अथ श्री महाभारत ‘कथा’

Posted by Ashtam Neelkanth in Hindi, Society
December 1, 2016

‘अरे यार! क्या बात कर रहे हो? महाभारत असली है! माइथोलॉजी नहीं हिस्ट्री है भाई!’ अगर आप हिन्दुस्तान में रहते हैं तो इतना तो पक्का है कि आपने यह वाक्य, इससे मिलता-जुलता या फिर इसका नम्र रूप चलती ट्रेनों में, पान या चाय के ठेलों पे या नाई की दुकानों पे या किसी और ज्ञान बंटने वाली जगह पे ज़रूर सुना होगा। IQ के तराज़ू में ऊपर आने वाले भक्त इसे भावनाओं के आवेश में कहते हैं, तो IQ की पूजा करने वाले इसे थोड़ी शक़ के नज़र के साथ बुदबुदा ज़रूर देते हैं। अगर आप भी इन बातों पे विश्वास रखते हैं तो मुझे ये कहते हुए आपका दिल दुखाने का काफी खेद है कि महाभारत का युद्ध, इतिहास नहीं एक कहानी या किंवदंती है। अगर आपका दिल अभी भी निराशा के बादलों में नहीं डूबा तो आपसे निवेदन है कि असल वाकया जानने के लिए, नीचे के अनुच्छेद की ओर प्रस्थान करें।

असल में बात हर कहानी की तरह बहुत पुरानी है (कहानियां अक्सर पुरानी ही होती हैं, नयी होती हैं तो ख़बरें बन जाती हैं)। गुरु द्रोण अपने प्राइवेट रेजिडेंशियल स्कूल में पांडवों को और कौरवों को पढ़ा रहे थे। युधिष्ठिर किताब उठा के धर्म का पाठ कक्षा में सबसे ऊंचा पढ़ रहे थे, कुछ कौरव बैठ के पांडवों से इर्ष्या महसूस कर रहे थे, अर्जुन खिड़की वाली सीट पे बैठ के अपने गुलेल का निशाना आती-जाती गर्ल्स स्कूल की लड़कियों पे साध कर पक्का कर रहे थे और दुर्योधन और भीम हमेशा की तरह क्लास में लड़ पड़ने के कारण सबसे आगे अपने-अपने बस्ते पीठ पे उठाये मुर्गे बने पड़े थे। सार में कहा जाए तो यह हर रोज़ की तरह का ही दिन था। बोर्ड पर लिखते-लिखते चौक ख़त्म हो गयी तो हमेशा की तरह गुरु द्रोण ने नकुल को लाने भेजा जो कि अर्जुन से 2 सीट आगे बैठा खिड़की के शीशे में अपने प्रतिबिम्ब को निहार रहा था और साथ ही गुरूजी के आदेश का इंतजार कर रहा था, ताकि अपने जीवन की सार्थकता को साबित कर सके।

गुरु का आदेश होना ही था कि नकुल सरपट स्टाफ रूम की ओर चौक लेने भागे। जाते ही उन्होंने 2 चौक उठाई और टूटे हुए 2 चौक सहदेव के साथ बांटने के लिए जेब में डाल लिए (बार-बार जाने के कारण नकुल यह जान गया था कि 2 से ज्यादा चौक ले जाने पे तो सरकार को भी सवोच्च न्यायालय से फटकार पड़ जाती है, उसकी तो क्या ही बिसात है)। वो दराज़ बंद करने को ही था कि उसे द्रोण के ब्रह्मास्त्र और बाकी दिव्यास्त्र चलाने के नोट्स चमकते नज़र आए! बस यही वो पल था जहां से इतिहास बदल गया!

इसी को अमूमन महाभारत युद्ध का समय कहा जाता है, उस वक़्त नकुल कोचिंग क्लासेस का पूरे हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ में वर्चस्व था। उसके अलावा पूरे भारतवर्ष में कोई दिव्यास्त्र चलाने की कोचिंग देने वाला नहीं था। उसके अलावा पांडवों ने अपना इंटरनेशनल मॉडल स्कूल खोल लिया था जिसके डीन भीष्म, एकेडेमिक हेड विदुर और युधिष्ठिर और स्पोर्ट्स हेड अर्जुन और भीम और ई.सी.ए. हेड सहदेव थे (इस स्कूल की दुनिया भर में कोई और ब्रांच नहीं थी)। भीष्म की सफ़ेद दाढ़ी का मजाक बनाते हुए स्कूल के बच्चों ने उनकी इच्छा मृत्यु होने की गॉसिप चला दी थी। अपने ईगो को बचाने के लिए कौरव, शकुनी की गाइडेंस में नौंवी, दसवीं, ग्यारवीं फेल विद्यार्थियों को बारहवीं पास कराने का झांसा देकर गुज़र बसर कर रहे थे।

भविष्य में थोड़ा इमेज मेकओवर करने के लिए उन्होंने III World War/ महाभारत युद्ध की हवा ज़रूर उड़ाई परन्तु एजुकेशन सिस्टम के पांडवों के हाथों में होने के कारण उसमें जीत ज़्यादा वक़्त तक साबित नहीं कर पाए। जानना नहीं चाहेंगे कि गुरु द्रोण इस वक़्त क्या कर रहे थे? वो दूर कहीं इंटीरियर इलाके में एकलव्य को गुलेल चलाने की होम ट्यूशन दे रहे थे, क्यूंकि अंगूठे दिखने का महत्त्व उन्हें भी समझ आ गया था! (जिन्हें याद नहीं, उनके लिए ये जानकारी महत्वपूर्ण है कि अतीत में गुरु द्रोण ने एकलव्य को शिक्षा के नाम पे अंगूठा दिखा के उसका अंगूठा गुरु दक्षिणा में मांग लिया था)

अब शायद आप जान गए होंगे कि क्या किंवदंती थी और क्या इतिहास! तो कुछ यूं ही कहानियों को सच्चाई का अमृत पिला के ज़िन्दा कर दिया जाता है और इतिहास को मीठी नींद सुलाकर कहानी बना दिया जाता है। कोई राजा यूं आता है जो कहानियां बनाकर खुद को खुदा बनना चाहता है तो कहीं खुदाओं से राजा, किताबों में दीमकों की भेंट चढ़ जाते हैं। इतिहास हारा हुआ कभी नहीं लिखता और जो हार कर भी इतिहास लिख दे वो हारा हुआ नहीं रहता। तो कभी आस-पास देखें, इतिहास के मुखौटे के पीछे से झांकती कई कहानियां मिल जाएंगी। जो मिले तो मुझे भी सुनाइएगा!

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