क्या महिला सशक्तिकरण पर हमारी एप्रोच टॉप टू बॉटम वाली है

बात लड़कियों के क्लब जाने पर रुक गई। पापा बिगड़ गये, “क्लब जाना हमारे कलचर में नहीं है, मैं ये भी नहीं कह रहा कि लड़के जा सकते हैं।” पर आपने जाने तो दिया- मैंने बीच में ही तन के पूछा, रात के दस बजे, ये जानते हुए भी की उसके साथ लड़कियां जा रही हैं। मुझे जाने देते? रात के दस बजे? वो भी लड़कों के साथ? नहीं, नहीं जाने देता। भाई को भी जाने दिया क्यूंकि देखना चाहता था, कि ये लड़के-लड़कियां करते क्या हैं बाहर। मां-बाप आस लगाये बैठे होते हैं कि बच्चा इंजीनियर, डॉक्टर, वकील बनकर लौटेगा पर बच्चा तो वहां क्लब में डांसर बना बैठा है।

पापा एंज्वायमेंट नाम की भी कोई चीज़ होती है! फिर क्या पापा बिगड़ गये। ऐसे क्लब में जाके नाचना हमारे कल्चर में नहीं है। नाचना बुरी बात थोड़ी है पापा। बुरी बात नहीं है बेटा, नाचने का शौक है तो कॉलेज की पार्टियों में नाचो न, घर में नाचो, “ये क्लब-व्लब इस समथिंग आई कांट अलॉउ।”  ब्रॉडेन योर माइंड पापा, सब कुछ बदल रहा है, आपको भी अपनी सोच बदलनी चाहिए। लंबा तर्क-वितर्क का सिलसिला चला। अपनी आधुनिक सोच को बढ़ा-चढ़ा कर व्यक्त कर रहे थे हम।

पापा भी चुप नहीं थे, उनकी भी अपनी दलीलें थी। मेरी सोच छोटी लगती है? कभी मेरे उम्र के रिश्तेदारों से मिलो, अपने काका या मामा की ही बात कर लो। अंतर साफ पता चल जाएगा मेरी और उनकी सोच में। उनकी बेटियों की क्या मजाल जो पिता के सामने क्लब, लिव-इन की बात कर सकें। मैं इसे गलत नहीं मानता बल्कि मुझे तो गर्व है कि मेरी बेटी में इतनी हिम्मत है।

मगर बेटा अगर तुम मुझसे ये आस लगाये बैठी हो कि मैं तुम्हें दारू-सिगरेट, क्लब, बार जाने की परमिशन दूं तो मुझे माफ कर दो। आइ एम वेरी सॉरी, मेरी सोच अभी उतनी ब्रॉड नहीं हुई। ऐसा नहीं है कि ये सभी चीज़ें गलत हैं, सही होंगी पर अभी के लिए नहीं, मेरे लिए नहीं। बदलाव होगा… इतना हड़बड़ाने की जरूरत नहीं, वक्त दो। हाथ से घड़ी की सूई घुमा देने से दिन, रात में नहीं बदल जाता, वक्त लगता है। एक ही जेनरेशन को इतना बदलने मत कह दो कि रहना मुश्किल हो जाए। पर महिलाएं कब तक वंचित रहेंगी इन समानताओं से? वो कब सश्क्त होंगी?

पापा ने तर्क देते हुए कहा, तो क्या तुम्हारे लिए महिलाओं का क्लब में जाना, बार जाना, दारू-सिगरेट फूंकना ही उनकी सशक्तिकरण के उदाहरण हैं? ऐसा नहीं है पापा पर… आपको कोई बदलाव नज़र आता है क्या गांवों में?

हां, आता है। तुम्हें भी आएगा, बस नज़रों का फेर है। गांव में कभी सोनम को स्कूटी चलाते देखा है? तुम भी डरती हो चलाने से। मगर वो गांव की पहली लड़की है जो स्कूटी से पढ़ने जाती है। जब सोनम स्कूटी चलाते हुए रोड पर निकलती है न, तो लगता है मानो रोड किनारे खड़े उन सारे रूढ़िवादी सोच रखने वाले पुरूषों के गालों पर करारा तमाचा जड़ गया। वो क्लब, बार जैसी चीज़ों से भले ही वंचित है मगर उसमें हौसला है, हिम्मत है उन सभी घूरती आंखों को झेलने की। क्या वो महिला सशक्तिकरण की परिभाषा नहीं? गुड़िया नहीं, जिसने गांव की महिलाओं को सश्क्त बनाने के लिए सिलाई सेंटर खोला। तुम्हारी खुद की मां नहीं, जो खुद अनपढ़ होने के बावजूद तुम्हे पढ़ाने के लिए इतनी मेहनत करती है?

हम्म… पापा की कही बात कहीं न कहीं सही थी। हमारी एनर्जी एक गलत दिशा में इंवेस्ट हो रही है। हम उस समाज में क्लब कल्चर लाने की बात कर रहे हैं जहां लड़कियों का स्कूल जाना भी हास्य का विषय बन जाता है। फिर क्लब जाना तो दिल्ली दूर वाली बात हो गई। हम काले पन्नी में पैड न देने की मुहीम उस समाज में चला रहे हैं, जहां लड़कियां दुकान में पैड लेने घुसती हैं तो ये चेक करके कि दुकानदार कोई महिला है या पुरूष। फिर उस महिला दुकानदार के कान में धीरे से फुसकती हैं, “आंटी, पैड है क्या?” हम लड़कियों को वहां शॉर्टस और बिकनी पहनने की बात कर रहे हैं, जहां जींस पहनने पे भी मार- काट हो जाती है। हम उन भाईयों को बहनों से मास्टरबेशन पर खुल के बात करने को कहते हैं, जिन्हें अपनी बहन का किसी लड़के को हॉय- हैल्लो करना न गंवारा हो।

हमारी अप्रोच टॉप टू बॉटम वाली लगती है। कभी-कभी लगभग अनप्रैक्टिकल। हम कब रिच बिकमिंग रिचर एंड पुअर बिकमिंग पूअरर की थ्योरी पर वर्क करने लगे पता ही नहीं चला। हम तो उन्हीं को प्रोग्रेसिव करने की होड़ में खड़े थे, जो पहले से ही प्रोग्रेसिव हैं। हमने ये सोचा ही नहीं कि हमारे देश का मैक्सिमम जनसंख्या कितनी पिछड़ी है। हमने इस बात को इग्नोर कर दिया कि जिन लड़कियों के कपड़े, ऑउटिंग्स, पसंद-ना पसंद की आज़ादी की हम बात कर रहे थे, उन्हीं में से एक तबका अब तक स्कूल से भी अनभिग्य है। जो सेकेंडरी क्या प्राइमरी एजुकेशन पाने की मांग के लिए भी अपनी आवाज़ बुलंद नहीं कर सकती। हम शायद उन तबकों की आवाज़ नहीं बन पा रहे। हमने गला फाड़ा पर किसलिए? केवल अपनी सुविधाओं के लिए। कभी उन तबकों की सुविधाओं का नहीं सोचा।

हमारे देश की ज़्यादातर लड़कियां पीरियडस में पैसा और जागरूकता की कमी से गंदे कपड़ों का इस्तमाल करती हैं। क्या ये हास्यास्पद नहीं कि हम उसी समाज में पैड काली पन्नी में नहीं मिलनी चाहीए, इसकी मुहीम चला रहे हैं। इस बात की नहीं कि उन सारी वंचित लड़कियों को  मुफ्त में पैड मिले। हम आखिर क्यों कर रहे हैं ऐसा? कभी-कभी लगता है हम बदलाव की आड़ में ऐक्सट्रीम हो गये हैं। सोशल मीडिया पर बुद्धजीवी होने का प्रमाण मात्र देने के लिए इन चीज़ों को लिए आवाज़ उठा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि ये गलत है पर मौजूदा स्थिति के अनुकूल उठाया जाने वाला कदम नहीं लगता ये। हम भूल गये हैं कि ज़मीनी स्थिती क्या है, हम कितने पानी में हैं? गांधी ने सही कहा था कि बदलाव ज़मीनी स्तर से शुरू हो तो एक संतुष्ट परिणाम बनके उभरता है। हम अचानक से आसमान में नहीं उड़ने लगते, पहले ज़मीन पर चलना सिखना ही पड़ता है। नहीं तो फिर वही बात होगी कि लड़कियों का एक तबका बॉडी पार्ट्स पर शर्मींदगी नहीं होनी चहिये वाली मुहीम चलाते हुए रोड पर टॉपलेस उतर जाएगा, वहीं दूसरा तबका घर की तथा कथित इज्जत को दुपट्टे से बचा रहा होगा।

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