“BHU में नहीं है सोशल जस्टिस”

Posted on November 22, 2016 in Hindi

रौशन पांडे:

25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में दिए अपने भाषण में अंबेडकर ने कहा था कि, “आज से हम अंतर्विरोधों के युग में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हम ‘हर व्यक्ति एक मत’ और ‘हर मत एक मूल्य’ के सिद्धांत को मानेंगे लेकिन अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में ‘एक व्यक्ति एक मूल्य’ के सिद्धांत को नकारना जारी रखेंगे।”

वर्तमान भारतीय राजनीति में अंबेडकर सबसे चर्चित व्यक्ति हैं। सभी दल अंबेडकर को अपने विचारों के करीब होने का दावा कर रहे हैं। प्रधानमंत्री तो खुद को अंबेडकर का ‘भक्त’ तक बता चुके हैं। लेकिन भारत में सामाजिक और आर्थिक समानता को कायम करने के लिए अंबेडकर के जो विचार हैं वो बड़बोले राजनीतिक दलों के नीतियों में दिखाई नहीं देते। जिन कैम्पसों से निकली बहसें सामाजिक बदलावों को जन्म देती हैं, आज उन्ही कैम्पसों में सामाजिक न्याय नहीं दिख रहा है। भारत या दुनिया में सामाजिक और राजनैतिक बदलाव के लिए जो भी आंदोलन हुए हैं, उसकी चेतना शिक्षण संस्थानों मे होने वाले शोध कार्यों और बहसों से ही मिली है।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पूर्वांचल और बिहार के लिए गुणवत्तापुर्ण शिक्षा का एक मात्र केन्द्र है। इस क्षेत्र में चेतना के विकास की बड़ी ज़िम्मेदारी इस संस्थान की है क्योंकि इस क्षेत्र के लोगों और शिक्षण संस्थानों के लिए यह एक आदर्श स्थापित करता है। लेकिन ‘राष्ट्रीय महत्व का संस्थान’ के रूप में दर्जा प्राप्त BHU की आंतरिक संरचना पर नजर डाली जाए तो इस कैम्पस में सामाजिक रूढियां और पिछड़े विचार आज भी पूरी तरह हावी हैं। यहां की उच्च प्रशासनिक समितियों और व्यवस्था में भारत की सामाजिक विविधता के प्रतिनिधित्व का घोर अभाव है। अगर संरचना की बात करें तो विश्वविद्यालय की सबसे बडी समिति एग्ज़ीक्यूटिव काउंसिल के 9 सदस्यों में से 6 ब्राह्मण, 2 क्षत्रिय और 1 इसाई हैं। वहीं 16 संकाय प्रमुखों मे केवल 2 ओबीसी (एससी और एसटी का कोई नहीं) और 32 मुख्य अधिकारियों में से सभी पदों पर ऊंची जातियों के लोगों का वर्चस्व है। प्रतिनिधित्व ना होने की वजह से प्रशासन की नीतियों और फैसलों में हर जगह जातिवाद दिखाई देता है। अप्रैल 2011 की एक पत्रिका में छपी खबर के अनुसार आरटीआई से यह पता चला है कि BHU के 594 प्रोफेसर में केवल 2 अनुसुचित जाति के हैं शेष सभी सामान्य वर्ग के हैं। वहीं 319 असोसिएट प्रोफेसर हैं जिनमें 21 अनुसुचित जाति, 1 अनुसुचित जनजाति और 10 पिछड़े वर्ग को छोड़ सभी सामान्य वर्ग के हैं। विश्वविद्यालय में 44 रीडर हैं जिनमें सभी समान्य वर्ग से हैं। प्रशासन में ऊंची जातियों का वर्चस्व होने के कारण असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर भी सामान्य की तय सीटों से भी अधिक नियुक्तियां की गई हैं वहीं आरक्षित सीटों पर बारबार not found suitable (NFS) कहते हुए खाली छोड़ दिया जाता है।

BHU प्रशासन शुरू से ही अपने जातिवादी मानसिकता को लेकर आलोचना का शिकार रहा है। व्यवस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे संगठनों के हावी रहने से इस तरह के पिछड़े विचारों को बल मिलता रहा है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि पहले BHU के एडमिशन फार्म के एक कॉलम में साफ लिखा होता था ‘आर यू ब्राह्मण और नॉन ब्राह्मण?’ बाद में हुए छात्र आंदोलन के कारण इसे हटाना पड़ा। प्रोफेसर तुलसीराम द्वारा लिखी गई आत्मकथा ‘मणिकर्णिका’ में BHU प्रशासन और शिक्षकों का जातिवादी चेहरा सामने आया है।

आज़ादी के 70 साल बाद भी अगर किसी शिक्षण संस्थान में स्टूडेंट्स को उसके जाति के आधार पर विषय चयन करने को कहा जाना संविधान की विफलता का सबसे बड़ा सबूत है। BHU में स्थित महिला महाविद्यालय की एक दलित छात्रा को आनर्स में भौतिकी(physics) लेने की वजह से उसे पूरे वर्ष प्रताड़ित किया गया, क्योंकि कुछ शिक्षकों को यह बात हजम नहीं हो रही थी कि एक दलित और उसके ऊपर से लड़की फिजिक्स जैसे विषय से आनर्स कैसे कर सकती है। प्रवेश से लेकर डिग्री लेने तक एक दलित स्टूडेंट को समाज के साथ-साथ उन लोगों से भी लड़ना होता है जिन पर समाज सुधारने की ज़िम्मेदारी है। छात्रावासों में कमरे के आवंटन से लेकर मेस के खाने तक दलित स्टूडेंट भेदभाव का सामना कर रहे हैं। मेडिकल के हास्टलों में दलित छात्रों को कमरा बाथरूम के पास आवंटित किया जा रहा है, वहीं उनसे अपने पहचान पत्र पर उनकी कैटगरी (category) भी लिखवाई जा रही है। शिक्षा संकाय (faculty of Education) के एक हास्टल में केवल कुछ ब्राह्मण छात्रों की आपत्ति पर मेस में मांसाहार को बंद कर दिया गया था, जिसे भारी विरोध के बाद फिर से शुरू करना पड़ा। जातिगत हमले और कमेंट्स की सैकड़ों घटनाएं आम हैं, लेकिन सवाल यह है कि व्यवस्था ही जातिवाद के जंजीरों में बंधी हो तो फरियादी को न्याय कैसे मिलेगा?

70 साल पहले देश को मिली आज़ादी अपने रास्ते तय करने की आज़ादी थी, अपनी आज़ादी को सुनिश्चित करने की आज़ादी थी। विश्वविद्यालय समाज का आईना नहीं बल्कि उसका भविष्य होते हैं जो भावी समाजिक संरचना और आज़ादी की नींव रखते हैं। शैक्षणिक संस्थानों का उद्देश्य समाज में स्थापित मूल्यों और बहसों को वैज्ञानिक तर्कों से विस्थापित करना होना चाहिए। अगर इन संस्थानों के भीतर भी हर व्यक्ति का मूल्य समान नहीं हो पाता तो सवाल हमारी आज़ादी की दिशा पर भी है।

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