ये पचास दिन।

Posted by Ankit Jha in Business and Economy, Hindi
December 29, 2016

पिछले 50 दिनों की सबकी अपनी कहानी है, किसी ने कुछ किया तो किसी ने कुछ। किसी विद्यार्थी ने अपनी परीक्षाएं दी, कुछ नवयुगल शादी के बंधन में बंधे, कुछ को नौकरी मिली और बहुतों की नौकरी गयी। किसी का प्रमोशन हुआ तो कई मौतें, कई हादसे हुए, कई नयी कलियां खिली, लेकिन इस सब के बीच एक बात जो व्याप्त रही वह थी नोटबंदी। कालेधन के सफ़ाये के लिए उठाया गया ये क़दम कितना कारगर रहा इसकी पड़ताल अलग-अलग एजेन्सी करती रहेंगी। इसमें मानवाधिकार आयोग भी कूदेगा और राजनीतिक दल भी।

भारतीय इतिहास में ये बड़ी मानवनिर्मित त्रासदियों में गिना जाएगा। ये वो 50 दिन थे जब हर इंसान मोहताज था, किसी ना किसी तरह एक दूसरे से जुड़ा रहा; ठीक किसी त्रासदी की तरह। प्रशासन नए आदेश देता रहा, ठीक किसी त्रासदी की तरह। लोगों को प्रतीक्षा रहती थी, ठीक किसी त्रासदी की तरह; लोग आपस में मिलकर दुःख बाँटते रहे, ठीक किसी त्रासदी की तरह। पत्रकारिता लोगों के बीच घूमती रही, ठीक किसी त्रासदी की तरह; सब कुछ होते हुए भी मजबूर बने रहे लोग, ठीक किसी त्रासदी की तरह। कोई धैर्य बँधाता रहा, ठीक किसी त्रासदी की तरह और सबसे अधिक चुभा सरकार में बैठे लोगों का दर्द झेलने की सांत्वना देना, ठीक किसी त्रासदी की तरह। यहां त्रासदी से आशय कुछ भी हो सकता है- आपदा, दुर्घटना या मृत्यु।

इन 50 दिनों में हर वर्ग की अपनी कथा है- मेरी भी, मेरे साथियों की भी, मेरे परिवार की भी, परिवार के उन घटकों की भी जो बैंक में बैठे हैं। उस घटक की भी जो छात्रावास में रहता है, उस घटक की भी जो अपने लेबर पेमेंट के लिए भटकता रहा। सबकी अपनी कथा है और ज़्यादातर करुण कथा है। किसी को सैनिक और सेना वालों सी समानुभूति नहीं है, क्यों होगी सबको अपना काम मिला है। यही कहते हैं ना समाज के ठेकेदार, सबको अपना काम करना चाहिए, समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए। तो क्या सेना के जवानों ने इन 50 दिनों में बैंक में काम कर रहे जवानों का हाल लेने की कोशिश की?

क्या बीती होगी उस बैंक मैनेजर पर जिसके बैंक के बाहर हज़ारों की भीड़ खड़ी है, फिर उसमे क्या वृद्ध, क्या महिला और क्या विभिन्न तरह से अक्षम जन। क्या बीती होगी उस पर जब उसके बैंक के बाहर किसी ने अपना दम तोड़ा होगा। उसने जापान में जाकर अट्टहास किया क्या? नहीं। ये 50 दिन देश के लिए नाज़ुक समय था, ये समय था यह समझने का कि देश में क्या हो सकता है। राजनीतिक दल जो भी कहें, कोई कितना भी मार्च निकाल ले, लेकिन यह सत्य है कि उनकी उत्कटता हमारे दुःख से अलग़ है। उनके लिए यह मुद्दा है लेकिन हमारे लिए यह एक स्थिति है।

इन 50 दिनों में जो सबसे अधिक हुआ है, वह है हमारी स्थिति का उपहास। फिर वो प्रधानमंत्री मोदी का जापान में अहंकारी अट्टहास हो या बैंक की लाइन में राहुल गांधी का लगना या अरुण जेटली का यह कहना कि लोग इससे ख़ुश हैं। एक फ़ैसले से रातों-रात इतना बड़ा हड़कम्प मच गया, फिर भी लोग ख़ुश हैं? मुझे सही आंकड़ा नहीं पता कि कितनी मौतें हुयी हैं, मौत मेरे लिए कोई आंकड़ा नहीं है। यह एक ऐसी स्थिति है जहां से कोई वापसी नहीं है। मुमकिन है कि देश की अर्थव्यवस्था सामान्य हो जाएगी, लेकिन उन परिवारों का क्या जिन्होंने इस दौरान लोग खोये हैं?

यहां पर मुद्दा प्रधानमंत्री के फ़ैसले के समर्थन या असहमति का नहीं है। मुद्दा तो यह है कि देश के लोगों को सरकार अपनी जागीर कैसे समझ लेती है। इन 50 दिनों में कई पत्रकारों ने लोगों के बीच घूम-घूम के पत्रकारिता की, बड़ी दर्द भरी कहानियां सामने लेकर आए। लेकिन इस सब के बीच इस पूरे मुद्दे का राजनीतिक पहलू ही सामने आ पाया। कइयों ने प्रयास भी किया कि असंगठित क्षेत्र तक भी पहुंचा जाए। इस सब में सर्वेश्वर की वो पंक्तियां ही याद आती हैं कि “देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता कि एक हिस्से के फट जाने पर बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें।” देश को देश बनाने के लिए कई विचारों तथा स्वच्छंद मान्यताओं की क़ुरबानी चाहिए होती है।

इतने बड़े देश में अक्सर दर्द आधा ही दिख पाता है, जैसे 50 दिनों में दिल्ली और मुंबई का ही दर्द समझ में आया और घोटाले भी यहीं के समझ में आए। ये 50 दिन किसी दंश की तरह थे। कुछ आंकड़ों के अनुसार 91% पुराने नोट बैंक में जमा हो गए और क़रीब 3600 करोड़ का कालधान ज़ब्त किया जा चुका है। लेकिन सबसे अधिक हैरानी तो इस निर्णय के बाद सही लक्ष्य की है। जब पहले कहा गया कि यह कालेधन पर वार है तो फिर इन 50 दिनों में लक्ष्य कालेधन से मुद्रारहित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ाने वाली बात कहां से आ गयी?

फिर कुछ लोग कहते हैं कि पैसे नहीं है तो प्लास्टिक मनी का उपयोग करो। प्लास्टिक के टूटे-फूटे खिलौने बीनने वाले क्या जाने कि क्या होता है प्लास्टिक मनी। बैंक में खाता होना ही तरक़्क़ी नहीं होती है। ये जो देश की गौरवशाली इतिहास का हवाला देते हैं और कहते हैं कि हम सोने की चिड़िया थी, वो बताएं कि उस समय चिड़िया के पंखों में कितने बैंक खाते थे? या फिर लोग समृद्ध नहीं थे। लोगों की समृद्धि और बैंक खातों को कोई रिश्ता है, इसे समझना मुश्किल है। बैंक खातों का भी अपना संपत्तिशास्त्र या राजनीतिक अर्थशास्त्र है। यदि लक्ष्य कालेधन से लड़ाई का था तो इतना अव्यवस्थित निर्णय एक बार लिया भी तो ठीक, लेकिन यदि यह क़दम देश में कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने ले के लिए था, तो यह देश के लोगों के साथ किया गया गंदा मज़ाक था। डिजिटल अर्थव्यवस्था कभी भी मुख्य अर्थव्यवस्था नहीं हो सकती, यह समानांतर अर्थव्यवस्था ही ठीक है।

किसी एक निर्णय से देश नहीं बदलता है। एक निर्णय मात्र देश में अव्यवस्था पैदा कर सकता है, जैसा कि पिछले 50 दिनों में देश ने देखा है। नहीं वेंकैया नायडू जी, देश में कोई सांस्कृतिक क्रांति नहीं आयी है और वित्तमंत्री महोदय देश किसी सामाजिक अवस्थान्तर से भी नहीं गुज़र रहा है। फ़क़ीर जी, देश राजनीतिक दल नहीं और ना ही आपकी औलाद है जो आप ऐसे सीना ठोक के इसे चेतावनी देते रहोगे। ये देश किसी बड़े सामाजिक संक्रमण की देन है, ये तो आज तक ठीक से देश नहीं बन पाया है इसके साथ इसे ऐसे खिलवाड़ फिर से ना हो। आपकी मर्ज़ी आप जो करें। समाज का राजनीतिकरण ना करें। ये समाज किसी रजनीतिक दल से बहुत बड़ा है। ये समाज कई विचारों, भावनाओं और पहचानों की पृष्ठभूमि है।

पिछले 50 दिन समाज की परीक्षा की तरह थे, लोग परखे गये, कहीं लोगों ने आपा भी खोया, कुछ हार गये, कुछ संतुष्ट रहे, कुछ ने आवाज़ उठायी, कुछ ने खुल के विरोध किया तो कुछ ने खुल के समर्थन। किसी ने कहा निर्णय अच्छा है, थोड़ी परेशानी हुई लेकिन देश के लिए इतना चलता है। देशहित में कुर्बनियां तो होती रहती हैं, व्यक्ति वही जो समाज के लिए बलिदान दे। ये 7 सप्ताह बलिदान की हद थे, ये 50 दिन हमारी राष्ट्र्भक्ति की इंतहा थी, ये 2 महीने हमारी ख़ामोशी की भूल थी।

अगले कुछ महीने देश बदलने की प्रतीक्षा में बीतेंगे, फिर आदत हो जाएगी। ऑस्ट्रेलिया की टीम भारत मैच खेलने आएगी, भारत जीत जाएगा और हम सब कुछ भूल जाएंगे कि हमारे आगे लाइन में लगा तो आदमी रोया था कतार में अपना नम्बर भूल जाने पर। हम भूल जाएंगे कि दिल्ली की हाड़ जमा देने वाले ठंड में हम रातों को एटीएम की लाइन में लगे रहते थे। हम भूल जाएंगे कि अपने छोटे से घर में सोने वाले लोग बैंक के बाहर बिस्तर लगा कर सोया करते थे एक दूसरे को सीने से लगाकर। देश बदल जाएगा, लेकिन यह स्थिति जो बदली थी कितनों को बदल पाएगी?

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