किसान दिवस जो मुझे अनुमन कभी याद नही रहता और ना ही मेरे गाव के किसान का दर्द, जिसकी नजरों में भी अब निराशा ने जन्म ले लिया हैं. (भाग 2)

Self-Published

 

इतवार का दिन मतलब परिवार को समर्पित, इसी दिन शायद में जज्बातों को जिंदा रख, जी पाता हु फिर वह चाहे बच्चो के साथ खेलना हो या पत्नी जी के काम में हाथ बटाना, इसी के तहत बगल के रिटेल स्टोर में महीने का समाना लेने चले गये जहां अनाज को एक शानदार पैकिंग करके बेचा जाता हैं. यहाँ अनाज की रुपरेखा बाजार के मार्केटिंग ने ले रखी होती हैं. में यही द्रश्य हर बार देखता था लेकिन इस बार शायद मेरी नजर उसी द्रश्य को किसी और रूप रेखा देखना चाहती थी. इसका एक कारण भी था क्युकी उसी समय गाँव से मेरे एक रिश्तेदार का फ़ोन आया था जो एक किसान हैं और उसका पूरा एक हाथ खेतों में गेहूँ का दाना निकालते हुये मशीन में आ गया था. लेकिन किसान का ये दर्द यहाँ कही भी मार्केटिंग किये हुये अनाज में नहीं दिख रहा था. तो आज अपना फ़र्ज समझ कर यहाँ लिख रहा हु, कुछ ऐसे दुखांत जो मेरे जहन में हैं. आज आप से साँझा करना चाहता हु, शायद इसी से हम किसान की दयनीय दशा को समझकर कोई उपाय कर पाये जिससे हमारे देश के किसान के हलात सुधर सके.

 

गर्मियों की छुट्टी में अक्सर पंजाब जाना, इसका एक अपना ही आनंद होता था और मेरे सामने के घर से तीसरा घर का “तारी चाचा” अक्सर आते जाते हमें “सत श्री अकाल” बुलाकर जाते थे. और इनके जाने के बाद अक्सर दादी कहा करती थी “देखो इतना गबरु जवान लड़का हैं लेकिन खेती ने इसका जीवन बर्बाद कर दिया.” शायद ये दुखांत तब का हैं जब मैने अभी होश भी नही सँभाला था और अपने बचपन में ही था. ८० का दशक, ये ऐसा दोर था जब खेती के व्यवसाय में मशीन और मशीनी के औजार ने अपनी एक जगह बनानी शुरू कर दी थी. इसके तहत ट्रेक्टर, गेहूँ के बीज निकालने का ह्डम्बा आज घर घर में मौजूद था. ह्डम्बा, इसमें एक तरफ गेहूँ की बल्ली (गेहूँ का झाड़) डाला जाता हैं और ये अपनी उपयोगिता के तहत इस झाड़ को काटकर नीचे गेहूँ के दाने निकाल देता हैं और दूसरी तरफ गेहूँ के झाड़ को टोका कर इसे तुड़ी बना देता हैं. ये तुड़ी आगे पशुयो के आहार में दी जाती हैं. बस कुछ ऐसा ही द्रश्य होगा, खेत में ह्डम्बा लगा था और ऊपर बैठ कर तारी चाचा इसमें गेहूँ के झाड़ को अंदर डाल रहा था और बाकी किसान गेहूँ के झाड़ को खेत में से उठाकर तारी चाचा के पास ला रहे थे. आखरी गेहूँ की भरी थी, शायद पता नहीं क्या हुआ चाचा अपने पैर से इसे आगे थोड़ा सा ही खिसकाया था लेकिन ह्डम्बा इतनी जोर से चलता हैं की अपने पास आ रहे झाड़ को अपने भीतर जोर से खींच लेता हैं. इसी के तहत तारी चाचा का पैर घुटने तक इसके अंदर चला गया और बाद में डॉक्टर ने ऑपरेशन के दौरान इसे काट दिया. आज नकली पैर लगाकर चाचा चल फिर तो लेता हैं लेकिन एक ६.५ फिट से भी ज्यादा लम्बा इंसान जो शायद फौज में जाना चाह रहा था, शायद आज बाघा बॉर्डर पर परेड कर रहा होता लेकिन आज अंगहीन हैं. कुछ इसी तरह बस ४-५ साल पहले मेरे एक रिश्तेदार का हाथ इसी ह्डम्बा में आ गया था. जिसे बाद में डॉक्टर ने ऑपरेशन के दौरान काट दिया. यह भी ७ फीट के आस पास लम्बा पूरा जवान इंसान हैं लेकिन आज अंगहीन होने के बावजूद खेती के व्यवसाय में हैं और एक हाथ से ही आज बाइक, कार, ट्रेक्टर सब चला कर अपने जीवन का निर्वाह कर रहे हैं. एक और रिश्तेदार हैं जिनकी हाथ की उंगलियां पशुयो को चारा काटने वाली  मशीन में चारा कुतरते हुये आ गयी थी. इस तरह के दुखांत पंजाब के हर इंसान के जहन से जुड़े हुये हैं. और आज भी बदस्तूर जारी हैं.

 

लेकिन खेती के औजार से किसी भी तरह की दुर्घटना होने का अंदेशा बना रहता हैं और ये इतना भयंकर रूप धारण कर सकता हैं की किसी की जान भी जा सकती हैं. ट्रेक्टर, ये अलग अलग ताक़तवर काम के लिये अलग अलग इंजन की रूप रेखा में आते हैं अमुमन पिस्टन जो हर तरह की गाडी के इंजन में होता हैं और गाडी को धकलने का काम यही करता हैं. इसी की ताकत से आप की गाडी की, स्कूटर की, रेलवे इंजन की, हवाई जहाज के इंजन की ताकत निर्धारित होती हैं. इसी की रुपरेखा में एक ट्रेक्टर आया जिसे गाव की भाषा में “आशा” नाम दिया गया, इसका एक पिस्टन हैं लेकिन बड़ा होने के कारण ये ट्रक जितना बोझ खींच लेता हैं लेकिन इसकी एक तकलीफ हैं अगर ये बोझ को खींचने में नाकामयाब रहे तो इसके आगे वाले टायर हवा में उछल जाते हैं और उलटकर, पीछे बंधी ट्राली के साथ टकरा सकते हैं. नतीजन ट्रेक्टर पर बैठे किसी भी इंसान के साथ हादसा हो सकता हैं. ९० के शुरूआती दशक में, दादी के एक रिश्तेदार के यहाँ अफ़सोस करने गये थे, तब कुछ ज्यादा पता नही चलता था लेकिन यहाँ एक १८ साल के नोजवान की मोत इसी तरह आशा ट्रेक्टर से हुई थी. रेती को ट्राली में भरा हुआ था और ट्रेक्टर इसे खींचकर चल भी रहा था, पता नही रास्ते में क्या हुआ की ट्रेक्टर के आगे के टायर हवा में उछल कर ट्राली के साथ टकरा गये और नोजवान की वही मोत हो गयी. ये दो भाई थे, और बड़ा होने के कारण इनके पिता जी की इनसे बहुत ज्यादा उम्मीद थी. छोटा भाई अभी ८-१० साल का ही था. उस दिन एक नोजवान के साथ साथ अगर कहा जाये की एक परिवार की मोत हुई हैं तो कही भी गलत ना होगा. आज भी इस तरह की दुर्घटना पंजाब के किसान के जीवन की एक आम सी बात हैं. इस तरह के हादसे आज भी जारी है.

 

आज खेती के काम में मशीन ने अपनी ही एक जगह बना ली हैं और इससे हादसे भी होते हैं, मेरी मासी अक्सर कहा करती थी की किसान को शारीरिक ताकत के साथ मानसिक रूप से भी बहादुर होना चाहिये क्युकी खेतों में ना जाने कब साँप निकल आये और किसान को किसी भी हालत में अपना खेत छोड़कर भागना मंजूर नही होता. किसान के लिये खेत का दर्जा शायद माँ से भी कही ज्यादा हैं, लेकिन मेरी वही मासी कही चिंता में डूब जाती थी जब मासी का लड़का जो की खेतों में गया हुआ हैं जरा सा भी देरी से घर पोहचता था. मेरे गाव में, पंजाब में आज भी ऐसे दुखांत दिन प्रतिदिन होते हैं लेकिन कही भी ये खबरों में ना लिखे गये हैं और ना ही लिखे जायेगे. लेकिन में आपको यहाँ पर इनसे अवगत करवाता रहूंगा और आप से भी बिनती हैं की आप भी लिखे आप के प्रांत के किसान की दुर्दशा तभी शायद हम मिलकर एक नई सुबह को अंजाम दे सके अन्यथा किसी और से कोई भी उम्मीद करनी बेईमानी सी होगी, हमें पहल करनी होगी. जाते जाते एक द्रश्य को बयाँ करके जाता हु, मेंने देखा हैं किसान को, जो नीचे जमीन पर हाथ जोड़े बैठा था और चारपाई पर एक दूकानदार जिसके यहाँ से किसान ने खेती किट नाशक दवाई ली थी लेकिन उसके पैसे वह नही दे पाया था. सोचिये आज किसान किस दयनीय स्थिति में हैं और किस तरह ये अन्नदाता अपने परिवार का निर्वाह कर रहा होगा. जय हिंद.

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