डियर जहांगीर खान ऑफ़ माय लाइफ, एक ख़त तुम्हारे नाम

Posted by Shobha Shami in Art, Hindi
December 1, 2016

डॉक्टर जहांगीर खान,

इस खत को सोचे सत्रह घंटे हो गए हैं, फिर भी फिलहाल इस खाली सफ़ेद स्क्रीन पर एक कर्सर यहां-वहां घूम रहा है और दिमाग में तुम। दोनों मुठ्ठियां भीचें, ठोड़ी से टिकाए मैं कहीं थी और स्मृति का एक तार उड़ता हुआ महसूस हुआ था मुझे। ठंडा और नम, ठोड़ी से फिसलता हुआ, उंगलियों और हथेली के बीच कहीं। बहता हुआ! पिछले इतने घंटों से मैं पता नहीं उन कितनी ही बातों के बारे में सोच रही हूं डॉक्टर खान जो तुमने मुझसे कही थी। कब, कहां, किन तारीखों में, ये बहुत ज़रूरी नहीं है। ज़रूरी है वो बात, वो कहा और सुना गया जहां मैं शामिल थी।

तुम्हें वो जूते याद हैं डॉक्टर खान? लाल रंग के, अपनी बचत से जब पहली बार मैंने जूते खरीदे थे। उन जूतों को मैंने एक-दो बार के बाद बहुत नहीं पहना था। मेरे कुछ दोस्तों ने पहली बार में मेरा मज़ाक उड़ाया था और तुमने कहा था, ‘वो कौन लोग हैं शोभा जिनकी अहमियत रंगों से भी ज़्यादा हैं। इन जूतों की अपनी यात्रा है जो हमारी यात्राओं के साथ की है। तुमने कभी अपने पैरों को देखा है शोभा? अगर तुम अपने पैरों, अपनी उन यात्राओं को नहीं देखोगी तो कौन देखेगा? चलना एक चमत्कार है, एक कदम उठता है और हमारी यात्रा शुरू होती है।’

तुमने उन मामूली चीजों को देखना और जीना सिखाया जिन पर हम कभी गौर नहीं करते थे। तुमने कहा सांस लेना जादू है, शहर की बारिश और गुनगुनी धूप। एक ठंडी शाम को तुम हाथ पकड़ कर टहले थे और हमेशा कहीं भी पहुंचने से ज़्यादा उनकी यात्राओं के बारे में बात की थी। तुम हमेशा उन खतों को पढ़ते रहे, जो मैंने कभी तुम्हें नहीं लिखे थे। तुम उन्हें पढ़ते और जवाब में कुछ लिख भेजते। तुम हमेशा मेरी उन चिठ्ठियों में जीवन को देखते और जवाब में कुछ लिख भेजते। मुझे याद है तुमने एक बार भेजा था, ‘मैं इसे अनुत्तरित छोड़ रहा हूं’, लेकिन मेरे लिए वो भी एक सुख था।

तुमने मुझे हमेशा लिखने को कहा, तुमने कहा कि हम सब के भीतर कुछ होता है जो साझा अनुनादित होता है, तुमने न लिखने पर डपटा भी। उस दिन फोन पर कहा था तुमने कि एक खिलाड़ी रोज सुबह दौड़ता है, लेकिन जब रेस में हिस्सा लेता है तो वो परफॉर्म करता है। रोज डायरी लिखना अभ्यास है लेकिन खुद को साध कर लिखना, वो एक परफॉरमेंस है और लिखने वाले को वो करना ही चाहिए। मेरे ये डर कि ‘मुझे नहीं पता मैं कैसा लिखती हूं’ को किनारे कर बार-बार ये कहना और भरोसा दिलाना कि तुम्हारी अपनी शैली है और उसे वैसे ही लिखो, वो खूबसूरत है। तुम्हारा ये कहना कि लिखना ही तुम्हें भीतर से और खोलेगा और इसीलिए तुम्हें खूब लिखना चाहिए।

मेरे ये कहने पर कि शिद्दत से बेसुरी हूं, तुम्हारा कहना कि… हम सब को अपने फेफड़ों में भीतर तक हवा भर कर गाना चाहिए और खुद को महसूस करना चाहिए आज़ाद, ज़िंदा और खुश। आज और कल पर तुम्हारा कहना कि मेरा सच वो है जो मैंने जिया है। दिनों पर कहना कि हम जिन पलों को जी लेते हैं वहीं ज़िंदा होना है और जिन को नहीं जीते वही मरना। कोई तारीखों के साथ तय करके कैसे अपनी खुशी तय कर सकता है और मुस्कुरा सकता है। सुख है सहज हो जाने में और जो सामने है उसे जीने में, यही सुंदर है।

देर रात की एक बातचीत में तुमने कहा था कि ज़िंदगी में हर व्यक्ति के घटने-होने का, अपना एक मकसद है। किसी के दूर होने या चले जाने पर इतना हैरान नहीं होना चाहिए, आने और जाने से बड़ा होता है हम सबका होना।

एक दोपहर किचन में उत्तपम बनाते हुए ये कहना कि यार लाइफ में अपने प्रेम या पार्टनर में सब कुछ क्यों तलाशती हो? हो सकता है कि वो तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त हो, हो सकता है कि तुम्हारी इंटिमेसी की केमिस्ट्री सबसे अलग हो, हो सकता है वो तुम्हारी हर बात सुन सकता हो या ऐसा ही कुछ। लेकिन सब कुछ एक साथ नहीं मिल सकता, हम सबकी अपनी लिमिटेशन है और वो नेचुरल है। जीवन में और भी रिश्ते हैं, तुम देखो कि तुम्हें सबसे ज़्यादा क्या चाहिए? तुम किस चीज के साथ हमेशा रहना या जीना चाहती हो? पहले देखो कि तुम्हें क्या चाहिए?

रिश्तों पर तुम्हारा कहना कि हमें इस बारे में देखना चाहिए कि तुम्हारे आस-पास कौन है? वो कौन लोग हैं जो तुम्हें बुन रहे हैं, क्योंकि तुम्हें बनाने में उनका सबसे बड़ा हाथ है।

मां-पिता के लिए कहना कि शोभा अपने दुखों को अलग कर हम सबको सोचना चाहिए कि हमारे माता-पिता भी वैसे ही हैं जैसे हम सब हैं, कमज़ोर और आम इंसान। उनकी अपनी मुश्किलें थीं उन समयों पर और हमें उन्हें उन तमाम चीजों के लिए माफ कर देना चाहिए जिनके लिए हम उनसे नाराज़ हैं। तुम्हारा एक साल तक इस बारे में बात करना, मुझे ये बताना कि ‘चाइल्डहुड बैगेज’ क्या है और हम कैसे उसे जीते चले जाते हैं और उनके पार जाने के वक्त साथ-साथ चलना। घर के बारे में चुपचाप सब कुछ सुनते रहना और कहना कि तुम सब कहीं घूमने जाओ, घर से बाहर निकलो और आपस में खूब बात करो।

तुम्हारा हर बार ये कहना कि दुनिया में हर काम प्रेम से हो सकता है। होता ये है कि हम ही कमज़ोर पड़ जाते हैं और लोगों से प्रेम नहीं करते। तुम प्रेम से बात करो, प्रेम से व्यवहार करो, देखो पुराने रिश्ते, कोई भी कैसे तुम्हारे साथ पिघल नहीं जाता। तुम्हारा ये कहना कि डोंट जज पीपल… इफ यू जज पीपल यू कांट लव पीपल। (अगर आप लोगों को जज करते रहेंगे तो उन्हें कभी प्रेम नहीं कर पाएंगे)

तुम्हारा कहना कि नौकरी करनी है करो न करनी हो जो मन का हो करो, मैं तो साथ हूं ही। तुम्हारा कहना कि ये घर है न, तुम सारी दुनिया नाप लो जब लौटने को मन करे तो मैं हूं न। तुम्हारा इस खत के बारे में सुनना और कहना कि तुम्हें जरूर ये लिखना चाहिए। तुम्हारा इस सुबह फिर पूछना और कहना कि लिख भी लो…!! पूरे जीवन जो लोग हमारे साथ इस तरह चलते हैं या चले होते हैं उनसे खतों में क्या कहूं, पता नहीं जहांगीर; पर यही है जो है। जो जितना तुम्हारा है, उतना ही मेरा औऱ शायद औरों का भी। क्योंकि हम सभी कहीं न कहीं एक दुसरे की ही तरह जी और महसूस कर रहे होते हैं।

(ये खत डॉक्टर जहांगीर खान के नाम है, मैं जानती हूं कि तुम्हारा नाम डॉक्टर जहांगीर खान नहीं है। लेकिन तुम हो डॉक्टर जहांगीर खान ही, मेरी ज़िंदगी के डॉक्टर जहांगीर खान। डॉक्टर खान वैसे फिल्म डियर ज़िंदगी में कायरा के थेरपिस्ट थे, डॉक्टर खान ने कायरा से ज़िंदगी के तमाम फलसफों के बारे में खूब बातें कीं। वो कायरा के थेरपिस्ट भी थे, दोस्त भी, मेंटॉर भी और एक तरह का प्रेम भी और उसे सुनते हुए मैंने उन सब बातों को याद किया और जिया जो तुमने मुझसे कही थी। इस खत में भी वो सब हैं… दोस्त, परिवार, प्रेम, कलीग्स, सीनियर्स, मेंटॉर, जिन्होंने मुझसे डॉक्टर जहांगीर खान की तरह ज़िंदगी की वो सब बातें कही।)

 

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