‘डियर ज़िंदगी’ नहीं ‘डियर आलिया भट्ट’ कहिए जनाब!

Posted on November 27, 2016 in Hindi, Mental Health, Specials

निखिल आनंद गिरि:

अगर आप शाहरुख खान के नाम पर ‘डियर ज़िंदगी’ देखने का मन बना रहे हैं तो आप अब भी समय से काफी पीछे चल रहे हैं। आलिया भट्ट को आपने ‘उड़ता पंजाब’ में कमाल की एक्टिंग करते देखा था। मेरा दावा है कि इस फिल्म के बाद आपको आलिया भट्ट से प्यार हो जाएगा। तो प्लीज़ ये फिल्म ‘डियर आलिया भट्ट’ के लिए देखने जाएं क्योंकि मेरा सिनेमा बदल रहा है। ये फिल्म गौरी शिंदे ने बनाई है। वही जिन्होंने साल 2012 में ‘इंग्लिश-विंग्लिश’ बनाई थी। अच्छी फिल्म थी। ‘डियर ज़िंदगी’ बहुत अच्छी फिल्म है। कई जगह आप ज़िंदगी के बारे में लंबे-लंबे उपदेश सुन-सुनकर बोर होंगे मगर एक अच्छी फिल्म में थोड़ा बोर होना एक बुरी फिल्म देखने से ज़्यादा अच्छा है।

आज के समय की एक लड़की कायरा (आलिया) तमाम तरह की उलझनों से भरी ज़िंदगी ढो रही है। कई सारे रिश्तों में उलझी। कई सारे रिश्तों से बचती हुई। रिश्तों में, समाज में, परिवार में पूरी तरह से ‘मिसफिट’ एक लड़की जो आपको आजकल हर शहर में अपनी पहचान के लिए जूझती मिल जाएगी। फिर अचानक फ्रस्ट्रेशन की हद तक पहुंचकर उसकी नींदें उड़ जाती हैं, बुरे-बुरे ख़्वाब आने लगते हैं तो एक ऐसे ‘दिमाग के डॉक्टर’ की एंट्री होती है जो सभी सवालों के जवाब जानता है। जिसकी ख़ुद की ज़िंदगी में एक तलाकशुदा पत्नी है, बिछड़ गए बेटे का दर्द है मगर वो कायरा की ज़िंदगी को ठीक करने का सारा फॉर्मूला जानता है। ये डॉक्टर जहांगीर खान हैं जो शाहरुख खान तो हैं मगर ‘किंग खान’ नहीं।15055716_203006230146152_5689843448622322992_n

उसके पास हर चीज़ की एक नई परिभाषा है। वो बहुत सारे प्रेम-संबंधों को जायज़ ठहराता है। प्यार के रिश्तों को कुर्सी ख़रीदने से पहले ट्राई करने की तरह देखता है। ज़िंदगी को समंदर समझकर लहरों से कबड्डी खेलता है। सबसे ज़रूरी और कम ज़रूरी रिश्तों में फर्क करना सिखाता है। ऐसा लगता है कि वो दिमाग का डॉक्टर नहीं किसी न्यूज़ चैनल का एंकर हो जिसे धरती पर ज्ञान बांटने के लिए ही अवतार लेना पड़ा।

ऐसे वक्त में जब सलमान ‘बिग बॉस’ जैसे घटिया एंटरटेनमेंट के दम पर उछलते हैं, अमिताभ बच्चन बोरोप्लस को रिश्ते में सबका बाप बतला कर महानायक बने रहने का झूठ रचते हैं, शाहरुख ने अपनी रोमांटिक इमेज से हटकर एक ऐसा किरदार चुना जिसके लिए उन्हें सौ सलाम मिलने चाहिए। फिल्म का दूसरा हाफ सिर्फ शाहरुख और आलिया की बातचीत है। अकेलापन एक मिस्ट्री है जिसको एक डीकोड करता है और दूसरा अकेलेपन के दूसरे लेवल पर पहुंचता है। स्क्रीनप्ले बहुत शानदार है। कई जगह आप जमकर हंसेंगे और अगर शहर की उलझनों ने कभी आपको अकेला किया होगा तो आलिया की शानदार एक्टिंग आपकी आंखों से बहेगी भी।

जेनरेशन गैप की वजह से परिवार की भूमिका पर भी फिल्म लंबा उपदेश देती है। एडिटिंग इस फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी है। ऐसी कमज़ोरी कि इस अच्छी फिल्म में भी इंटरवल पर दर्शकों की तरफ से ‘थैंकगॉड’ की आवाज़ आती है।

मुझे अक्सर लगता रहा है कि सबसे अच्छी कविता या सबसे अच्छी फिल्म वही हो सकती है, जिसमें कई चीज़ें पंक्तियों या दृश्यों के बीच में छोड़ दी जाएं। इस फिल्म में कुछ भी छूटता नहीं। फिल्म इतना समझाती है, इतना समझाती है कि आप ‘पकने’ लगते हैं। असल वाली ज़िंदगी इतनी ‘डियर’ कभी नहीं होती कि तीन घंटे में सारी उलझनें सुलझा ली जाएं। न ही सबकी किस्मत में एक ‘दिमाग का डॉक्टर’ होता है।

सेंसर बोर्ड वाले पहलाज निहलानी ने ऐसी फिल्म में भी ‘बीप’ के लिए जगह निकालकर पूरी देशभक्ति का परिचय दिया है। हालांकि, ‘लेस्बियन’ को वो ‘लेबनीज़’ ही सुन और समझ पाए, इसीलिए जाने दिया। वो चाहते तो फिल्म के टाइटल पर भी नाराज़ हो सकते थे जैसा उनकी पूर्व शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी एक बिहारी मंत्री के ‘डियर स्मृति जी’ लिखने पर नाराज़ हो गईं थीं। इसके अलावा फिल्म से पहले ‘फिल्म डिवीज़न’ की सरदार पटेल पर डॉक्यूमेंट्री भी मुफ्त में आपको देखने को मिलेगी और आप राष्ट्रप्रेम के मामले में तरोताज़ा महसूस करेंगे।

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