शादी में फायरिंग जो तुम्हारे लिए मौज है, वो किसी की जान ले गई है

शादियों में बारात का ढोल-नगाड़ों पर नाचना, पटाखे फोड़ना ये रिवाज़ जाने कब से हैं और सवाल-जवाब के दोष से मुक्त भी हैं। इस जश्न के साथ-साथ शक्ति प्रदर्शन कब हमारी शादियों का हिस्सा बन गया, ना तो ये सवाल करना कभी ज़रुरी हुआ और ना वाजिब। लेकिन शादियों में हवा में लहराती लंबी नली वाली राईफल या फिर देसी कट्टों के प्रदर्शन और उनसे चलने वाली गोलियों से जो हादसे हुए हैं उसके बाद का मंज़र किसी जश्न का नहीं होता।

5 दिसंबर को ही पंजाब के बठिंडा जिले के मोड़ मंडी मे शादी के फंक्शन के दौरान एक गोली चली और गर्भवती डांसर कुलविंदर कौर की मौत हो गई। व्यक्तिगत रूप से भी मैं इस भय से वाकिफ हूं, 1987 मे पंजाब के एक विवाह के दौरान, हवाई फायर हुई था और पूरे विवाह में अफवाह फ़ैल गयी कि मैं घायल हो गया हूं। असलियत मे क्या हुआ था ये अंत मे लिखूंगा लेकिन इसके बाद हम लोगों ने ये सोचना ज़रूर शुरु कर दिया कि ऐसे शक्ति प्रदर्शन का क्या फायद, जो किसी अपने की जान की कीमत पर हो।

शादी की रस्मो में वर पक्ष का दुल्हन के परिवार ज़्यादा महत्वपूर्ण होने का भ्रम हमारा समाज सदियों से पाले हुए है। वधु पक्ष के द्वारा किए गए इंतज़ाम का वर पक्ष के सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतिबिंब होने का ढकोसला भी खूब होता है। कुछ शहरी इलाकों को छोड़ दें तो बारात के स्वागत से लेकर विदा होने तक, दुल्हन के परिवार की तरफ से हो रहे हर प्रकार के इंतज़ामों को दूल्हे के परिवार वालों की तरफ से ना जाने कितने ही मापदंडो पर तौला जाता है। मतलब, इस तरह का माहौल होता हैं जहाँ अगर आप लड़के वालों की तरफ से हैं तो आपको पूरा अधिकार हैं अपनी ताकत की नुमाइश करने का और इसका विरोध होने की सम्भावना ना मात्र होती है। सदियों से हथियारों को ही ताकत की परिभाषा कहा जाता रहा हैं, तो इस तरह के माहौल में, कुछ हवाई फायर तो बस यूंही हो जाते हैं जो पहले से तय कार्यक्रमों में पंजीकृत नही होते हैं।

शादियों में नशे का प्रचलन कितना है वो शायद लिखने की भी ज़रूरत नहीं है। नशे के बाद जब शक्ति का ऐहसास होता है तो, आत्मविश्वास प्रबल हो जाता है लेकिन हथियार थामने वाले हाथ लड़खड़ाते हैं। कुछ लड़खड़ाहट तो नाच गाने तक सीमित रह जाती है, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा की गलत परिभाषा पढ़ कर आए लोगों के हाथ अपने आप बंदूक तक पहुँच जाते हैं। और फिर जो कुछ होता है वो खबरे बनती हैं।

अब जिस तरह कहा जाता है कि कहा गया वाक्य और बंदूक से निकली गोली वापस नही आती उसी तरह इस फायर का पता नहीं होता कि किस तरफ निशाना कर लेगा। अगर बंदूक खुले आसमान की तरफ भी तनी हैं फिर भी गोली चलने तक अगर इसका मुँह किसी और मुड़ गया तो तबाही निश्चित है। अमूमन, इस तरह के किस्से कानून की गिरफ्त से दूर ही रखे जाते हैं लेकिन कोई तबाह ज़रूर हुआ होता है। अगर ये खबरों की सुर्खिया बन भी जाये, तो चंद ही दिनों में हमारा सभ्य समाज इसे भुलाने में ही अक्लमंदी समझता है और शायद इसलिए कोई हल नहीं निकल पाता।

अंत में आपको बता दूं कि उस शादी मे मैं घायल नहीं हुआ था, मेरी तरह ही दिखने वाला बच्चा ज़रूर चोटिल हुआ था, चोट इतनी नहीं थी कि शादी रोक दी जाये लेकिन अगर बंदूक की नली ज़रा भी इधर-उधर होती तो गोली कहीं भी जा सकती थी। लेकिन कुलविंदर कौर मेरी तरह भाग्यशाली नहीं थी और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे का क्या कसूर था, जो इस दुनिया को बिना देखे ही रुखसत हो गया। कुलविंदर कौर की हत्या से कई अजनबी भी आहत हुए हैं और सड़कों पर आकर न्याय की मांग कर रहे हैं। इसी सिलसिले मे हरियाणा सरकार ने विवाह शादियों पर किसी भी प्रकार से हथियारों के इस्तेमाल को गैरकानूनी घोषित कर दिया है।

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