“मैं” और मेरा कालाधन

Posted on November 20, 2016 in Business and Economy, Hindi

दीपक भास्कर:

“मैं” बहुत महत्वपूर्ण है, यह मैंने अपने देश के प्रधानमन्त्री से ही सीखा है जब लाल किले के प्राचीर से, देश के नाम अपने सन्देश में बहुत बार उन्होंने “मैं” पर केन्द्रित किया। इसलिए अपने देशवासियों को भी “मैं”; “मैं” होकर ही संबोधित कर रहा हूं।

अब मेरे ‘प्यारे देशवासी’ यह सोच रहे होंगे की मेरे ‘प्रधानमंत्री’ के सिवा अब ये “मैं” कौन है? “मैं” इस देश का वो “मैं” हूं जिसके पास पैन कार्ड, पासपोर्ट नहीं है बल्कि आधारकार्ड और वोटरकार्ड है। ये वोटर कार्ड मुझे एक दिन के लिए “मैं” बना देता है। मैं पहले सोचता था कि अब कोई भी ‘मैं’ नहीं है बल्कि ‘हम भारत के लोग’ हैं। वैसे, “हम भारत के लोग” में कई “मैं” होते हैं। लेकिन ये बात भी मुझे समझ में आती है कि किसी एक “मैं” में “हम भारत के लोग” नहीं हो सकते हैं। मैं परेशान रहता हूं कि आपके वाले “मैं” में, मुझे मेरा वाला “मैं” क्यूँ नहीं दिखता है। खैर, मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं लेकिन इतना जानता हूं की मेरे देश के संविधान में “हम भारत के लोग” हैं तो आप इतनी आसानी से “मैं” कैसे हो जाते हैं।

बहरहाल, “मैं” वो भी हूं, जो वापस अपने गांव जा रहा हूं। अभी-अभी आपके भाषण ने हमारी जिंदगी में तूफान मचा दिया है। आपके भाषण ने 500 और 1000 के नोट को प्रतिबंधित कर दिया है। मेरे पास ऐसी कोई रकम नहीं जिसे लेकर ‘मैं’ बैंक जाऊं, और उसे बदल लूं। मेरे पास कुछ पैसे होते हैं, जिनको मैं हर वक्त रखता हूं जिससे मैं आपात स्थिति में अपने गांव जाने का किराया भर सकूं। पिछले तीन दिन से मैं बिना काम के हूं और अब बस घर जाने भर का किराया है, सो घर जा रहा हूं, मेरे बच्चे, बीवी, माँ-बाप सब शायद भूखे हीं होंगे क्योंकि मैं ही हूं जो उनके लिए खाना ला सकता हूं। लेकिन ये तब हो सकता है जब मुझे रोज़ काम मिलता लेकिन फिलहाल मुझे किसी भी तरह के काम मिलने की कोई संभावना नहीं है।

मैं अपने भूखे बच्चों को क्या समझाऊंगा कि मैं उसे खाना क्यूं लाकर नहीं दे पा रहा हूं? क्या मैं उसे यह कह दूं उसका पिता उसे देश के लिए भूखा रख रहा है। तब मेरे मन में भी, यह सवाल लाज़मी है कि, क्या इस देश के लिए लड़ाई में प्रधानमंत्री, मंत्री, और तमाम वो लोग जो कालाधन रखते हैं, भूखे रह रहे हैं? काले धन के खिलाफ इस लड़ाई में, मैं और मेरे बच्चों ने सबसे ज्यादा बलिदान दिया है। लेकिन क्या देश के खजाने में जब इतने पैसे आ जायेंगे तो मेरी जिंदगी अच्छी हो जाएगी? शायद नहीं? क्यूंकि ये सारे पैसे उन लोगों को ऋण के तौर पर दे दिए जायेंगे जो गबन कर विदेश भाग जायेंगे।

मैं अपने गांव जाने वाली ट्रेन में बाथरूम के पास बैठ चुका हूं। टिकट लिया है, लेकिन हमारे जैसे लोगों को टिकट के बावजूद, बोगी में कभी जगह नहीं मिलती। मैं हर समय यहीं सफ़र करता हूं। खैर! मुझे उतनी शिकायत की आदत नहीं। शायद! भगवान् ने हमारी तकदीर ऐसी ही लिखी है। बहरहाल! बाथरूम के पास बैठकर आपके भाषण को सोच रहा हूं। आपने मुझे ईमानदार कहा था। सही है! मैं ईमानदार हूं। मेरी ईमानदारी ही मेरे देशभक्त होने का प्रमाण भी है। लेकिन अब इस देश में, जो ईमानदार नहीं है वो ईमानदार हो सकते हैं।

मैंने सोचा था कि जिनके पास कालाधन है वो जेल जायेंगे, उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी और उन पर देशद्रोह का मुक़दमा चलेगा। मेरी बदतर जिंदगी के गुनाहगारों से हिसाब लिया जायेगा। लेकिन पता चला कि सजा नहीं है, बल्कि वो काले-धन को सफ़ेद कर सकते हैं। अच्छा है! पहले खूब काला धन जमा करो और फिर एक दिन उसे सफ़ेद करा लो। लेकिन इस धन को जमा करने के कारण मेरी जिंदगी के सालों-साल, जो काले पन्ने में तब्दील हो गए उनका क्या? क्या उन्हें कोई सफ़ेद कर सकता है?

मेरी प्यारी सी बेटी ने, आप ही के बिना सुविधा वाले सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया, उसकी सजा किसे देंगे? क्या उसकी जिम्मेदारी ये कालेधन वाले नहीं लेंगे और आप उसको सजा नहीं देंगे? अब मैंने सोच लिया है कि मैं ईमानदार नहीं रहूंगा, ये भार मैं अपने कंधे पर क्यूँ लेकर चलूं, जब मैं डकैती कर भी ईमानदार की लिस्ट में आ सकता हूं। सिर्फ ये बताकर कि मेरे पास कालाधन है और आप उससे टैक्स ले लेंगे, वो पेनाल्टी भर देगा, बस हो गया ईमानदार। लेकिन आपने मुझे अब रास्ता दिखा दिया है और अब मैं ईमानदार नहीं रहूंगा, बल्कि जीवन भर काले-कारनामे करने के बाद एक दिन ईमानदार बन जाऊंगा।

टी.टी. साहब चेक करने आ गए हैं, एक आदमी को डांट भी रहे हैं जो जनरल का टिकट लेकर स्लीपर क्लास में चढ़ गया है, उनको ईमानदारी का लेक्चर भी दे रहे हैं। लेकिन फिर तीन सौ रूपये देकर वो आदमी ईमानदारी के लिस्ट में आ गया है और उन्हें सीट भी मिल गयी है। तो क्या चेक करने वाले टी.टी. ईमानदार हैं? इनकम टैक्स वाले, कालेधन वालों के यहां छापा मारते हैं तो क्या इनकम टैक्स वाले ईमानदार हैं? अगर हैं तो महज़ 50000 की सैलरी वाले नौकरी से वो करोड़ों का घर कैसे बना लेते हैं? हां! अब समझ आया कि उनके बच्चे भी हमारे बच्चे की तरह भूखे रहते होंगे। साहब ने पेट भर न खाकर अपना घर बनाया होगा। ये इसीलिए कह रहा हूं क्यूंकि मैंने ही तो अपने हाथों से एक इनकम टैक्स के बाबू का घर बनाया था। खैर सफ़ेद कपड़े पहन लेने से भी तो आप सफ़ेद लगते हैं। मैं सफ़ेद कपड़े नहीं पहनता क्यूंकि काले रंग के कपड़े बहुत सारे दाग-धब्बे छुपा लेता है। वो दाग मेरे नहीं है बल्कि दूसरों के हैं जिनके लिए ‘दाग अच्छे हैं’ का प्रचार आता है।

खैर! मैं जा रहा हूं उन तमाम “मैं” को खोजने जिनके होने से “हम भारत के लोग” बने हैं। मैं एक-एक कर, हर “मैं” से बात करूंगा और उनको लेकर दिल्ली आऊंगा। लाल किले के ऊपर से आप उतरेंगे और नीचे सुनने वालों की कतार में बैठेंगे। और वो हर “मैं” लाल किले पर चढ़कर, आपको अपना दर्द बताएगा। आप रोइयेगा मत क्यूंकि आपके आँसू में मुझे अपना दर्द बिलकुल नज़र नहीं आता है।

 

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