2016 में दिखा महिलाओं का दम, क्यूंकि हम नहीं हैं किसी से कम

2016 अपने आखिरी दौर में है। लेकिन यह साल अपनी बेहतरीन फिल्मों और कंटेंट के लिए अगले साल भी चर्चा में बना रहेगा। यह वर्ष फिल्म इंडस्ट्री में महिला सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दों को उजागर करने के लिए सराहा जाएगा। इस वर्ष कई कमाल की फिल्में आई, लेकिन केन्द्र में महिला से जुड़े मुद्दों को तवज्जो दी गयी। किसी ने वीमेन इंपावरमेंट पर जोर दिया तो किसी ने लड़कियों और औरतों को अपने मर्जी से ज़िंदगी जीने की सीख दी। आमतौर पर सिनेमा जगत को व्यवसायीकरण के रुप में देखा जाता है। परन्तु इस वर्ष निर्माताओं और निर्देशकों ने व्यवसायीकरण की परवाह ना करते हुए समाज की कुरीतियों को अलग-अलग तरीके से परदे पर प्रस्तुत किया। वाकई हमारे डायरेक्टर और प्रोड्यूसर ने अपने अनुभव का नायाब नमूना पेश किया है। किसी से यदि इस वर्ष आई फिल्मों में चुनाव करने को कहा जाए तो शायद ही वह कर पायेगा।

नीरजा और सरबजीत जैसी फिल्मों ने आधी आबादी के अन्दर एक नया उत्साह जगाया। दोनों हीं फिल्में सच्ची घटना पर आधारित हैं और दोनों ने हीं औरतों के संघर्ष की नई मिसाल कायम की। वहीं जय गंगाजल, निल बट्टे सन्नाटा, अकीरा ने बिना किसी मेल एक्टर के परदे पर शिरकत की। ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा धमाल ना मचा पाई हों, लेकिन इन फिल्मों ने बिना मेल लीड के एक अलग हीं एग्ज़ाम्पल सेट किया है। उड़ता पंजाब और डियर जिन्दगी दोनों ही फिल्में एक-दूसरे से काफी अलग है पर दोनों फिल्मों में एक लड़की को समाज से संघर्ष करता दिखाया गया है जो एक हद तक काफी मिलता जुलता है। धमाका तो तब हुआ जब पिंक अपने दमदार कॉन्सेप्ट के साथ रिलीज होने से पहले कई जगहों पर हिट घोषित कर दी गई। इस फिल्म ने समाज द्वारा लड़कियों के कैरेक्टर को ज़ज करने के तरीके पर सवाल खड़ा कर दिया।साल को अलविदा कहने उतरी दंगल ने तो जो रही सही कसर थी उसे भी पूरी कर दी और बॉक्स ऑफिस पर धमाकेदार इंट्री के साथ पिछड़ी मानसिकता को अखाड़े में लाकर खड़ा कर दिया। इस फिल्म की खास बात ये है कि एक बाप समाज को तमाचा मारते हुए अपनी बेटियों को अखाड़े में उतार देता है। ये तो हो गई फिल्म की बातें लेकिन हकीकत में भी साक्षी मलिक ने ओलंपिक मैडल जीत कर साबित कर दिया कि दंगल का सुल्तान सिर्फ लड़के नहीं बल्कि लड़कियां भी हो सकती है।

फिल्मी बातें बहुत हुई। अब कुछ समाजिक सरोकार की बातें करना भी बहुत ज़रूरी है। जब हम चिल्लाते रहते हैं कि हमारे लिए हमारे समाज ने कुछ नहीं किया, हमारी सरकार ने कुछ नहीं किया। मैं ये नहीं कह रही कि विरोध करना गलत है। कुछ हद तक सही भी है। माना कि बदलाव हो रहा है पर यदि क्षणिक विकास से हम संतुष्ट हो जाएंगे तो शायद बड़े स्तर के बदलाव का स्वाद चखने का मौका हमें ना मिले। इसलिए विरोध करना भी जरूरी है। लेकिन बात-बात पर समाज को कोसना सही नहीं है। जब हम खुद को अबला और असहाय नारी साबित करने में तुले थे, जब हम समाज के दूसरे तबके का पुरजोर विरोध करने में लगे थे। वहीं दूसरी तरफ पी. वी सिन्धु, साक्षी मलिक, दीपा मलिक, दीपा कर्माकर, प्रियंका चोपड़ा, सायना नेहवाल और सानिया मिर्जा जैसी लड़कियां अपनी कामयाबी का  लोहा मनवा रही थी। वह हर दूसरी लड़की को कुछ कर गुजरने की सीख दे रही थी। यह संदेश दे रही थी कि क्या हुआ यदि इस समाज ने हमारे लिए कुछ नहीं किया। क्या हुआ यदि सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया। हम इतने सबल हैं, हम इतने मजबूत हैं कि सरकार और इस समाज का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं। फिर यही सामाज हमारे नाम की मिसाल देने पर मजबूर हो जाएगा। हमें समाज का अहम अंग मानने पर और सम्मान देने पर मजबूर हो जाएगा। मत गिड़गिड़ाओ, तुम्हारे गिड़गिड़ाने से तुम्हारी कमज़ोरियां झलकती है। इतिहास गवाह है, कमज़ोर तबके का हमेशा से दमन होता आया है, इसलिए कमज़ोर नहीं मजबूत बनकर दिखाओ।

पर हम उनके इन छुपे हुए संदेशों को समझ नहीं पाते। उन्होंने जिस तरह का मुकाम हासिल किया है उस पर अमल करना नहीं चाहते। उन लड़कियों कि राह भी आसान नहीं रही होगी, जिनकी आज मिसाल दी जाती है। यदि “नीरजा भनोट” अपनी ज़िंदगी में आई मुश्किलों से हारकर सपनें देखना छोड़ देती और घर में बैठकर विरोध शुरू कर देती तो क्या आज डायरेक्टर और प्रोड्यूसर उसकी जीवनी को परदे पर लाने की सोचते भी? यदि फालतू के विवादों से डरकर “सानिया मिर्जा” घर बैठ जाती। तो उनको देखकर वो लाखों लड़कियां जिनमें जोश का संचार हुआ है समाज की बुराइयों का डटकर सामना करने का, क्या वो हो पाता? कोई भी अपना आदर्श उन्हें चुनता है जिसमें हौंसला हो कुछ कर दिखाने का। उन्हें नहीं जो अपना मुंह छुपाकर विरोध प्रदर्शन करते हैं। अब यह हमें तय करना है कि हम क्या चाहते हैं?

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