क्यूँ हमें हिंदी की अंग्रेज़ीकरण से डरना चाहिए

Posted by Shubham Singh
December 20, 2016

Self-Published

कल “यूथ की आवाज़” से अच्छी खबर सुनने में आयी। अब हम सब भी इस “वेबसाइट” पर अपने लेख लिख कर प्रकाशित कर सकते हैं। गौर करें, “प्रकाशित” कर सकते हैं। लेकिन जब आप इस खबर को पढ़ेंगे, तब आप शीर्षक में ये लिखा पाएंगे: “यूथ की आवाज़ पर अपने लेख अब खुद करें पब्लिश”। जी हाँ, लेख प्रकाशित नहीं होते आजकल, “पब्लिश” होते हैं। आप लोगों से अपना लेख “शेयर” करते हैं, बांटते नहीं। मैं लेखक पर उंगली नहीं उठा रहा हूं। लेखक तो बेचारा ये चाहता है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग उसे पढ़ें, और ज़्यादातर लोगों को ऐसा पढ़ना पसंद है। और मुझे इसी बात का तो डर है। मिलावट के ज़माने में, अब भाषाओँ में मिलावट शुरू हो गयी है। बाकी भाषाओं का तो मुझे ज्ञात नहीं, पर हिंदी की जो भद पिछले पांच-दस साल में पिटी है, वो पिछले पचास सालों में नहीं देखने को मिली। क्या कारण है, जो अब हम सही हिंदी लिखने या बोलने में असमर्थ हैं? क्यूँ हम हिंदी कमेंटरी कहते हैं, हिंदी विवरण नहीं? क्या कारण हैं जो हिंदी अखबारों में “गवर्नमेंट” शब्दों से हमारा सामना हो जाता है? कारण तो हम और आप ही हैं, लेकिन हम ऐसे कैसे हो गए?

हमें ऐसा हमारी शिक्षा-व्यवस्था ने बनाया है। आप लोगों का पता नहीं, लेकिन मैं केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सी.बी.इस.ई) से पढ़ा हूँ और हमारे बोर्ड में दसवीं के आगे उतने ही लोग हिंदी पढ़ते हैं, जितने राहुल गाँधी को देश का अगला प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं। कई लोग अंको के लालच में आठवीं में ही हिंदी छोड़, संस्कृत पढ़ने लग जाते हैं। दो सालों के बाद ना हमें संस्कृत पता रहती है, ना ही हिंदी। हमें बस अपने दसवीं के प्रमाणपत्र से मतलब रहता है, जिसका काम आगे केवल जन्मतिथि प्रमाणित करने में आता है। ग्यारहवी-बारहवीं में अचानक सबके सामने भरी भरकम विषय आ जाते हैं कि भाषा पर हम उतना ही ध्यान देते हैं, जितना आमतौर पे हम भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को देते हैं। फिर इंजीनियरिंग या हिंदी में कहूँ तो “अभियांत्रिकी” आती है। नरेंद्र मोदी के भक्तों से ज़्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज खुलने का घाटा ये हुआ है, कि अब हमें ना ही ढंग से अंग्रेजी आती है, और ना ही हिंदी।

रही सही कसर इन्टरनेट ने पूरी कर दी है। फेसबुक और ट्विटर पे स्टेटस “माह लाइफ माह रूल्ज़” डलता है, मेरी ज़िन्दगी, मेरे रंग-ढंग नहीं। टूटी-फूटी अंग्रेजी से हम स्टेटस डाल कर आराम से सोते हैं, और कहीं अपने कब्र में शेक्सपियर और प्रेमचंद फूट फूट कर रोते हैं। क्या मिलेगा इससे? मैं ये जनता हूँ, की हर शब्द का शाब्दिक अनुवाद संभव नहीं है, और ना ही मुझे अंग्रेजी से कोई दिक्कत नहीं है। एक देश में विविध प्रकार की भाषाएं, बिना किसी विलयन के समृद्ध रह सकती हैं। लेकिन हमारे ग़ुलामो वाली मानसिकता हमें कहीं हिंदी बोलने से रोकती है। हिंदी और अंग्रेजी भाषा का विलय करके हमने हिंगलिश बनाया है, जिसका महत्व अरविन्द केजरीवाल के बयानों के जैसा मुझे आजतक समझ नहीं आया।

परिवर्तन अनिवार्य है, आगे बढ़ने के लिए यह मैं मानता हूँ, लेकिन हम परिवर्तन बिना हिंदी भाषा को नुकसान पहुंचाए भी तो ला सकते हैं। हमें ना केवल हिंदी को बढ़ावा देना है, बल्कि उसे “अंग्रेज़ीकरण” से बचाना भी है। क्या आप साथ हैं?

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