पार्थिव के लिए बहुत बड़े हैं धोनी के दस्ताने

Posted on November 24, 2016 in Hindi, Sports

अभिषेक चौधरी:

कुछ दिन पहले गौतम गंभीर की टेस्ट टीम में वापसी हुई थी, बड़े ही जोश से मैंने उसे नए दौर का ऑप्टिमिज़्म बताया था। ऑप्टिमिज़्म हमेशा से आइडियलिस्टिक शब्द ज़्यादा और रियलिस्टिक कम लगता है, तो हुआ यूं कि गंभीर साहब कुछ ख़ास नहीं कर पाए और उसी दौरान के एल राहुल ने रण्जी में रन बनाए और टीम में वापस। ये सब हुआ सिर्फ 2 टेस्ट के दौरान। खैर अब जब गंभीर साहब ने ऑप्टिमिज़्म को धता दिखाते हुए टीम से विदाई ले ली है तो एक और ऐसे खिलाड़ी की वापसी हुई जिनसे हमारे बचपन की यादें जुडी हैं। इमोशनल सपोर्ट इनको भी मिलेगा, पर मेरी तरफ से नहीं। बात कर रहा हूँ पार्थिव पटेल की।

हाँ वही पार्थिव पटेल जिन्होंने जब भारतीय टीम में डेब्यू किया था तब कोहली दिल्ली के लिए अंडर 14 क्रिकेट खेल रहे थे। पार्थिव में इंडियन क्रिकेट ने काफी इन्वेस्ट किया। हर खिलाड़ी जिसमें बोर्ड या मैनेजमेंट को कुछ प्रतिभा दिखती है, उन्हें मौके मिलते हैं… औरों से ज़्यादा। रोहित शर्मा के नाम आज एकदिवसीय क्रिकेट में 2 दोहरे शतक हैं क्योंकि उन्हें बहुत दिनों तक ढोया गया। पार्थिव को मौके मिले, पर इक्का दुक्का मौकों को छोड़ दें तो उन्होंने कभी कुछ ऐसा नहीं किया जिससे उन्हें टीम में ढोया जा सके। इसी दौरान दिनेश कार्तिक आये, छाये और फिर बुझ गए!

और इन दोनों के बाद एक खिलाड़ी आया, जिसके नाम पे आज फिल्में बनती हैं। धोनी का टीम में आना एक सपने के जैसा था, पर एक ऐसा सपना जो अपने साथ कई सपने चूर कर गया। उन्हें कप्तानी मिलते ही पार्थिव के टीम में आने के दरवाज़े बंद हो गए। और इस बीच उनका प्रदर्शन भी कुछ ख़ास उम्मीद जगाने लायक नहीं था। जब कभी धोनी को आराम को ज़रुरत पड़ी तो नमन ओझा या दिनेश कार्तिक को मौके दिए गए। अब जब धोनी टेस्ट्स में नहीं हैं तो निचले क्रम की बल्लेबाज़ी थोड़ी कमजोर नज़र आती है। आश्विन ने कुछ हद तक बल्लेबाज़ी की ये कमी पूरी की है। पर मुझे ये बताने की जरुरत नहीं के धोनी, धोनी थे। वैसे तो कई नाम हैं जो के अच्छा कर रहे हैं। करुण नायर कीपिंग कर सकते हैं, के.एल राहुल भी दस्तानो में नज़र आ चुके हैं। पर टेस्ट क्रिकेट में कीपिंग एक स्पेसलाइज़्ड जॉब हैं। इसी वजह से द्रविड़ के दौर में भी उनसे सिर्फ एकदिवसीय मैचों में कीपिंग कराई गयी।

साहा को चोट लगी है तो वो बाहर हैं पर वैसे भी उनका पिछले कुछ मैचों में विकेट के पीछे प्रदर्शन ऐसा रहा है (बल्लेबाज़ी में मैं उनसे धोनी वाली उम्मीद नहीं रखता, बेईमानी होगी) कि भारतीय टीम को विकल्प तैयार रखने चाहिए। पर विकल्प का मतलब ये नहीं के आप उन्हें वापस ले आएं जो एक-दो साल पहले तक आपके स्कीम ऑफ़ थिंग्स में नहीं थे। भारतीय टीम की बात छोड़िये पार्थिव पटेल की तो हर बार आईपीएल टीम बदल जाती है। आंकडे़ं देखिये, बहस बाद में। ये वही भारतीय टीम है जो यूथ-यूथ चिल्लाते हुए, द्रविड़, लक्ष्मन और दादा को दरवाज़े तक छोड़ के आई थी। आते वक़्त शायद दरवाज़ा खुला रह गया जो एक एक करके कभी पार्थिव तो कभी गंभीर अंदर आये जा रहे हैं।

सफल टीमें एक पद्धति पे चलती हैं, कुछ एक मैचों की असफलता उन्हें विचलित नहीं करती। संजू सैमसन ने इस सीज़न कुछ ख़ास प्रभावित नहीं किया है पर क्या वो कुछ समय पहले तक धोनी के उत्तराधिकारी नहीं माने जा रहे थे? या अगर आपको कुछ और नहीं देखना और सिर्फ प्रदर्शन को ही पैमाना बनाना है तो ऋषभ पन्त ने तो दिल्ली के लिये रणजी में कमाल ही कर रखा है।

खैर बीसीसीआई लोढा समीति की नहीं सुनती तो ये सब तर्क उन्हें जचेंगे नहीं। पार्थिव पटेल से मुझे कोई दिक्कत नहीं पर क्या उन्हें वाकई एक रेग्यूलर के तौर पर ट्रीट किया जायेगा या वो सिर्फ एक रिक्त स्थान भरने आए हैं। गंभीर भी आये थे, नहीं चले, चलते बने। मुझे डर है कि साहा के आते ही पार्थिव फिर से भुला दिए जायेंगे। आखिर स्कीम ऑफ़ थिंग्स में अंडर 19 के क्रिकेटर ही तो रहते हैं ना।

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