जयललिता के राजनीतिक करियर का उतार-चढ़ाव

Posted by Sidharth Bhatt in Hindi, Politics
December 6, 2016

‘जयललिता’ एक करिश्माई व्यक्तित्व, जिसने तीन दशकों से भी ज़्यादा समय तक तमिलनाडु की राजनीती को प्रभावित किया। कल देर रात उनके निधन के बाद पूरे देश की मीडिया में जयललिता का ही ज़िक्र हो रहा है। उन्हें जनता से अपार प्यार मिला इसीलिए उन्हें ‘अम्मा’ के नाम से भी पुकारा जाता था, लेकिन उनके राजनीतिक जीवन में कोई काला अध्याय नहीं था ये कहना गलत होगा। जयललिता राजनीति में कदम रखने के बाद से ही विवादों से घिरी रही। वो चाहे खुद को एम.जी.आर. का राजनीतिक वारिस घोषित करना हो, पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही एम. करूणानिधि और उनके बेटे एम.के. स्टॅलिन के खिलाफ उनका दुश्मनी भरा रवैया हो या आय से अधिक संपत्ति और भ्रष्टाचार के तमाम आरोप हों। ऐसे कई मामलों में जयललिता की तीखी आलोचना हुई।

1989 में जब जयललिता विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थी तो बजट सत्र के दौरान उनके साथ DMK कार्यकर्ताओं ने बदसलूकी की और जयललिता ने विधान सभा के बाहर रोते हुए मीडिया के सामने सदन में मुख्यमंत्री के रूप में ही कदम रखने की प्रतिज्ञा की। इस पर कुछ मीडिया हाउस ने इसे बस एक ड्रामा बताया, लेकिन सच्चाई ये है कि कि इस प्रकरण के बाद उन्हें मिली जनता की हमदर्दी ने 1991 में उन्हें तमिलनाडु की सबसे युवा मुख्यमंत्री बना दिया।

दत्तक पुत्र की आलिशान शादी को लेकर घिरी विवादों में: 

1991 से 1996 के उनके पहले मुख्यमंत्री कार्यकाल में उन पर राजनीतिक अधिकारों के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे। इनमें सबसे अधिक चर्चित था उनके दत्तक पुत्र सुधाकरन की प्रसिद्ध तमिल सिने एक्टर शिवाजी गणेशन की पोती से हुई आलिशान शादी। इस शादी के नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे ज़्यादा मेहमानों की संख्या और शादी के सबसे बड़े पांडाल के 2 रिकॉर्ड दर्ज हैं। गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार 7 सितम्बर 1995 को हुई इस शादी में 75 करोड़ रुपये से भी अधिक खर्च किया गया और करीब डेढ़ लाख लोग इसमें शरीक हुए। इस शादी के दौरान सरकारी संसाधनों यानी कि बिजली पानी और सरकारी वाहनों के दुरुपयोग का भी आरोप काफी चर्चित रहा।

पोस गार्डन पर रेड:

1996 के चुनावों में इन आरोपों का खामियाज़ा जयललिता को सत्ता से हाथ धोकर चुकाना पड़ा, जिनमे वो अपनी सीट बचने में भी असफल रही। DMK की सरकार बनते ही दिसम्बर 1996 में उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में 30 दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इस कार्यकाल के ही दौरान उन पर 65 करोड़ से भी ज़्यादा की संपत्ति अपने अलग-अलग खतों में जमा करने का भी आरोप लगा। इनमे चेन्नई में 1200 हेक्टेएर की कृषि भूमि, चाय बागान, लक्ज़री कारें और आभूषण आदि शामिल थे। 1997 में उनके निजी आवास पोस गार्डन में पड़े छापे में 28 किलो सोना, 800 किलो चांदी, 10500 साड़ियां, 750 जोड़ी जूते, 91 घड़ियां और कई अन्य बेशकीमती चीजें ज़ब्त की गई।

जब केंद्र में गठबंधन से खींचा हाथ:

1999 में जयललिता को फिर भारी आलोचना का सामना करना पड़ा जब उन्होंने भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन एन.डी.ए. से कावेरी जल विवाद के मसले पर समर्थन वापस ले लिया। इसका परिणाम केंद्र में सरकार के गिर जाने के रूप में सामने आया और अक्टूबर 1999 में हुए मध्याविधि चुनावों में बी.जे.पी. की अगुवाई में एन.डी.ए. ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई।

जब पुलिस करूणानिधि को घसीटते हुए ले गयी:

2001 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से ठीक पहले उनकी उम्मीदवारी पर आपराधिक मामलों में दोषी पाए जाने के कारण रोक लगा दी गयी, लेकिन चुनावों में AIADMK की जीत हुई और उन्होंने एक बार फिर मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में दोषी पाए जाने के कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए अयोग्य घोषित किया और उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा। 2001 में ही एक और बड़ी घटना हुई जब जयललिता के इशारे पर पुलिस तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और DMK प्रमुख एम. करूणानिधि को सरेआम घसीटते हुए ले गयी।

2014 में हुई जेल और 2015 में सत्ता में वापसी:

2011 में जयललिता तीसरी बार मुख्यमंत्री बनी, उनके इस कार्यकाल के दौरान 2014 में पूर्व में जनता दल के नेता (वर्तमान में भाजपा के नेता) सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा 18 साल पहले 1996 में दायर किये गए भ्रष्टाचार के एक केस में उन्हें बैंगलोर की एक विशेष अदालत ने 4 साल की सजा और 100 करोड़ का जुर्माना भरने की सजा सुनाई। इसके तुरंत बाद एक बार फिर उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा। 2015 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने उन्हें सभी मामलों से बरी कर दिया और जयललिता पांची बार राज्य की मुख्यमंत्री बनी। 2016 के चुनावों में AIADMK ने बहुमत हासिल किया और जयललिता छठी और आखिरी बार मुख्यमंत्री बनी।

 

 

 

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