ट्रम्प का ‘विनिंग कार्ड’

Posted on November 10, 2016 in GlobeScope, Hindi, Specials

विवेक राय:

लोकतंत्र में ‘जनादेश’ वह शक्तिशाली वज्रासन है जो बड़ी-बड़ी भविष्यवाणियों, एग्जिट पोलों, विभिन्न निरपेक्ष-पक्षपाती सर्वेक्षणों को धता बता देता है। लोग मुद्दों से प्रभावित होते हैं, क्योंकि उनके पास ‘एडजस्टमेंट’ के विकल्प बहुत कम होते हैं, उन्हें चुनी हुई सरकार या प्रतिनिधि को अगले चुनावों तक झेलना ही होता है। जबकि मीडिया और अवसरवादी पूंजीपति, आलोचक आदि आसानी से सरकार से ‘एडजस्टमेंट’ कर सकते हैं। लोकतंत्र में चुनाव वह अवसर होता है जिसके कुछ महीने पहले भले ही राजनेता प्रचार का शोर कर रहे होते हैं, पर जनता शांति से मनन कर रही होती है। वो हर बात, मुद्दे को अपने अनुभव से नापती-तौलती है।

अमेरिका के  राष्ट्रपति में डोनल्ड ट्रम्प की अप्रत्याशित जीत भले ही ऐतिहासिक न हो पर ऊपर लिखी बातों को साबित तो करती ही है। अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वो बिना फायदे के इतिहास नहीं बनाता (हिलेरी क्लिंटन राष्ट्रपति बनती तो यह इतिहास ही रचता पर शायद अमेरिकी जनता के बहुमत को ये फायदे का सौदा नहीं लगा)।

चुनाव प्रचार में डोनल्ड के महिला विरोधी बयान के वीडियो को मुद्दा बनाया गया तो हिलेरी के इमेल्स का, पर जनता ने कम होती नौकरियों, स्वास्थ्य नीति, टैक्स सुधार, अवैध रूप से रह रहे अप्रवासी, चीन की चुनौती, अमरीकी कंपनियां ऐसे कई मुद्दे थे जिन्हें अमेरिकी जनता ने ज़्यादा महत्व दिया। अमेरिकी जनता ने दो मुख्य उम्मीदवारों में से एक को चुनना था जो उसने किया भी।

डोनल्ड ट्रम्प को बधाई तो देना ही चाहिए पर उनकी जीत का मतलब ये नहीं कि उन पर सवाल जो उन्होंने खुद ही खड़े किये हैं, वो भी महत्वहीन हो गए। उन्होंने अमेरिकी चुनाव प्रणाली को भ्रष्ट बताया, उम्मीद करनी चाहिए कि वो अब इसे अधिक ईमानदार और पारदर्शी बनाएंगे। उन्होंने नाटो (NATO) को भी अमेरिका का शोषक बताया था, उम्मीद है दुनिया अब अमेरिकी पूंजीवादी साम्राज्यवाद से मुक्त होगी और नए हमले अमेरिका नहीं करेगा। अमेरिका-रूस भाई-भाई हो जायेंगे और अच्छे सहयोगी की तरह सीरिया में शांति लाएंगे। उन्होंने कहा कि वो भारतीयों को पसन्द करते हैं तो शायद भारतीयों के लिए नौकरी के अवसरों में कोई कमी नहीं आएगी। वैसे, डोनल्ड एक शक्तिशाली राष्ट्रपति साबित हो सकते हैं, क्योंकि अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत है। अगर वो अमेरिका के अनावश्यक हस्तक्षेप को दूसरे देशों से कम करेंगे तो आधी दुनिया में शांति आ जाएगी। काश! इन सभी मुद्दों में डोनल्ड को अमेरिका का ”फ़ायदा” नज़र आये।

आज विश्व में नेतृत्व का खालीपन है, शक्तिशाली देश भी आज खोखले नेतृत्व के सहारे चल रहे हैं। हां, रूस के राष्ट्रपति पुतिन एक शक्तिशाली नेतृत्व के रूप में उभरे हैं, पर दुनिया के लिए उनका एजेंडा भी सिर्फ रूस का दबदबा ही है। नेतृत्वहीनता के इस सन्नाटे में जो चिल्ला कर खुद की आवाज़ बुलंद कर लेता हैं वो नेता बन भी जाते हैं पर जिनकी जुबान बहुत लम्बी हो, या जिनके नाख़ून बहुत लम्बे हों वो कुशल नेतृत्व नहीं कर सकते। कुशल नेतृत्व के लिए तो ”दिमाग” चाहिए जो बोलता नहीं सिर्फ करता है। उम्मीद है डोनल्ड ”बातों के बली” साबित नहीं होंगे।

आज दुनिया में संकीर्ण राजनैतिक आचरण हो रहा है, किसी एक समुदाय को निशाना बनाना, ऐसे मुद्दों को उठना जो लोगो के दिमाग में गुस्सा और प्रतिशोध पैदा करते हों। चुनावी प्रतिद्वंदिता वैचारिक न हों कर ”मुर्गो की लड़ाई” हो रही है। नेताओं को राजनीतिक गंभीरता का ध्यान रखना चाहिए। लोकतंत्र का भवन बड़े धैर्य और साहस से खड़ा होता है, ध्यान रखना चाहिए कि कहीं कोई ऐसा व्यवहार न किया जाये जो पूर्वज़ों की असफलताओ को खोदते-खोदते लोकतंत्र की नींव को ही खोद दे।

हालांकि, भारतीय चुनाव प्रणाली और अमेरिकी चुनाव प्रणाली में बहुत फर्क है, पर ये दोनो लोकतान्त्रिक व्यवस्था के स्वाभाविक रिश्तेदार हैं। भारत और अमेरिका दोनों ही आज बाज़ारवाद के अच्छे सहयोगी हैं और दोनो ही चीन को एक व्यापारिक खतरा मानते हैं। पर फिर भी अमेरिका के शब्दकोष में सही-गलत की जगह नफा-नुकसान है, इसलिए डोनल्ड से बहुत उम्मीद करना जल्दबाज़ी होगी। ट्रम्प को अभी बहुत कुछ समझना होगा, उन्हें भारत को समझना होगा कि भारत सिर्फ हिन्दुओ का देश नहीं बल्कि यहां पारसी जैसे छोटे समुदाय भी रहते हैं जिन्होंने भारत के विकास में एक बड़ी भूमिका अदा की है। मुस्लिम, बौध, ईसाई, सिख, यहूदी, जैन जैसे भी समुदाय हैं, जिनकी पहचान सिर्फ ‘भारतीयता’ ही है। ये मंदिरो-मस्जिदों का देश नहीं, बल्कि आस्थाओं और सामंजस्य की संस्कृति है।

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