ज्ञान भी भ्रष्टाचार को जनम देता हैं और आप इससे सवाल भी नही कर सकते बस यही कहिये की परमात्मा के सामने तो हम लाचार हैं. (भाग 1)

Posted by हरबंश सिंह
December 31, 2016

Self-Published

जिंदगी अक्सर हमसे बात करती हैं और कुछ दिखाने की कोशिश भी करती हैं लेकिन हम इससे हमेशा मुँह फेर खड़े होते हैं और उस हकीकत को देखने से साफ़ साफ़ मना कर देते हैं जिस सच को हमारी जिंदगी हमारे ज़ेहन के माध्यम से हमें बार बार याद करवाना चाहती हैं. इसका एक कारण ये भी हो सकता हैं की आज शायद हम सामाजिक बुराई को अपनाने में किसी भी तरह से झिझक नहीं रहे और जब परिणाम हमारी अपेक्षा के विपरीत होता हैं तो इसे उपर वाले की मर्जी करके भूलने में ही समझदारी समझते हैं. इसका उदाहरण “भ्रष्टाचार” के रूप में दे सकता ही. अक्सर भ्रष्टाचार का जिक्र होने से लाल बती, खाकी वर्दी, काला कोर्ट और अफसर साही की रूप रेखा ही उभर के सामने आती हैं. लेकिन कभी सोचा हैं की ज्ञान के द्वारा भी हमारे समाज में भ्रष्टाचार किया जा सकता हैं. अगर नहीं तो सोचिये ? जिंदगी कुछ कहना चाहती हैं आप से की किस तरह हमारी बहुमूल्य जिंदगी इस ज्ञान के भ्रष्टाचार की शिकार हो रही हैं और हम अपनी अज्ञानता के चलते किस तरह हाथ जोड़ लाचार बन कर खड़े होते हैं.

ये दर्द बया, २०१० के सितम्बर महीने का हैं. हमारी शादी के लगभग ६ सालो के बाद हमारा बड़ा बेटा नवराज का जन्म हुआ २००९ के नवम्बर महीने में हुआ था. तो जाहिर हैं हम सभी इस नये मेहमान के मेहमान के आने से बहुत खुश थे. इसी बीच मई २०१० में परिवार को गुडगाव अपने साथ ले आया. सब कुछ सही चल रहा था, इसी बीच टीकाकरण के सिलसिले में पुराने गुडगाव शहर में गुरुद्वारा के पास एक डॉक्टर से भी जान पहचान हो गयी. डॉक्टर साहिब काफी बुजुर्ग थे तो इमानदारी पर तो कोई सवाल ही नही हो सकता. बस सितम्बर महीने में शाम को कसटर्ड बनाया था. और सिर्फ दो चम्मच नवराज को भी खिला दिये. रात को लगभग २ बजे नवराज ने उलटी कर दी. सब कुछ साफ़ करने के बाद हम फिर सो गये लेकिन ५ बजे नवराज ने फिर से उलटी कर दी. अब कुछ शक हो रहा था और नींद कही दूर भाग गयी थी. अब दूध में थोड़ी चाप पत्ती डाल कर उसे ठंडा कर नवराज को पिलाया लेकिन उसने फिर ८ बजे उल्टी कर दी.

बस बाजार खुलते ही हम बुजुर्ग डॉक्टर जी के पास चले गये. डॉक्टर साहिब सरदार नही थे लेकिन हमसे पंजाबी में बात कर रहे थे. हमसे अपने डॉक्टर होने का अनुभव भी शेयर किया और दिलासा भी दिया की सब ठीक हो जायेगा. बस ये दवाई बच्चे को दीन में तीन बार ५ ml पिला देना. घर से कहा गया अब सब ठीक हो जायेगा मुझे ऑफ़िस जाना चाहिये. लेकिन बस २ घंटे में ही घर से फोन आ गया, नवराज ठीक नही हैं. अब उसे उलटी के साथ साथ दस्त भी लग गये हैं. में ऑफ़िस से घर आते आते डॉक्टर साहिब के अस्पताल भी चला गया, ये उनकी क्लिनिक से दूसरी जगह था. और यहाँ मरीज को भर्ती करवाने की सुविधा भी थी और अस्पताल में २-३ स्टाफ मैंबर भी बाहर बैठे बात कर रहे थे. लेकिन अंदर कोई भी किसी भी तरह का मरीज नही दिख रहा था. डॉक्टर साहिब से बात हुई और उन्होंने दवाई बदल दी और दिलासा भी दिया की सब ठीक हो जायेगा.

में घर आया, लेकिन अब नवराज हर आधे घंटे में उलटी और दस्त कर रहा था, उसे कुछ भी पानी भी नही पच नहीं रहा था. उसके मासूम चेहरे को में देख रहा था वह अभी हस रहा था. मानो दिलासा दे रहा हो की सब ठीक हो जायेगा. लेकिन में कही रो रहा था. मैने सोच लिया था की अगर नवराज को कुछ भी हो गया तो में इस दुनिया को अलविदा कह दूँगा अब उसके बिना जीना मुश्किल था. लेकिन में लाचार और बेबस बस उसके सामने खड़ा था. हमने बदली हुई दवाई भी दी लेकिन कुछ नही हुआ. दुपहर आते आते हालात और बत्तर हो गये. अब दस्त रुक नहीं रहे थे. मकान मालकिन ने कहा इसे नारियल का पानी पिलाओ, में भरी दुपहर में गुडगाव के पुराने बाजार में घूम रहा था लेकिन नारियल पानी नही मिला. खाली हाथ घर आया, बदली हुई दवाई से भी कुछ फर्क नही हो रहा था.

अब फिर डॉक्टर साहिब को फ़ोन लगाया और सब हालात बताये. सामने से जवाब आया “अब सुई लगानी पडेगी.”. मुझे नही पता था की सुई क्या होता हैं में समझ रहा था की शायद इंजैक्शन की बात कर रहे हैं लेकिन डॉक्टर साहिब ने इस भाषा को साफ़ साफ़ से कहा “मेरा मतलब हैं, अब बच्चे को दाखिल करना पड़ेगा. आप उसे शाम को मेरे हस्पताल (क्लिनिक नही) ले आईये वहा ग्लूकोस चडाना पड़ेगा.”. में थोड़े समय के लिये नीचे बैठ गया और सब कुछ साफ़ दिख रहा था, नवराज की मासूमियत और मेरी जिंदगी कुछ मेरे साथ संवाद कर रहे थे. डॉक्टर साहिब अपनी ज्ञान की भाषा में भ्रष्टाचार कर रहे थे लेकिन ये भ्रष्टाचार से बड़ कर एक अपराध को जनम दे रहा था. मैडिकल स्टोर से पता किया तो पता चला की जो दवाई दी गयी थी उसमे उलटी और दस्त को बंद करने की मात्रा बहुत कम थी. इसका मतलब डॉक्टर साहिब की मंशा नवराज को ठीक करने में तो थी ही नही वह तो नवराज के रूप में एक मरीज को देख रहे थे जो उनके अस्पताल में भर्ती होकर एक हस्पताल के मैडिकल बिल का भुगतान कर सकता.

एक डॉक्टर जिसे हम भगवान का दर्जा देते हैं वह भी शैतान हो सकता हैं ? एक १० महीने के बच्चे के साथ भी इस किस्म का भ्रष्टाचार का शिकार हो सकता हैं ? क्या ये अपराध नहीं हैं ? लेकिन सुनवाई कहा हैं, में एक ऑफ़िस में काम करके अपने जीवन को मूलभूत सुविधायो को पूरा कर रहा था कभी कभी इतवार को अपने परिवार के साथ हस लेता था. मेरी तो यही दुनिया थे. इसे क्यों शिकार बनाया गया ? अब में नवराज के भविष्य के लिये अपना समय ऑफ़िस में दू या डॉक्टर साहिब से दुश्मनी मोल लू. अगर ले भी लेता हु तो हमारी व्यवस्था जिसमें भ्रष्टाचार को कूट कूट कर इस तरह मिला दिया गया हैं की बस पैसा बोलता हैं आपकी और आपकी जिंदगी की तो कोई सुनवाई ही नही हैं. तो में भी जिंदगी के संवाद को अनसुना कर एक समझदार इंसान बनकर जमीन पर बेठा था, सामने नवराज खेल रहा था और ज़ेहन में डॉक्टर साहिब की साजिश को कोस रहा था. लेकिन आगे कोई रास्ता नही दिख रहा था.

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