“डिमोनीटाइजेशन कोई लुक्का-छुपी का खेल नहीं!”

Posted on November 27, 2016 in Business and Economy, Hindi

विवेकानंद सिंह:

मुझे जितना अर्थशास्त्र का ज्ञान है, उस लिहाज़ से मैं कह सकता हूं कि भ्रष्टतंत्र के शुद्धिकरण के लिए विमुद्रीकरण या कहें डिमोनीटाइजेशन एक अच्छा कदम साबित हो सकता है, लेकिन विमुद्रीकरण कोई लुक्का चोर-चोर का खेल नहीं है कि आप ‘धप्पा’ बोल दिये और चोर पकड़ा चला जायेगा।

– लोकसभा के पुस्तकालय में दिये गये अपने भाषण में प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि उन्हें (विपक्षों को) फैसले पर आपत्ति नहीं, उनका आरोप है कि फैसले से पहले ठीक से तैयारी नहीं की गयी, दरअसल, वे कहना चाह रहे हैं कि हमने उन्हें तैयारी करने का मौका नहीं दिया।

– अच्छी बात है, प्रधानमंत्री जी आपने वाकई अति चातुर्य का परिचय दिया और दुनिया की सबसे साफ-सुथरी पार्टी भाजपा के अलावा किसी अन्य को इस फैसले की कानोकान ख़बर तक नहीं होने दी। ताकि आपके राजनीतिक विरोधी काली पूंजी विहीन हो कर खुद ही दम तोड़ दें और आजातशत्रु की तरह आपका एकछत्र साम्राज्य स्थापित हो। यानी कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे।

– हाल ही में प्रसारित #कशिश #न्यूज़ की रिपोर्ट आपकी इस मंशा को और पुख्ता तरीके से साबित करती है। कशिश न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, नोटबंदी से महीने व सप्ताह भर पहले भाजपा कई जिलों में करोड़ों की ज़मीन खरीदती है। ज़मीन मौजूदा भाव से सस्ते दामों में खरीदी जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, हर जगह पैसे कैश में दिये गये हैं। कमाल है न दोस्तों, आप लोगों ने अगर रिपोर्ट नहीं देखी है तो देख लीजियेगा।

– अब प्रधानमंत्री जी से उम्मीद है कि वे एक और बहादुरी दिखाते हुए अपनी पार्टी के भ्रष्ट सज्जनों का नाम उजागर करें। ताकि, जनता की कुर्बानियों का सही फल उसे मिल सके।

– दरअसल, एक बात समझना ज़रूरी है। अगर सरकार ने सही मायने में ईमानदारी के साथ फैसले को लिया होता, तो पांच सौ के कम-से-कम पर्याप्त नोट तो छापे ही जा सकते थे, लेकिन, यह फैसला राजनीति से प्रेरित रहा। प्रधानमंत्री जी को लगता है कि मौजूदा समय में देश की जनता को बिग-बैंग टाइप फैसले बड़े पसंद हैं। उन्हें लगा कि लोगों को समझते-समझते छह-सात महीने तो लग जायेंगे और तब तक उत्तर प्रदेश का चुनाव शुरू हो चुका होगा। खैर, यह बात भी सही है कि राजनीतिज्ञ तो राजनीति करेंगे ही, वे कोई धर्मात्मा तो हैं नहीं।

– हालात, थोड़े बिगड़ने लगे तो आंसू निकल आये। हालांकि मेरे एक गुरु कहते हैं कि बेटा किसी के सामने तुम हंस तो सकते हो, लेकिन रो तुम उसी के सामने हो, जिससे सही में प्यार करते हो। लेकिन वो यह भी कहते हैं कि एक अच्छा अभिनेता अपवाद की श्रेणी में आता है, वह कभी भी कठोर और कभी भी भाव विह्वल हो सकता है।

– हालांकि, हालात इनसे भी नहीं सुधरे तो पाकिस्तान है न! भारतीय सेना है न! आदि-आदि।

– बावजूद इन बातों के विमुद्रीकरण वापसी के समर्थन में मैं बिलकुल नहीं हूं। लेकिन आपको बहादुरी दिखाते हुए कुछ बातें ज़रूर स्वीकारनी चाहिए, क्योंकि आप वाकई बहादुर हैं।

– आपने देश में विमुद्रीकरण की प्रीमैच्योर डिलिवरी करवाई है, जिसका नतीजा हुआ कि देश की इकोनॉमी को अगले साल-दो साल के लिए कुपोषण की मार झेलनी होगी। नतीजन डॉलर के मुकाबले रुपया अपने न्यूनतम स्तर को छू चुका है।

– विमुद्रीकरण के फैसले की वजह से कई आम लोगों की जानें भी गयी हैं। उन सभी को शहीद का दर्ज़ा दिया जाना चाहिए, उनकी जान भ्रष्टाचार जैसे विषैले सांप को देश से खात्मे के प्रयास में जो गयी है। उनके परिवारों को वही सम्मान मिले, जो शहीदों के परिवारों को मिलता है, आप ऐसा कर सकते हैं।

– हां, इस बड़े फैसले का लाभ भी जनता को दिखा ही दीजियेगा, यह कह कर न टालिएगा कि 2019 तक दिखा देंगे। साथ ही जनता को यह बता दीजियेगा कि कितने कुबेर उद्योगपतियों का एनपीए (नॉन परफार्मिंग एसेट) बैंकों द्वारा माफ़ किया गया है।

– आपकी नज़र अगले वित्त वर्षीय बजट पर भी होगी, यह देखना भी दिलचस्प होगा कि वहां क्या कमाल दिखेगा।

– आखिर में एक और बात, अगर लोग आपको कल यह कहें कि ‘100 चूहे खा कर बिल्ली हज कर रही है’, तो मुझे सुनने में अच्छा नहीं लगेगा। इसलिए अब आपको राजनीतिक पार्टियों के भ्रष्टाचार पर भी कड़ा कदम उठाना चाहिए। बाकी त जे है से हैयिये है, उ तो देश-दुनिया समझिये रहा है।

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