RSS क्यों मानता है JNU को दरार का गढ़?

Posted on November 2, 2016 in Hindi, Politics, Society

बीरेंद्र सिंह रावत:

कुछ समय पहले RSS का माउथपीस कहे जाने वाले पाञ्चजन्य पत्रिका में “जेएनयू – दरार का गढ़” नाम से एक लेख छपा। इस लेख में जेएनयू पर अनेक आरोप लगाये गये हैं। ये ऐसे आरोप हैं जिनकी जद में देश के सभी विश्वविद्यालयों के साथ-साथ भारत का संविधान भी आ जाता है। इस लेख को विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों के संदर्भ में पढ़ने पर यह बात और भी साफ़ हो जाती है।

भारत के संविधान का अनुच्छेद 15 भारतीय समाज में फैले जन्म आधारित भेदभावों को रेखांकित करता है। वह राज्य यानि कि स्टेट को जन्म आधारित भेदभाव न करने का निर्देश देता है। भारत के संविधान में ऐसे भी प्रावधान हैं जो राज्य को जन्म आधारित भेदभावों को दूर करने के लिए सकारात्मक भेदभाव करने के निर्देश देता है। यह निर्देश इसलिए हैं क्योंकि भारतीय समाज में जाति, धर्म, लिंग, नस्ल, जन्म-स्थान के आधार पर प्रत्यक्ष और परोक्ष भेदभावों की भरमार है।

ऐसे ही अनेक किस्म के भेदभावों की कथाएं रोहित वेमुला की “संस्थानिक हत्या” के बाद और ज़्यादा सार्वजानिक होने लगीं। क्योंकि दर्द के बयानों की ताकत बहुत ज़्यादा होती है, इसलिए यह ज़रूरी था कि ऐसी किसी भी कोशिश को समाज और देश तोड़ने का नाम देकर बदनाम किया जाए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि प्रतिगामी ताकतें स्त्री अधिकारों की बात करने वालों और वालियों को घर तोड़ने वाले/वालियां कहकर बदनाम करती आयी हैं। इसलिए यह कोई नयी बात नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि यह केवल पाञ्चजन्य जैसे पत्र करते हैं, अफगानिस्तान में तालिबान यही करता आया है और आईएस(IS) भी यही कर रहा है।

पाञ्चजन्य को नियंत्रित करने वालों की चिंता उनके लेख में साफ़ तौर पर व्यक्त हुई है। इस लेख में जेएनयू में पढ़ाये जा रहे पाठ्यक्रमों के बारे में लिखा गया है कि “यहां मानवाधिकार, महिला अधिकार, पांथिक स्वतंत्रता, भेदभाव एवं अपवर्जन, लैंगिक न्याय एवं सेकुलरिज्म से ओतप्रोत पाठ्यक्रमों को बढ़ावा दिया गया।” पाञ्चजन्य की चिंता यहीं पर खत्म नहीं हो जाती। उपर्युक्त लेख में यह भी कहा गया है कि “साथ ही यहां एक षड्यंत्र के तहत भेदभाव एवं अपवर्जन अध्ययन केन्द्र, पूर्वोत्तर अध्ययन केन्द्र, अल्पसंख्यक एवं मानवजातीय समुदायों और सीमान्त क्षेत्रों का अध्ययन केन्द्र सहित और भी कई अध्ययन केन्द्रों की स्थापना की गई।”

इनको चिंता इस बात है कि यहां महिलाओं के अधिकारों, पंथों की आज़ादी, भेदभावों और धर्मनिरपेक्षता के बारे में पढाया जाता है। पाञ्चजन्य में जिन सरोकारों को पढ़ाये जाने पर चिंता ज़ाहिर की गयी है, वे सभी भारत के संविधान में वर्णित मूल्य हैं। भारत की जनता जानती है कि इनकी ऐतिहासिक कोशिश भारत के संविधान को मनु के विधान से अपदस्थ करने की रही है।

पाञ्चजन्य के माध्यम से अपनी विचारधारा का विस्तार करने वाली ताकतों का वैचारिक भारत, सामान्यत: उत्तर भारत के ब्राह्मणों के हितों से आगे नहीं बढ़ता। इसलिए उन्हें पूर्वोतर राज्यों के जन-जीवन तथा उनके सरोकारों से जुड़ी बातें बेकार की लगती हैं। वैसे भी उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परियोजना में आदिवासी, ब्राह्मणवादी राष्ट्र की भट्टी में ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने के लिए हैं। क्या उनके द्वारा चलाये जाने वाले सामाजिक समरसता अभियान में एकत्रित किये जाने वाले आदिवासियों को उनके द्वारा खाया जाने वाला भोजन भी परोसा जाता है या नहीं? देश भर से ऐसी खबरें मिली हैं कि इस अभियान के तहत होने वाले कार्यक्रमों में केवल शाकाहारी भोजन परोसा जाता है। यह कैसी समरसता है जो “अन्य” को “अपने” में विलीन करने की ज़िद पर टिकी हुई है। शायद इसीलिए इनको “पूर्वोत्तर अध्ययन केन्द्र” जैसे केन्द्रों में हो रही पढ़ाई पर गुस्सा है। अंत में यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि सरस्वती के उपासकों को ज्ञान से इतना डर क्यों लगता है?

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