यूपी चुनाव में महागठबंधन की राह मुश्किल

Posted on November 11, 2016 in Hindi, Politics, Specials

के.पी. सिंह:

बिहार की तर्ज़ पर उत्तर प्रदेश में भाजपा के मुकाबले के लिए महागठबंधन बनाने का शोशा खुद राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी ने छोड़ा था जिसका खोखलापन पहले दिन से ही ज़ाहिर था। भाजपा भले ही खुद यह दावा करे कि इस बार उत्तर प्रदेश में उसकी सरकार बनने वाली है या राजनीतिक प्रेक्षक भी यह आंकलन करने लगे होंगे कि इस बार जिसकी भी टक्कर होगी वह सपा हो या बसपा, भाजपा से होगी। लेकिन भाजपा सचमुच मुख्य मुकाबले में आ गई है, यह तो उसे अभी प्रूव करना है।

भाजपा की बढ़ी हुई ताकत जो कि अभी तक परिकल्पना का विषय थी, उसे महागठबंधन का तराना छेड़कर कहीं न कहीं समाजवादी पार्टी ने प्रमाणिकता प्रदान करने का काम किया है जो कि एक बहुत बड़ी राजनीतिक चूक है। लेकिन जहां राजनीति, किसी वैज्ञानिक चिंतन और तार्किक औचित्य के बिना होती है वहां अवसरवादिता रणनीति का केंद्रबिंदु बन जाती है। समाजवादी पार्टी इस विडम्बना से आदिकाल से ही ओतप्रोत रही है जिसके कारण उसकी नीतियों की वजह से ही भारतीय जनता पार्टी कृषकाय से महाकाय होती गई, लेकिन स्वार्थपरता में अंधा समाजवादी पार्टी का नेतृत्व इतिहास से कोई सबक लेने को तैयार नहीं है। एक बार इसकी बानगी बिना सोचे-समझे महागठबंधन के छेड़े गए राग से ज़ाहिर हो गई है जिससे अब खुद मुलायम सिंह पल्ला छुड़ाने का रास्ता तलाशने लगे हैं।

मुलायम सिंह ने कभी भाजपा को कमज़ोर करने की ईमानदारी कोशिश नहीं की। जब वे जनता दल में थे उस समय भी उन्होंने यह प्रयास किया कि भाजपा को ताकतवर बनाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति के एक ध्रुव के रूप में स्थापित किया जाए। जबकि वे अपने को दूसरे ध्रुव पर स्थापित करें और इस ध्रुवीकरण से मुस्लिम मतों का एकमुश्त समर्थन जुटाकर सत्ता में स्थायी रूप से आसीन बने रहने का मंत्र वे साध सकें। मुलायम सिंह का यह ख्वाब तो पूरा नहीं हुआ लेकिन उनकी शातिर पैंतरेबाज़ी से भारतीय जनता पार्टी अवश्य फर्श से अर्श पर पहुंच गई।

आज केंद्र में मोदी को एकक्षत्र बहुमत है तो उसका बहुत कुछ श्रेय मुलायम सिंह की इस राजनीतिक चालबाज़ी को ही है। अगर उन्होंने अपने बेटे की सरकार को मुज़फ्फरनगर दंगे में प्रशासनिक सिद्धांतों के आधार पर कार्य करने दिया होता तो लोकसभा चुनाव में भाजपा की इतनी ज़ोरदार हवा नहीं बनती। लेकिन उस समय अखिलेश एक डमी मुख्यमंत्री थे और सत्ता संचालन की डोर पर्दे के पीछे उनके लोग संभाल रहे थे। जिसकी वजह से मुज़फ्फरनगर में पहले तो बात का बतंगड़ बना और इसके बाद राज्य की सरकार खुद एक पार्टी बन गई। नतीजतन पूरे प्रदेश भर में भाजपा के पक्ष में ऐसा ध्रुवीकरण हुआ कि लोकसभा में सबसे ज़्यादा सांसद भेजने वाले इस राज्य ने मोदी को छप्पर तोड़कर सीटें भेंट कर दीं।

अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा को इतना ज़बरदस्त बहुमत न मिलता तो लोकसभा में अकेले दम पर उसे पूर्ण बहुमत मिलना संभव नहीं था। खुद मोदी तक को यह आशा नहीं थी कि उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी को इतनी विराट सफलता मिलेगी जिसकी वजह से वे भी गठबंधन की सरकार बनने के अनुमान के चलते दूसरी पार्टियों में अपनी स्वीकार्यता के लिए मशक्कत करने में लगे थे। दूसरी ओर उनकी पार्टी में ही कुछ नेता ऐसे थे जो हंग पार्लियामेंट के अनुमान की वजह से एेन मौके पर मोदी को नेपथ्य में धकेलकर गठबंधन के लिए स्वीकार्य चेहरे का मेकअप सजाकर प्रधानमंत्री का पद हथियाने की तैयारी किए बैठे थे। लेकिन उत्तर प्रदेश की अप्रत्याशित मदद ने मोदी की सारी मुश्किलें दूर कर दीं।

इस बार भी महागठबंधन का राग अलापने के पीछे हमेशा उन्हें शिकस्त के लिए मजबूर करने वाली चालाकी ही प्रेरणा का काम कर रही थी। भाजपा का नुकसान करने की बजाय उनकी सोच में बसपा के पक्ष में हो रही मुस्लिम गोलबंदी को तितर-बितर करने की रणनीति थी। उऩका गणित यह था कि महागठबंधन का स्वांग मुसलमानों पर मनोवैज्ञानिक असर करेगा जिससे उनका पूरा समर्थन समाजवादी पार्टी के पाले में सिमट आएगा और बसपा रेल देखती रह जाएगी।

एक समय था जब लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक की दिग्विजय यात्रा का रथ रोककर लालूप्रसाद यादव ने सिद्धांतों के लिए प्रतिबद्ध नेता की ऐसी विश्वसनीय पहचान बनाई थी कि कुशासन और अपराधों की इंतहा के बावजूद बिहार में सम्मोहित मुस्लिम और सामाजिक रूप से दमित हिंदू तबकों ने उन्हें 15 साल तक शासन में टिकाए रखा। जब उन्हें चारा घोटाले में सज़ा हुई तब बिहार के ही नहीं सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा से उत्प्रेरित वर्ग में देश भर में उनके प्रति पूरी सहानुभूति रही।

बाद में उनका कांग्रेस से गठबंधन हुआ तो उन्होंने इतनी ईमानदारी से इसे निभाया कि बिहार विधानसभा के चुनाव में उनके कलंकित हो चुके करियर की वजह से उनसे दूर छिटक रही कांग्रेस को उन्होंने कृतघ्नता के लिए कोसा नहीं बल्कि जब कांग्रेस नेतृत्व संकट में हुआ तो उन्होंने सोनिया गांधी की वन-वे तारीफ की और उनका यह अंदाज़ लोगों ने उनके वफादार चरित्र की मिसाल के रूप में संज्ञान में लिया। लेकिन हकीकत यह है कि लालूप्रसाद यादव पर बिरादरीवाद और परिवारवाद सभी सिद्धांतों से ऊपर हावी होने का क्रम पहले ही शुरू हो चुका था।

वीपी सिंह को लालू अपने गुरु के रूप में स्वीकार कर चुके थे, लेकिन इसी सैद्धांतिक विचलन की वजह से वीपी सिंह के आखिरी समय उनमें और लालू में ठन गई। सामाजिक न्याय की तार्किक परिणति के लिए ईमानदार कोशिश के आग्रही वीपी सिंह चाहते थे कि लालू बिहार की गद्दी संभालते रहें और राष्ट्रीय क्षितिज पर दलित प्रधानमंत्री के उनके सपने को साकार करने के लिए रामविलास पासवान का समर्थन करें। लेकिन यह अकेले लालू की बात नहीं है, पूरी ओबीसी की राजनीति अपने चरम पर पहुंचने के बाद सवर्णों से कहीं ज़्यादा दलितों के प्रति दुर्भावनाशील होने की नियति की ओर अग्रसरता के लिए अभिशप्त रही है। इसलिए लालू को किसी भी कीमत पर रामविलास पासवान को अपनी छाती पर लादना कुबूल नहीं हुआ।

वीपी सिंह और उनमें आखिरी में यही दुर्भाव की वजह बनी, जिसके चलते लालू उनसे इतने नाराज़ हो गए कि उनके निधन के समय उन्हें श्रद्धांजलि तक देना लालू को गवारा नहीं हुआ। उनके चरित्र में आये इस बदलाव के शिकार अकेले वीपी सिंह नहीं रहे। हाल में मुलायम सिंह के परिवार से रिश्तेदारी होने के बाद उन्होंने सोनिया के लिए अपने सॉफ्टकॉर्नर को एक झटके में खूंटी पर टांग दिया और कांग्रेस की बहुत ही भोंडी ढंग से आलोचना शुरू करके वफादार चरित्र की अपनी छवि का अपने ही हाथों मूर्तिभंजन कर दिया। इसलिए लालू को किसी सिद्धांत और उच्च परम्परा से क्या लेना-देना है। वे मुलायम सिंह के हितसाधन के लिए अगर उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी की सीटों की मांग का त्याग कर दें, तो पारिवारिक साम्राज्य की संकीर्ण दृष्टि का यह अवश्यंभावी परिणाम है। लेकिन दूसरे क्यों मुलायम सिंह को सेहरा बांधने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हों। इस कारण महागठबंधन में पेंच फंसना ही था और यह पेंच फंसा तो महागठबंधन की कवायद परवान चढ़ने के पहले ही चिंदी-चिंदी हो गई।

बसपा को नीचा दिखाने के दुराशय के अलावा महागठबंधन के पीछे मुलायम सिंह के अपने खानदान में छिड़ी वर्चस्व की लड़ाई में एक पक्ष का पैंतरा भी था। शिवपाल सिंह अपने भतीजे अखिलेश के मुकाबले पार्टी में अपनी हैसियत को ऊंचा ले जाने के लिए महागठबंधन की प्रदर्शनी सजाने का उपक्रम कर रहे थे। 5 नवंबर को जब समाजवादी पार्टी के रजत जयंती सम्मेलन में शरद यादव, एचडी देवगौड़ा और अजीत सिंह जुटे तो शिवपाल सिंह बहुत खुश थे। वजह यह थी कि उन्हें यह गुमान हो रहा था कि इस प्रदर्शनी से वे गठबंधन राजनीति के नये महान शिल्पकार के रूप में अपने को स्थापित करने में कामयाब हो गए हैं। हालांकि उस मौके पर भी उनके इस स्वप्न की विसंगतियां और विरोधाभास उजागर थे।

मुलायम सिंह ने अपने राजनीतिक विस्तार के लिए जहां सोशलिस्ट परिवार को अपनी अगुवाई में जोड़ने का जतन हमेशा किया वहीं वे वामपंथियों को भी अपने साथ दिखाने से कभी नहीं चूके। लेकिन शिवपाल सिंह यादव ने सोशलिस्टों का तो जमावड़ा पार्टी के रजत जयंती सम्मेलन में लगा लिया पर कम्युनिस्टों को वे भूल गए, इसलिए गठबंधन राजनीति की प्रणेता बनने की उनकी मशक्कत अधूरेपन का शुरू में ही शिकार होकर अपनी विश्वसनीयता खो बैठी।

बहरहाल लालू ने सभी उपस्थित नेताओं की ओर से मुलायम सिंह यादव को बिना शर्त अपना नेता स्वीकार करने की पहल समाजवादी पार्टी के रजत जयंती सम्मेलन में अपने भाषण के समय की लेकिन दूसरों ने इसका अनुकरण करने में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं दिखाई। अब नीतीश कुमार ने अपने पत्ते खोलकर जनता दल यू को राजद की तरह राजनीतिक हाराकीरी से रोक लिया है। उन्होंने ज़ाहिर कर दिया कि उनकी अनिच्छा के बावजूद शरद यादव सपा के रजत जयंती सम्मेलन में चले गए होंगे पर वे उनके सामने जद यू में हैं क्या। जातिवादी सोच में अंधे नेता एक ऐसा जमावड़ा बना रहे हैं, जिससे उनके उत्थानशील करियर की बलि चढ़ जानी है इसलिए वे सतर्कता नहीं छोड़ेंगे।

नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षा भविष्य में तीसरे मोर्चे के पुनः विकल्प के रूप में केंद्रबिंदु में आने पर प्रधानमंत्री पद के सबसे शक्तिशाली दावेदार के रूप में अपने को तराश डालने की है। जबकि मुलायम सिंह उम्र के इस पड़ाव पर भी जहां उनका शरीर और इंद्रियां जवाब सी देने लगी हैं 2019 के चुनाव में प्रधानमंत्री बनने का अवसर हासिल करने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहे हैं। यह द्वंद्व सपा और जद यू के बीच कैर-बैर के रिश्ते की वजह बन गया है। इसलिए नीतीश ने आज इस बेमेल संगत को एक झटके में बिखेर डाला। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में कोई महागठबंधन बसपा के बिना बनाने की कल्पना नहीं की जा सकती। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि बसपा मौजूदा सूरतेहाल में किसी के साथ उत्तर प्रदेश में गठबंधन के लिए तैयार नहीं होगी।

गठबंधन या महागठबंधन का आधार किसी पारिवारिक या निजी शासन को सुदृढ़ करना नहीं हो सकता। रामो-वामो से लेकर संयुक्त मोर्चा युग तक जबकि गठबंधन की औचित्यपूर्ण राजनीति का स्वर्णिम काल था, सहभागी दलों को कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के बेस पर आपस में पिरोया जाता था। समाजवादी पार्टी अगर कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की चर्चा करने लग गई तो उसका तो शीरा ही बिखर जाएगा। समाजवादी पार्टी उस मोड़ पर जा पहुंची है जहां व्यापक सार्वजनिक हितों का कोई मूल्य नहीं है। कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनेगा तो उसमें लोकतांत्रिक तकाज़े को आधार बनाया जाएगा और समाजवादी पार्टी अगर ऐसे आधार को मंज़ूर करेगी तो उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

 

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