क्या बेटी भी अपने माँ-बाप के अंतिम समय में उनके साथ रह सकती हैं ?

Posted by हरबंश सिंह
December 30, 2016

Self-Published

भारत बदल रहा हैं, में कही भी इसे नकार नहीं रहा अक्सर बदलाव के साथ साथ सामाजिक जीवन पर भी इसके कई तरह से प्रभाव होते हैं. में इस तरह के प्रभाव को कही भी अच्छे और बुरे मापदंडो से नहीं तोल पाऊंगा क्युकी अक्सर सुख और दुःख की व्याख्या करनी मुश्किल होती हैं. इसका एक उदाहरण भी दूँगा जिस तरह सदियों से हर परिवार पुत्र के रूप में औलाद को पाने का सुख संजोये हुये रखता हैं. लेकिन आज कई ऐसे दम्पति हैं जो एक ही संतान को अपनाने में विश्वास रखते हैं और उनके लिये बेटा और बेटी इसमें कही भी कोई फर्क नही हैं. शायद इस तरह के फैसलों के पीछे बदल रहा सामाजिक जीवन भी हैं जहाँ माँ-बाप आर्थिक रूप से और समय के आभाव के कारण भी एक ही संतान को अपनाने का निश्चय कर रहे हैं. अब अगर पहली संतान बेटी हयी तो क्या होगा ? सदियों से तो यही कहा जा रहा हैं की बेटी पराया धन हैं और बेटा ही वंश को आगे बड़ा सकता हैं और बेटा ही माँ-बाप के बुडापे का सहारा हैं.

में अगर इस पर अपना व्यक्तिगत उदाहरण भी देना चाहता हु, हम चार भाई बहन हैं. मेरे माता पिता के हम दो बेटे हैं और रिश्ते में ताया-ताई जी (जो की हमें हमारे माँ-बाप से भी ज्यादा प्रिय हैं.) उनकी दो बेटियाँ. मेरी दोनों बहने उम्र में मुझ से बड़ी हैं और मेरे लिये वह दोनों बहन से भी कही ज्यादा सम्मानित और प्रिय हैं. लेकिन आज से कुछ २५-३० साल पहले अक्सर मेरी माँ मेरी ताई जी को कहा करती थी की “एक बेटा होना ज़रुरी हैं. हम हैं भी किसान अगर बेटा नहीं होगा तो हमारे खेतों को बाड़ को करेगा.” में भी कहा कम था, उम्र तो उस समय १४-१५ साल की रही होगी लेकिन ताऊ जी के उस फैसले में अक्सर हां मिलाता था जो मेरी बहनों को १२ कक्षा के बाद पड़ने से मना कर रहा था. क्युकी उन दिनों कॉलेज की छवि जिसे हमारी फिल्म इंडस्ट्री पड़ाई के विपरीत मौज शोक और गुंडा गर्दी का अड़ा बनाकर पेश करती थी वहा में अपनी बहनों को किस तरह जाने की इजाजत दे सकता था. और हर घर की तरह हमारे यहाँ भी मदों का फैसला औरतों पर थोपा जाता था. और उन्हें मानना भी पड़ता था. लेकिन आज २०१६ में ताऊ जी को शारीरिक रूप से लकवे के मरीज हैं, उम्र भी ७२ साल के आस पास होगी. चल पाते हैं लेकिन अक्सर इन दिनों में उन्हें किसी के सहारे की जरूरत होती हैं. और में अपनी मजबूरी के चलते पंजाब से कही दूर रोजगार की तलाश में मुँह छुपाये बैठा हु, कई कई बार जीवन में समय के आभाव के चलते में 1-२ महीने तक उनसे फ़ोन पर बात भी नहीं कर पाता हु. लेकिन मेरी बड़ी बहन, पिछले १२-१४ साल से मेरे बड़े पापा और बड़ी माँ की सेवा कर रही हैं. इस समय बुजुर्ग अपनी शारीरिक तकलीफों की वजह से अक्सर परेशान रहते हैं हैं लेकिन मेरी बड़ी बहन उनकी सेवा में उफ़ तक नहीं करती. और १२ महीने ३६२ दिन एक पैर पर उनके सेवा में लगी रहती हैं. यकीन मानीये, आज मेरी बहन का दर्जा मेरी नजरों में कही ऊँचा हैं. और आज में शार्मिंदा भी हु,मुझे क्या अधिकार था मेरी बहन को कॉलेज ना जाने देने का. शायद अगर मेरी बहन को हमारे उस फैसले ने बाधित ना किया होता तो वह आज कही और आसमान की उचाइयो को छु रही होती. इसलिये ही में आज अपनी बहन से अक्सर कहता हु की अब वह मुझे रक्षाबंधन पर राखी ना भेजा करे, वह मुझसे कही ज्यादा बहादुर और सक्षम हैं.

इसी संदर्भ में “तारा बहन” का उदाहरण भी देना चाहूंगा, अपनी रिटायरमैंट के बाद काफी वर्ध हो गये थे और उसी के पश्चात  हमारे पीछे वाले उनके खुद के घर में रहने आये थे. मेरी माँ और तारा बहन के बीच अक्सर बात चीत होती रहती थी और ये दोनों पढ़ोसियो से ज्यादा दो बहनों की तरह बात किया करती थी और में इन दोनों की बात चीत को अक्सर सुनता रहता था. वह अपने माँ-बाप की इकोलती संतान थी. और जब उनकी शादी के लिये कोई भी परुष इस बात पर राजी ना हुआ की वह शादी के बाद तारा बहन के साथ इनके घर में रहेगा. तब तारा बहन ने ता उम्र शादी ना करने का फैसला किया. अपनी निजी जिंदगी में विजापुर के किसी सरकारी हस्पताल में वह एक सरकारी नर्स थी और काम के बाद अपने माँ-बाप की सेवा करती थी. जिंदगी कुछ यु ही गुजरती रही लेकिन इसी के सफर में पहले उनके पिता जी का देहांत हो गया और बाद में माता जी का. अब वह अकेली अपनी किसी बुजुर्ग रिश्तेदार के साथ रहती थी. स्वभाव बड़ा ही नर्म था लेकिन उनकी जिंदगी की कठिनाइयों को जानने के बाद उनके मजबूत व्यक्तित्व की छबी उभर आयी थी. तारा बहन के रूप में एक उस संतान को जाना जो हर माँ-बाप चाहता हैं की उनके बुढ़ापे का सहारा बने.  लेकिन अपनी कैंसर की बीमारी के चलते उनका और मेरी माँ का बहनों का रिश्ता ज्यादा समय तक जीवित ना रह सका और एक दिन तारा बहन इस दुनिया को अलविदा कह गयी. लेकिन उनके जाने की ही देर थी की पुरुष प्रधान देश में उनके पुरूष रिश्तेदार उनकी तेरवी पर ही उनकी जायदाद के लिये झगड़ रहे थे.

 

हाँ में भी दोषी हु, कही ना कही हम सब दोषी हैं, हमने ही हमारे समाज में प्रतिष्ठा की छवि बना रखी हैं और इसके मापदंड सिर्फ ओ सिर्फ औरत के लिये बने हैं. क्युकी औरत शारीरिक रूप से कमजोर हैं और पुरुष इसी के आधार पर अपने आप को हर जगह और समाज में सर्वोच्च होने का मान प्राप्त करता हैं. लेकिन कही यही तुलना मानसिक, संतोष, धैर्य और हौसले के समीकरणों पर होती तो हमारे सभ्य समाज में औरत का मुकाबला परुष कभी भी किसी परीक्षा में ना कर पाता. मैने तो अपनी बहन से और तारा बहन से सिख लिया की ज़रुरी नहीं आप के जीवन के अंतिम समय में सिर्फ और सिर्फ आप का बेटा ही आपकी देख भाल करेगा यहाँ बेटी भी अपना कर्तव्य निभा सकती हैं. बस अब हमें सब को मिलकर समाज की मानसिकता बदलने की जरूरत हैं जो संतान में सिर्फ और सिर्फ बेटे को अहमियत देता हैं. जय हिंद.

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