बलात्कार का संबंध पहनावे से नहीं, हमारी सोच से है

Posted on November 25, 2016 in Domestic Violence, Hindi, Human Rights, Masculinity, Specials, Women Empowerment

एक दिन मैं मेट्रो से सफर कर रहा था। मेरे बगल में दो औरतें आपस में बातें कर रही थीं। उनकी बातचीत का कुछ हिस्सा मेरे कानों में भी पड़ा। किसी घटना का ज़िक्र करते हुए वे कह रही थीं कि लड़कियों के साथ छेड़छाड़ इसलिए होती है क्योंकि उन्हें कपड़े पहनने की तमीज़ नहीं है। दो-एक स्टेशनों के बाद वे तो उतरकर चली गयीं, लेकिन मेरे ज़हन में इस सवाल को ताज़ा कर गयी कि क्या पहनावे और छेड़छाड़ के बीच कोई सकारात्मक संबंध है? इस सवाल में पीछा करना, घूरना, के साथ ही बलात्कार जैसे अपराधों को भी शामिल कर लीजिए। यानि अब सवाल यह बना कि क्या स्त्रियों के साथ पुरुषों द्वारा की जाने वाली किसी भी प्रकार की यौन हिंसा और हिंसा की पीड़ित के पहनावे के बीच कोई संबंध है?

मैं सोच रहा था कि इस सवाल का उत्तर किन सबूतों के आधार पर खोजूँ? इसका एक रास्ता तो अलग-अलग स्त्रियों द्वारा अनुभवों को सुनने का हो सकता है। और एक रास्ता यह हो सकता है कि उन अध्ययन रिपोर्टों को पढ़ा जाए जिन्हें बड़ी मात्रा में जुटाए गये अनुभवों के आधार पर तैयार किया गया है। काफी विचार करने के बाद मैंने तय किया कि मैं अपनी राय इधर-उधर से सुनी बातों के आधार पर नहीं बल्कि किन्हीं ठोस आंकड़ों के आधार पर बनाऊंगा। आंकड़ों के स्रोत के रूप में मैंने नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो(ब्यूरो) की 2013 तथा 2015 की रिपोर्ट्स “क्राइम इन इंडिया”  तथा स्वाथ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-3 (2005-06) के वॉल्यूम-1 (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे) को चुना |

ब्यूरो द्वारा वर्ष 2013 में देश भर में दर्ज हुए बलात्कार के मामलों के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर लगा कि पहनावे और बलात्कार एवं किसी भी प्रकार की यौन हिंसा के बीच किसी भी मात्रा में किसी भी तरह का संबंध स्थापित करना, इस प्रकार के अपराधों के सही कारणों को समझने से रोकना है। ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2013 में देश भर में बलात्कार के कुल 35,447 मामले दर्ज हुये। इनमें से 1761 मामलों में पीड़िताओं की उम्र 10 साल से छोटी है। यानि दिये गये वर्ष में जितनी स्त्रियों का बलात्कार किया गया उनकी संख्या की लगभग 5 प्रतिशत 10 साल से छोटी उम्र की बच्चियाँ हैं। ब्यूरो की इसी रिपोर्ट के अनुसार दस से चौदह साल तक की 3035 यानि 8.56 प्रतिशत लड़कियों का बलात्कार किया गया। तो क्या यह मान लिया जाए कि तीन, चार, पांच, … नौ, … तेरह और चौदह साल की बच्चियों और लड़कियों का बलात्कार उनके पहनावे के कारण किया गया?

यदि इस आंकड़े से भी किसी की चेतना बदलने के लिए तैयार नहीं है तो वह ब्यूरो की इसी रिपोर्ट में दिये गये एक और आंकड़े पर गौर करें। रिपोर्ट के अनुसार बलात्कार की शिकार 265 स्त्रियों की उम्र 50 साल से ज्यादा की है। बलात्कार के अपराध का जिम्मा बलात्कार की पीड़िता पर डाल देना एक ऐसा सांस्कृतिक षड्यंत्र है जिसकी आड़ में अपराधियों का बचाव किया जाता रहा है।

यदि इन तथ्यों से भी किसी की चेतना न बदली हो तो वह नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट को देख सकता/सकती है | इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में 40 प्रतिशत शादीशुदा स्त्रियाँ अपने पति द्वारा शारीरिक और यौन हिंसा की शिकार हैं। जबकि 17 प्रतिशत अविवाहित स्त्रियां शारीरिक और यौन हिंसा की शिकार हैं (पृष्ठ 503)।  रिपोर्ट ने तकनीकी कारणों से पति द्वारा किये जाने वाले बलात्कार का जिक्र नहीं किया होगा। लेकिन अनुमान लगाया जा सकता है कि शादीशुदा स्त्रियों पर की जाने वाली यौन हिंसा का क्या मतलब है। क्या 40 प्रतिशत स्त्रियों पर उनके पतियों के द्वारा की जाने वाली यौन हिंसा का कारण घर के अन्दर उनके द्वारा पहने जाने वाले कपड़े होंगे? या इसका कारण उन अनैतिकताओं में है जिन्हें संस्कृतियों के नाम पर महिमामंडित किया जाता है। उन संस्कृतियों के नाम पर जो असमानताओं की बुनियाद पर टिकी हुई हैं।

क्राइम इन इंडिया-2015 के पांचवें अध्याय, क्राइम अगेंस्ट वुमेन, के पृष्ठ-89 पर दर्शायी गयी सरणी में बताया गया है कि सन 2011 में स्त्रियों के खिलाफ़ अपराध के कुल 2,19,142 (सारणी 5b:85) मामले दर्ज किये गये। इनमें से 99,135 मामले पति या उसके संबंधियों द्वारा की गयी क्रूरता (“cruelty by husband or his relatives” ) के थे। यानि 43.24 प्रतिशत मामलों में क्रूरता करने वाला पति या उसका कोई रिश्तेदार था। इसी सारणी के अनुसार सन 2015 में स्त्रियों के खिलाफ़ अपराध के 3,14,575 मामले दर्ज किये गये। इनमें से 1,13,403 मामले पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की गयी क्रूरता के थे। यानि 2015 में 36.05 प्रतिशत मामलों में क्रूरता करने वाला पति या उसका/उसकी रिश्तेदार था/थी।

यह स्थिति तो तब है जबकि स्त्री के खिलाफ़ घर के अंदर की जाने वाली क्रूरताओं के ज़्यादातर मामले न तो दर्ज करवाये जाते हैं और न ही पुलिस द्वारा दर्ज किये जाते हैं। हमें ध्यान रखना होगा कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा की गयी क्रूरता के इन मामलों में दहेज़ के लिए किये गये उत्पीड़नों के मामले शामिल नहीं हैं। उन्हें इसी सारणी में अलग से दर्शाया गया है।

इन मामलों में पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा की गयी क्रूरताओं का कारण पहनावा नहीं है। इसके कारण परिवार की पितृसत्तात्मक संरचना में हैं। एक ऐसी संरचना जो जन्म आधारित भेदभाव पर टिकी हुई है। जिसमें कर्तव्यों और अधिकारों का बंटवारा इस प्राकृतिक धटना पर निर्भर करता है कि कोई जन्म से स्त्री है या पुरुष।

इस बात को समझना सभी स्त्रियों, और पुरुषों के हक़ में है कि बलात्कार का संबंध पहनावे से न होकर उस सांस्कृतिक सोच से है जो स्त्री को भोग की वस्तु समझती है। सभी को यह स्वीकार करना चाहिए कि किसी भी इन्सान को भोग की वस्तु समझना इंसानियत का अपमान है।बेहतर समाज और बेहतर सामाजिक संबंधों के लिए जरूरी है कि हम सभी इंसानों को इन्सान समझने की तरफ बढ़ें, न कि इन्सान को वस्तु समझने की सांस्कृतिक दशा में जड़वत पड़े रहें।

और अंत में जाते-जाते एक सवाल छोड़कर जा रहा हूँ कि क्या कोई ऐसा पहनावा बना सकता या सकती है जो रेप-प्रूफ हो?

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