तरह-तरह के चुटकुले और उनके पीछे की मानसिकता

Posted on November 10, 2016 in Hindi, Society

हरबंस सिंह:

कुछ ही दिनो पहले, मैं एक स्टेशनरी की दुकान पे कुछ लेने के लिये गया था और किसी कारण वहां थोड़ा सा ज़्यादा समय लग गया, इतने में पीछे से कुछ धीमी गती से हंसने की आवाज़ सुनाई देने लगी, मुड़ के देखा तो दो जवान बच्चे फ़ोन पे कुछ पढ़ के हंस रहे थे लेकिन शायद मेरी मौजूदगी उन्हें खुलकर हंसने से रोक रही थी, मैं समझ गया कि ज़रूर कोई सरदार वाला चुटकुला पढ़ के हंस रहे होंगे, मैने उनसे कहा कि दोस्तों हमारे साथ भी इस चुटकुले को साझा करो, मैं भी हस लूंगा। वह कुछ बोले नहीं, लेकिन मैंने उन्हे एक जवाब ज़रुर दिया जो मैं अंत में बताउंगा। अरे नहीं कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं था लेकिन इससे कम भी नहीं था.

जाते जाते सोचने लगा कि क्या वजह होगी कि लोग चुटकलों पे हंसते हैं? इसकी मानसिकता क्या होगी? और जो बात समझ आयी वो ये कि लोग हमेशा अपने विरोधाभास पे ही हंसते हैं। जैसे कि किसी दफ्तर में एक आम कर्मचारी किसी मालिक पे बने हुए इस जोक पर ज़रूर हंसेगा।

बॉस: तो बताओ की तुम्हें कब लगा की कंपनी तुम्हारे बिना चल नही सकती ?

कर्मचारी: सर, जब पिछले महीने आप नै मेरी छुट्टी कैंसल कर दी थी.

इस चुटकुले में, एक  कर्मचारी को सम्मान मिलता है कि उसकी मौजूदगी कुछ असर रखती है और वह खुद को ज़्यादा ताक़तवर होने का झांसा दे रहा है लेकिन  हक़ीकत में वह ये जानता है कि उसे कंपनी की ज़्यादा ज़रूरत है ना की कंपनी को उसकी। अब, यही चुटकुला अगर कंपनी का मालिक सुनेगा तो क्या हंस पायेगा? बिलकुल नहीं, क्योंकि ये चुटकुला उसके सर्वोच्च होने के अहंकार को ठेस मारता है। उसी तरह बॉस के लिये नीचे वाला एक  चुटकुला है जहां मालिक के अहंकार को संतुष्टि मिलती है जबकि उसका कर्मचारी इसे “पथेटिक” कहेगा।

कर्मचारी: सर, ये शर्ट आप पर बहुंत जच रही है।

बॉस: शुक्रिया, लेकिन  मुझसे छुट्टी की उम्मीद मत रखना।

अब आप समझ ही गए होंगे की चुटकुले वही पसंद आते हैं जो की विरोधाभास में हास्य के रूप में विरोध को प्रस्तुत करते हैं फिर वह एक  कमज़ोर के लिये ताकत का प्रतीक हो या एक  ताक़तवर के लिये अपने अहंकार को सही साबित करने का मार्ग हो। और ये चुटकुले व्यक्तिगत व्यक्तिगत स्तर से होते हुए सामाजिक रूप भी ले लेते हैं जैसे की किसी अज्ञानता पे हंसना

स्टूडेंट – ये ले.. मेरी बी.ई. की डिग्री रख ले..!

भिखारी:- अब रुलाएगा क्या पगले..तुझे चाहिये तो मेरी MBA. की रख ले..!

लेकिन चुटकलों की एक और परिभाषा भी है कि ये विद्रोह को हास्य में दर्शाता है, अब उपर लिखे जोक में, वह बेरोज़गार भिखारी खुद को लाचार समझ रहा है, देश की इस व्यवस्था के सामने जो उसे दिलासा देती थी कि “शिक्षा ही एक माध्यम है रोज़गार का” लेकिन वो MBA होने के बाद भी बेरोज़गार है। तो इसी रूप में चुटकुला एक माध्यम भी है अपनी विपरीत सोच को परिभाषित करने का।

यहाँ पर पति-पत्नी वाले जोक्स का विश्लेषण ज़रूर करूंगा, इस तरह के हर चुटकुले में, पति को बेचारा और पत्नी के हाथों दंडित दिखाया जाता है, और पुरुष अमूमन ऐसे जोक्स पर हंसते भी खूब हैं क्योंकि शायद इसमें भी विरोधाभास है। क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा देश पुरुष प्रधान है और यहां देवीयां तस्वीरों में बस दिवारों पर दिखती हैं।

अंत में हम वहीं लौट आते हैं स्टेशनरी स्टोर पे, मैंने उन जवान बच्चों को एक ही जवाब दिया, “ घबराओ मत अगर सरदार के उपर भी जोक है तो भी सुनाओ मैं ज़रूर हंसूंगा क्योंकि व्यंग्य अक्सर उसी पर होता है जो ज़िंदा होते हैं।

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