BHU क्यों बनते जा रहा है VC और छात्रों के जंग का अखाड़ा

Posted by anupam1949 in Hindi
December 5, 2016

पिछले एक साल में हम अगर देश के तमाम यूनिवर्सिटीज़ के कैम्पसों पर नज़र डाले तो पता चलता है कि लगभग सभी जगह किसी न किसी कारण से छात्र-छात्राओं को प्रताड़ित किया जा रहा है। JNU, हैदराबाद, जाधवपुर, इलाहाबाद, पटना लगभग हर जगह, छात्र आन्दोलनों का पुलिसिया दमन हो रहा है।

छात्रों से कैंपस के अंदर और बाहर दोनों जगह अपनी बात कहने,अपनी असहमति दर्ज कराने का अधिकार छीना जा रहा है। अब तो पढ़ने के लिए लाइब्रेरी मांगना,फेलोशिप मांगना,आदि मूलभूत मांगों को भी राजनीति से प्रेरित बता कर छात्रों का निलंबन कर दिया जा रहा है और फर्ज़ी मुकदमों में फँसा कर चुप कराने की कोशिश की जा रही है।

आपको ज्ञात हो कि मई के महीने में BHU ने 9 छात्रों को इसलिए निलंबित कर दिया था क्यूंकि वो 24 घंटे लाइब्रेरी खुली रखने की मांग कर रहे थे। मई के लाइब्रेरी आन्दोलन से अभी तक BHU में कई तरह के आन्दोलन हो रहे हैं और लगभग हर रोज़ नये-नये  फ़रमान लाये जा रहे हैं। BHU के छात्रों पर RSS की विचारधारा थोपी जा रही है। हॉस्टल के अन्दर छात्राओं के पहनावे से लेकर खान-पान को लेकर नये कानून बनाए जा रहे हैं। हॉस्टल के अन्दर उन्हें एक “कुशल पारंपरिक गृहणी” बनाने का पाठ पढ़ाया जा रहा है। मज़दूरों को अपना मेहनताना मांगने पर विश्वविद्यालय से  बाहर फेंक दिया गया।

BHU के 100वें वर्ष में 150 दिन से भूखे 60 कर्मचारी

पूरा विश्वविद्यालय शताब्दी वर्ष मना रहा है और इसी विश्वविद्यालय को अपने खून-पसीने से सींच कर यहाँ तक पहुंंचाने वाले मज़दूर 100 से ज़्यादा दिन से भूख हड़ताल पर है। माननीय VC साहब संघ के लोगों को बुलाकर देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय को संघ का कार्यालय बनाकर रख दिया। लेकिन उनको अपने मेहनतकश कर्मचारियों का दर्द नहीं दिख रहा है। ये कर्मचारी सभी जगह अपना ज्ञापन देकर थक चुके हैं पर सुनने वाला कोई नहीं है।

मामला ये है कि BHU ने संविदा(कॉन्ट्रैक्ट) पर काम करने वाले कर्मचारियों की समस्याओं की समीक्षा के लिए एच.एन. समिति बनाई थी। इन कर्मचारियों को प्रतिदिन का मेहनताना मिलता और इसके अलावा कोई और सुविधा नहीं। 1998 में एच.एन. समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था की नए कर्मचारी तब तक नहीं नियुक्त किये जायेगें जब तक पुराने संविदा कर्मचारियों को स्थाई अर्थात परमानेंट नहीं कर दिया जाता। लेकिन नई नियुक्तियां होती रही पुराने परमानेंट भी न हुए। वो भी तब जब VC और एग्जीक्यूटिव समीति उस सिफ़ारिश को मान चुकी थी। इन हड़ताल पर बैठे कर्मचारियों का आरोप है कि नए कर्मचारियों को लाखों का घूस लेकर अवैध तरीके से खाली पदों को भरा जा रहा है। लेकिन उन लोगों को 20 सालों से आज-कल आज-कल की बात करके अभी तक परमानेंट नहीं किया गया। इसलिए ये 60 कर्मचारी 150 दिन से ऊपर धरने पर है जो अब भूख हड़ताल में बदल चुका है। इन कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि उनकी मांगे नहीं मानी गयी तो वो आत्मदाह करेंगे।

एक कुशल पारंपरिक गृहणी बनाने की कार्यशाला है BHU गर्ल्स हॉस्टल।

आज 21वीं सदी में जहाँ “जेंडर-इक्वॉलिटी” पर चर्चाएं हो रही है। लड़के-लड़कियों में फर्क न करते हुए सभी को समान अधिकार दिए जाने की बात हो रही है। वही बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर जी.सी.त्रिपाठी को ये बराबरी भारतीय संस्कृति और सभ्यता के खिलाफ लगती है। इसलिए लड़कियों का हॉस्टल शाम 8 बजे के बाद बंद कर दिया जाता है, मेस में मांसाहारी भोजन नहीं दिया जाता है और तो और लडकियों को wifi की सुविधा नहीं मिलती। वही लड़को के लिए कोई क़ानून नहीं है। वाईस चांसलर का कहना है कि भारतीय परंपरा में महिलाओं के सम्मान और इज्ज़त पर ज्यादा जोर दिया जाता है। इसलिए मैं एक पिता के नाते सोचता हूँ की अगर मेरी बेटी सड़क पर सुरक्षित नहीं है तो एक पिता तो उसे घर में बंद ही रखना चाहिये। वी.सी. साहब का कहना है कि लड़कियों को ऐसे कपड़ें पहने चाहिये जिस से वो रेप से बच सके। ऊपर से लड़कियों से एक अंडरटेकिंग लिया जाता है कि वो कैंपस में किसी भी धरना- प्रदर्शन,अनशन,या कोई भी प्रोटेस्ट में हिस्सा नहीं लेंगी। उनसे कहा जाता है कि ये JNU या DU नहीं, इसलिए नेता बनने की ज़रूरत नहीं है। कुछ गर्ल्स हॉस्टलों में तो रात में 10 बजे के बाद फ़ोन से बात करना भी मना है। इस तरह की विपरीत माहौल में जी रही हैं BHU की छात्राएं।

कैंपस के अन्दर लड़के से गैंग- रेप पर प्रशासन ने साधी चुप्पी।

कुछ दिन पहले BHU के एक लड़के के साथ कैंपस में ही चलती कार में गैंग रेप हुआ था। पीड़ित लड़के ने IMS BHU के ही लैब असिस्टेंट दीपक शर्मा समेत 4 अन्य लोगों को चिन्हित किया था। ये सारी जानकारी देने के बाद भी पुलिस ने पीड़ित छात्र की न तो FIR लिखी और ना ही BHU प्रशासन ने उसकी कोई मदद की। इसके उलट जिला प्रशासन और BHU प्रशासन ने मिलकर उस छात्र को डराया- धमकाया। उसे मुंह खोलने पर जान से मारने की धमकी दी गयी और मामले को दबाने की हर संभव कोशिश की गयी। लेकिन उस छात्र की मदद के लिए  के छात्र- संगठन आगे आये और उसको न्याय दिलाने के लिए धरना प्रदर्शन किया और अभियान चलाया। तब जा कर पुलिस और जिला प्रशासन ने बढ़ते आक्रोश और दवाब में FIR लिखी और दीपक शर्मा को गिरफ्तार किया गया। लेकिन आज भी चार और आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर है।

BHU के सिलेबस में भगत सिंह और गाँधी को जगह नहीं, हेडगवार,सावरकर और गोलवलकर को किया गया शामिल।

पिछले दिनों में देश के सारे कैम्पसों के साथ-साथ जिस तरह से BHU का भी भगवाकरण हो रहा है वो एक चिंता का विषय है।आज छात्रों को उन से उनका लोकतान्त्रिक अधिकार छीन कर उन्हें मशीन की तरह बनाया जा रहा है। सवाल करना एक गुनाह समझा जा रहा है। आज हर जगह एक तरह की विचारधारा को बलपूर्वक थोपा जा रहा है। इतिहास, विज्ञान के तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर उन्हें बदला जा रहा है। राजस्थान में सिलेबस से नेहरु को निकालना इसका ताज़ा उदाहरण है।

IIT-BHU के छात्रों ने लड़ कर मनवाई अपनी मांगे।

जिस अनुपात में IITs और NITs की फीस बढ़ी है उससे छात्र काफी गुस्से में हैं। यही हाल है IIT-BHU के छात्रों का भी है, उनका कहना है कि फीस तो बढ़ा दी गई है लेकिन सुविधाएँ नही बढ़ाई गई है और न ही पढ़ाई का स्तर सुधरा है। उन लोगों ने बढ़ी हुई फ़ीस के खिलाफ एक समीति बनाई और “ONLY FEE HIKE ,NO HIKE IN FACILITIES”के बैनर तले कैंपस के अन्दर एक प्रोटेस्ट मार्च निकाला। उन्होंने 24 घंटे लाइब्रेरी से लेकर होस्टलों की संख्या बढ़ाने,वुमेन सेल,लैब की गुणवत्ता में सुधार आदि 23 मांगों को लेकर ये आन्दोलन किया। जिसमें 400 से ऊपर छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया और एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिस के सामने धरना दिया। प्रशासन ने इतनी बड़ी भीड़ देख कर तुरंत आपातकालीन पार्लियामेंट सत्र बुलाया उनकी मांग पर बात करने के लिए। अंतत: पार्लियामेंट सत्र में उनकी कुछ मांगे तुरंत मान ली गई और बाकी के लिए समीति है। इस तरह IIT -BHU के छात्रों ने दिखा दिया कि आखिर छात्र राजनीति रंग लाती है।

अब सवाल ये उठता है कि आखिर ये सारी चीज़े एक साथ क्यों हो रही है?क्यों छात्र राजनीति पर रोक लगाई जा रही है,क्यों फीसें बढ़ रही है? ज़ाहिर है कि आज उच्च शिक्षा को एक उपभोग की वस्तु बना दी गयी,ताकि जिसके पास जितने अधिक पैसे होगें वो ही उतनी ही अच्छी शिक्षा को खरीद सकेगा। इस नीति के चलते भारत की एक बड़ी गरीब, पिछड़ी, दलित आबादी को शिक्षा से दूर रखने की साजिस है।ऊपर से छात्र- आन्दोलनो का दमन इसलिए किया जा रहा है ताकि कोई इस शिक्षा विरोधी नीति का विरोध न कर सके। अतः आज के छात्रों पर  ऐतिहासिक जिम्मेदारी है कि वो मनु-मैकाले अर्थात ब्राह्मणवादी एवं साम्राज्यवादी शिक्षा नीतियों से लड़ें।

 

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