मेरा, आपका और अधिकाँश का सच

Posted on November 26, 2016 in Hindi, Masculinity, Sexism And Patriarchy, Society

श्रेयस कुमार राय:

मेरा, आपका और अधिकाँश का यही हाल है। गलती करके भी जब हम नहीं सीखते तो कितनी बड़ी गलती कर जाते हैं। हम सब की गलती हमें पता है पर हम उससे सीखते नहीं। उसे समझते तो हैं पर उसे सुधारते नहीं। कभी सोचा है ऐसा होता क्यूँ है? क्यूँकी, हम उसे एक गलती नहीं मानते।

PINK  देखने के बाद रवीश कुमार ने “Youth For Change” में अमिताभ से सवाल करते वक़्त बोला की “वैसे तो मैं एक अच्छा लड़का/इंसान हूँ, पर इस फिल्म को देखने के बाद जब थिएटर से निकला तो लगा मानो किसी ने मुझे नहा-धुला के साबुन-शैम्पू लगा के बाहर निकाला हो।”

किसी लड़की को देख कर उसका पीछा करना, उससे जबरदस्ती बात करने की कोशिश करना, उसको ताड़ते रहना, हम लोगों की ये हालत हो चुकी है कि जितना छोटा कपड़ा उतनी ही बड़ी आँख हो जाती है। पर हममें से अधिकाँश के लिए ये आम बात है। हर रोज़ होती है और हर रोज़ भुला दी जाती है। पर क्या ये सब इतना ही आम है? बिलकुल भी नहीं। पिंक के “NO” मीन्स “नो” वाली गंभीरता को याद करिए और समझिये की आप एक मानसिक रोगी हैं। आप एक ऐसे रोग से ग्रस्त हैं जिसका इलाज़ करने वाले भी इस संक्रमण से संक्रमित हैं।

हम सभी को ये मानना होगा कि हर चीज़ का एक तरीका होता है। किसी के प्रति आकर्षित होना अलग बात है, हम सब होते हैं। पर उसके लिए किसी का जीना हराम कर देना ये सही तरीका नहीं है। कोई अगर खूबसूरत लग रहा है तो प्यार और शालीनता से उसकी तारीफ़ करके देखिये। क्या एहसास होता है। वो मुस्कान सच में उसकी ख़ुशी का प्रतिबिम्ब होगी, जो उसकी ख़ूबसूरती को अलंकृत कर रही होगी।

आप अपनी भावनाओं को काबू नहीं कर सकते तो इसका मतलब ये नहीं कि आप किसी और की परेशानी बन जाएं। उसको भी उतनी ही स्वतंत्रता है जितनी कि आपको। आप अपनी गन्दी नज़रों के लिए उसके कपड़े, चाल-चलन को दोषी नहीं ठहरा सकते। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप कायर हैं और डरपोक भी क्यूंकि आप को पूरा आभास है कि आप गलत हैं और किस रूप में गलत हैं। पर आप उस गलती को मानने से डरते हैं। एक इंसान की यही खासियत है कि वह अपनी गलतियों को समझे और उसको सुधारने का प्रयास करे।

हम सभी को चेतना होगा, अभी नहीं तो कभी नहीं। इस युवा वर्ग को ये समझना होगा कि अभी अगर नहीं सीखा तो अगले 60 साल में भी नहीं सीख पाएंगे। बदलाव अभी की मांग है और बदलाव तभी आता है जब कोई समस्या होती है और समस्या का हल तभी ढूँढा जाता है जब समस्या को समस्या के रूप में देख पाते हैं। उसे समझ पाते हैं, उससे दूर होने का प्रयास करते हैं।

इन समस्याओं का सबसे पहला हल है अपने आप से निरंतर सवाल करते रहना कि क्या मैं सही कर रहा हूँ? मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ? मैं इसे क्यूँ नहीं रोक पा रहा हूँ? क्या इसे रोकना कठिन है? संवाद एक बहुत कारगर तरीका है इस समस्या से निज़ात पाने का। एक संवाद जो आपको अपनी गलतियों की ओर ध्यान देने पर विवश कर दे। आपको उसपे सोचने को मजबूर कर दे, आपको उसको सुधारने पर ज़ोर दे, मैं और आप, शायद इसकी शुरुआत कर चुके हैं। क्या एक संवाद स्थापित होता देख पा रहे हैं आप? संवाद करिए, समझदार बनिये और एक इंसान भी।

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