच्चों के लिये जिनकी उम्र 8 और 12 साल थी, उनके लिये ये पंजाब का बंदूक वाला अंतकवाद था और स्कूल में कहे गये बोल! वो ज़बान वाला अंतकवाद था। घायल दोनों ने किया था, कहीं जिस्म को तो कहीं जज़्बात को।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

हर हफ्ते Youth Ki Awaaz हिंदी की बेहतरीन स्टोरीज़ अपने मेल में पाने के लिए यहां सब्सक्राइब करें।