यूं तो ये ज़माना यार है मेरा, बस ठहर के कोई बात नहीं करता

Posted on November 19, 2016 in Hindi, Mental Health

विवेक राय:

“वो रात काली ही सही, पर साथ देती है मेरे भीतर के अंधेरे का,
वो रास्ते सुनसान ही सही, पर बहुत अज़ीज़ हैं मेरे अकेलेपन को,
वो आवाज़ें अनजान ही सही, पर पहचान लेता हूं उन्हें खुद से,
वो ऊंचे टीले खामोश ही सही, पर आवाज़ लगा कर सुन ही लेता हूं खुद को”

अकेलापन, एक बेवजह की ऊब, और खुद से रूबरू होने की कोशिश! कुछ इसी जद्दोजहद को बयां करती हैं ये पंक्तियां। वो एक अच्छी जॉब करता है, अच्छी सैलरी भी है, एक अच्छी सी गर्लफ्रेंड भी है, सबसे मिलता है, उसके बहुत से दोस्त हैं फेसबुक पर, सैकड़ों लाइक्स आते हैं, अच्छे-खासे फॉलोवर्स भी हैं। फिर भी वो अक्सर खुद को अकेला महसूस करता है। उसे सबकुछ अनजाना सा लगता है, वो कभी फेक फेसबुक आई डी बना कर अनजाने लोगों से देर रात तक बात करता है तो कभी सिगरेट पीते-पीते कहीं दूर निकल जाता है। उसे ये सब अनजाने लोग अच्छे लगते हैं, पर क्यों?

ज़िंदगी की भागमभाग, जहां हमें स्कूल से लेकर कॉलेज तक बस खुद को बना कर रखना होता है। सब तय होता है, कब नहाना है, कौन सी यूनिफॉर्म कब पहननी है, किस केटेगरी के दोस्त बनाने हैं, कैसे खुद को बेहतर दिखाना है, कैसे सबके ध्यान का केंद्र बनना है। सब कुछ एक टाईमटेबल सा ही है, जहां इंसान खुद को ही भूल जाता है कि वो क्या है?

वो कभी-कभी हारना चाहता है, हां! वो क्रिकेट नहीं खेलना चाहता, वो इंजीनियर नहीं बनना चाहता, उसे हर वक़्त इंग्लिश में बात करना अच्छा नहीं लगता।वो कुछ वक़्त बिखरा, बिंदास रहना चाहता है और जब वो खुद की ही सफलताओं में कैद सा हो गया है तो हर बात नकली सी लगती है। हर बात जो वो कहता है, सुनता है, ऐसा लगता है जैसे सब बनावटी है। उसका अस्तित्व सिर्फ सफलता के कारण ही टिका है, वो अकेला कुछ भी नहीं।

अमूमन, एक ऐसी ही मनोदशा उन ज़िंदगियों में है जो लगती तो बहुत अच्छी हैं पर वास्तव में वहां एक सृजनात्मकता की कमी होती है। क्योंकि हमारी पारिवारिक और प्रतिस्पर्धी स्कूलिंग उस प्राकृत सृजनात्मकता को कहीं न कहीं मार देती है और होता ये है कि भावनाएं अव्यक्त ही रह जाती हैं। ऐसे में इंसान खुद को व्यक्त करने से डरने लगता है। ऐसे में वो खुद को अपने-अपने लैपटॉप में मशगूल कर लेता है, तो कभी-कभी फेक व्यक्ति बन कर सोशल मीडिया पर एक सच्ची ज़िंदगी जीने की कोशिश करता है, क्योंकि उसे यहां किसी से कोई डर नहीं होता या फिर वो अकेले घूमने निकल जाता है और खुद से ही बातें करता है। ये एक खतरे की घण्टी है, जहां डिप्रेशन में जाने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। लोग खुद से भागने के लिए, खुद को व्यस्त रखते हैं। कहीं कोई खुद को नशे में तो कोई खुद को भीड़ में पर ये समाधान तो नहीं।

एक बात और है, हमारे बीच बातें कम हुई हैं और शोर बढ़ा है। आज लोग सफर में भी मुश्किल से एक-दूसरे से बात करते हैं और बातों में भी संवाद-समझ कम, मनोरंजकता अधिक बढ़ गयी है। जैसे एक संवाद को समझते हैं- “हैलो, कैसे हो? अच्छा हूं, तुम? बस यार!”। एक पैटर्न सा बन गया है जहां वास्तविकता का आभाव होता है और हर बात एक बनावट में ढली लगती है। ये सूनापन कभी-कभी जीवन को नीरस कर देता है, इंसान एक मशीन सा हो जाता है।

खुद को संजोये नहीं, उन्मुक्त करें, पालतू जानवरों के साथ खेलें, बच्चों से बातें करें। अपने ऐसे मित्र बनाये जो आपकी तरह हों, जैसे किसी को टेनिस का शौक हो तो आप साथ में खेलें। खुद को समझें, हमेशा मनोरंजन के लिए टीवी के सहारे न रहें और न ही हँसने के लिए टीवी शो पर ही निभर्र रहें। याद रखिये दिल बहलाकर  हँसने से आप खुश नहीं हो सकते।

खुद को व्यक्त करें, लिखें, खुद को एक दिन हफ्ते में दें जहां आप खुद की तरह जियें। कविताओं को पढ़े, लिखें और खुद को महत्व दें। ये शायद बहुत साधारण बातें हैं पर खुद को प्रकृति में ही खोजे, समाज में ही खोजें। हमारे मेट्रो शहर भीड़ के शोर में अकेलेपन की ओर बढ़ रहें हैं। खुद को एक पद न बनाएं, संवेदनाओं को मरने न दें।

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