‘चमत्कार’ की राह देखते जर्जर सरकारी स्कूल

Posted on November 9, 2016 in Hindi

कविता वर्मा:

एक विद्यालय की तस्वीर को दो दिन में इतना बदलते हुए मैंने पहली बार देखा। मेरे लिए और विद्यालय में पढ़ रही सभी छात्राओं के लिए यह नई तस्वीर किसी चमत्कार से कम तो नहीं थी। दरअसल बात इतनी सी थी कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय की टीम विद्यालय में निरीक्षण के लिए आने वाली थी। मेरे ख्याल में किसी भी चीज, जगह या काम का निरीक्षण करने के लिए बिना जानकारी दिए जाना चाहिए। लेकिन इस बारे में शिक्षा अधिकारी को पहले से ही सूचित कर दिया गया और इसी कारक ने जन्म दिया इस चमत्कार को।

अगर विद्यालय में पहले से ही पूरी ‘कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना’ को अच्छे से अनुबंधित कर दिया गया होता तो शायद हमें यह देखने को न मिलता। पर चूंकि विद्यालय की प्रधानाध्यापिका को लगा कि अगर विद्यालय की हालत दो दिन में न सुधारी गयी तो उनके इस प्रभावशाली पद पर कोई मुसीबत आ सकती है, तो दो दिनों में विद्यालय का कायापलट करना आवश्यक हो गया था।

अगर पहले के विद्यालय का वर्णन किया जाए तो वह कुछ ऐसा होगा। विद्यालय में रंग-रोग़न के लिए आये गए कोष को आज तक इस्तेमाल नहीं किया गया था। बच्चे रोज़ अपने घर के कपड़ो में बिना नहाये कक्षा में आ जाया करते थे, क्योंकि उन्हें कभी विद्यालय की वर्दी पहनने के लिए प्रोत्साहित ही नहीं किया गया था। विद्यालय में कक्षा से लेकर बाहर के मैदान तक बस कचरा ही दिखाई पड़ता था।

बच्चों के लिए तय की गयी व्यंजन-सूची के अनुसार उन्हें भोजन नहीं मिल रहा था और न ही किसी समय-सारणी का पालन किया जा रहा था। बच्चे जब चाहे कक्षा में आ जाते थे और यही दिनचर्या अध्यापिकाओं की भी थी। कक्षा में आना, श्यामपट्ट पर प्रश्न-उत्तर लिखना और चले जाना। “शिक्षण-अधिगम सामग्री” (teaching-learning material) को अभी तक भंडार-घर के एक कोने में संजोकर रखा गया था, क्योंकि बच्चों की पढ़ाई में इसकी जरूरत कभी महसूस की ही नहीं गई। बच्चों के सीखने का स्तर बहुत कम था। भोजन चूल्हे पर पकाया जा रहा था। टेलीविज़न का केबल खराब था।

जैसे-जैसे निरिक्षण के दिन नजदीक आ रहे थे, वैसे-वैसे चमत्कार की ये कोशिशें भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ती जा रही थी। दो दिनों में पूरे विद्यालय में रंग-रोग़न करवा दिया गया। निरीक्षण टीम के आने तक रंग सूखा भी न था। जिस-जिस ने दीवार को छू कर देखना चाहा, इस चमत्कार ने नई तस्वीर के रंग को सब पर लगा दिया। बच्चों को नहलाकर अच्छे से तैयार कर दिया गया। नई वर्दी, जूते-मोजे,रिबन आदि पहनने को दे दिए गए। हर कक्षा में कूड़ादान रख दिया गया। इतनी भीषण गर्मी में भी अभी तक बच्चों को दही-छाछ नहीं दिया जाता था लेकिन उस दिन तो बच्चों के लिए बूंदी का रायता बनाया गया, फल मंगवाए गए। समय-सारणी बनाकर लगा दी गयी और इस एक दिन के लिए उसका पालन भी किया गया।

‘शिक्षण-अधिगम सामग्री’ को हर कक्षा में रख दिया गया और इसका इस्तेमाल भी किया गया। सिलेंडर और गैस का इंतेज़ाम कर उस दिन भोजन गैस पर पकाया गया। बच्चों को दो दिन से प्रश्न-उत्तर व अंग्रेज़ी में 2-3 वाक्य रटाए जा रहे थे, ताकि जब निरीक्षण टीम आये तो उन्हें यही लगे कि अध्यापिकाओं ने कितनी मेहनत की है। टेलेविजन का केबल ठीक करा दिया गया ताकि टीम को यह बताया जाये कि बच्चों को रोज़ टी.वी. दिखाया जाता है। बच्चों को आज तक जिस हेल्पलाइन नंबर की अहमियत तक नहीं पता थी, उस नंबर को उन्हें रटा दिया गया।

ऐसे चमत्कार अगर रोज़ विद्यालय में होते रहे तो जिस मकसद से कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की शुरुआत की गयी, वह मकसद पूरा हो जाये। पर क्या इसके लिए निरीक्षण टीम को रोज़ विद्यालय आना पड़ेगा?

मेरे ख्याल से निरीक्षण टीम को बिना किसी सूचना के आकर विद्यालय की जांच करनी चाहिए। अगर ऐसा होता है तो इस तरह के चमत्कारों की जरूरत हमें नहीं पड़ेगी। लेकिन असली चमत्कार तो तब होगा जब निरीक्षण टीम, खामियों को अपनी पैनी नज़र से ढूंढकर उनमें बदलाव लाने की एक पहल करेगी। यही पहल कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय के शुरू होने के मकसद को सफल कर पाएगी।

या फिर एक चमत्कार (छोटा ही सही) हम लोग कर सकते हैं। हम लोग जो कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में ‘बोध शिक्षा समिति’ व ‘save the children’ की ओर से जुड़े हुए हैं। मेरे यकीन और प्रधानाध्यापिका के यकीन में कुछ अंतर है वो उस चमत्कार में यकीन करती है जो बस कुछ पल के लिए तस्वीर बदल दे लेकिन मैं यकीन करती हूं उसमें जो अपने समय के साथ बदलाव लाता है। इस बदलाव को कठोरता से दबाव डालकर नहीं लाया जा सकता। किसी ने कहा है बदलाव एक-न-एक दिन आएगा जरूर, छोटा ही सही पर आएगा। इस बदलाव को आने में शायद समय भी लग जाये।

गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त तो आपको मालूम ही होगा। अगर हम किसी भी चीज को हवा में फेंके तो धरती का गुरुत्वाकर्षण उसे फिर से अपनी ओर खींच लेता है। उसी तरह अगर किसी चीज में बदलाव अगर तेजी से व कठोरता से लाया जाये तो वह बदलाव उतनी ही तेजी से अपनी वास्तविक स्थिति में लौट जाता है। इसलिए बदलाव को लाने के लिए समानता से व धीरे-धीरे प्रयास करने की जरूरत होती है ताकि जिस चीज में आप बदलाव लाना चाहते हैं वो उस बदलाव को अपना ले। यही अपनाया हुआ बदलाव “चमत्कार” कहलाता है।

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