कैसे स्थापित होगा ‘डेकोरम ऑफ़ कोर्ट’?

Posted on November 7, 2016 in Hindi, Society

विवेक राय:

बहुत बड़ी भूल करता आ रहा था, आज एहसास हुआ कि मैं सिर्फ उन लोगो के बारे में ही लिख रहा था जो शायद वोटर हैं या एक समुदाय हैं। इस पर भी मोदी, राहुल, स्मृति ईरानी जैसी महान शख्शियतों के इर्द-गिर्द घूमता रहा। पूरी दुनिया इनके बारे में लिख रही है, इनका गुण-गान या आलोचना भी अपनी सहूलियत के हिसाब से कर रहे हैं। लेकिन कुछ लोग छूट जा रहे हैं, क्यूंकि वो कोई महान व्यक्तित्व नहीं हैं। शायद बहुत पैसे वाले भी नहीं जिनकी परेशानियों से शेयर बाजार लुढ़क जाता हो। पर इस देश के बहुत से आम लोग और परिवार ऐसे हैं, जो इस देश की व्यवस्था के कारण ‘असामान्य जीवन’ जीने को मज़बूर हैं और जनतंत्र की व्यवस्था के किसी भी खम्बे के पास इनके लिए वक़्त नहीं है।

‘निसार’ को 23 साल पहले ‘बाबरी मस्जिद’ की पहली बरसी पर ‘ट्रेन विस्फोट’ के मामले में गिरफ्तार किया गया था, तब उसकी उम्र 20 साल ही थी। वो जेल में था, उसका परिवार ‘आतंकवादी का परिवार’ घोषित हो चुका था फिर भी वो लड़ते रहे और हारते रहे। 23 साल बाद 11 मई 2016 को निसार को ‘बाइज़्ज़त बरी’ कर दिया गया, उससे कहा गया ‘तुम्हे न्याय मिला, अब तुम आज़ाद हो’।

निसार आज 43 साल के हैं। उनके लिए ज़िंदगी एक बुरा सपना बन चुकी है, शायद  इसलिए क्यूंकि वो एक मुसलमान थे या गरीब थे या पुलिस ने किसी बड़े सिर को बचने के लिए निसार को चुना। शायद हर पकड़ा गया मुसलमान पहली नज़र में ‘आतंकवादी’ ही होता है, इसलिए उन्हें जमानत तक नहीं मिली। देश की न्यायपालिका पर ये एक सवाल है। सवाल इस बात का नहीं कि केस ज्यादा हैं और जज कम हैं। सवाल ये भी नहीं कि पुलिस ने ठीक से काम किया या नहीं, सवाल ये भी नहीं है कि वकील ठीक नहीं था। मेरा सवाल सीधा न्यायपालिका से है। क्या ये सच नहीं है कि निचली अदालतों में जज के सामने बैठे बाबू 100-50 रुपये ले कर बेवजह पेशी की तारीख नहीं बढ़ाते? अगर सामने बैठे जज को इतना भी नहीं दिखता तो कैसे ‘डेकोरम ऑफ़ कोर्ट’ स्थापित होगा? पेशियां बढ़ती जाती हैं और पता नहीं जज कभी ये भी सोचता है कि इस वजह से भी केस कम नहीं होते। यदि न्यायपालिका इस ‘कोलोनियल युग’ से बाहर  नहीं आएगी तो आज़ाद भारत में लोगों को न्याय मिलना कैसे सुनिश्चित किया जाएगा?

निचली अदालतों की हालत उस इंसान को पता होगी जो पीड़ित होगा और जिसे सरकारी वकील मिला हो जो उस से शायद ही कभी मिलता हो। हमारे देश में ‘तंत्र’, ‘ जन’ से बड़ा हो गया है। देश की न्यायपालिका को भी जवाबदेह होना पड़ेगा, हर बार वो सरकार ,पुलिस ,कानून की कमियों की दुहाई दे कर बच नहीं सकती। कोई जज आंसू बहाए और खबर बने पर उन आंसुओ का क्या जो ‘कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट’ के डर से बाहर आने से रुक जाते हैं। कई फैसले ऐसे हैं, जिनमे ऐसा लगता है कि जज, जज कर रहे हैं मीडिया ट्रायल पर या लोक भ्रान्ति पर।

न्यायपालिका आज़ाद देश की है, यहां के जज सरकार से अच्छा-खासा वेतन ले रहे हैं, कमिया हो सकती हैं पर इन्हें दूर करने के  लिए  कौन आगे आएगा? ये आपका काम है वर्ना समाज, पंचायतें, खाप पंचायतें तो न्याय की नई इबारतें लिख ही रही हैं और आगे भी लिखेंगी जो हमारे लोकतंत्र के लिए बिलकुल भी हितकर नहीं है। लोग हताश हो चुके है। आपके न्याय की मिसालें उंगलियों पर गिनी जा रही हैं। उच्च न्यायलय इंग्लिश में काम करते है और ऊपर से कानून की जटिल भाषा… हम न्याय के लिए खड़े हैं या बुद्धिमत्ता का इम्तिहान देने?

न्यायपालिका में क्रन्तिकारी बदलावों की ज़रूरत है। न्यायपालिका इसलिए स्वतंत्र नहीं रखी गई कि जज अपनी तानाशाही  चलाएं और दवाब का रोना रोएं बल्कि वे न्याय सुनिश्चित करें वो भी समय पर। फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स सिर्फ हाईप्रोफाइल केसेज़ के लिए ही क्यों? सिर्फ निर्भया के लिए ही क्यों? निसार के लिए या अरुणा शानबाग के लिए और हर भारतीय के लिए क्यूं नहीं? आम इंसान की ज़िन्दगी भी बहुत आम होती है, उसे डर लगता है कोर्ट्स से, वकील से, पुलिस से…और जब वो निर्दोष होता है या पीड़ित होता तो यही सवाल करता है कि ‘मेरे साथ ही ऐसा क्यों?’

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