सीरियन गृहयुद्ध: अलेप्पो में जीत या मानवता की हत्या

Posted by Talha Mannan in GlobeScope, Hindi
December 25, 2016

युद्ध कभी भी समस्याओं का समाधान नहीं रहा है और इतिहास साक्षी है कि आधुनिक विश्व में हुए किसी भी युद्ध से कभी भी मानवता का भला नहीं हुआ। युद्ध न पहले विकल्प थे और न आज हैं। विश्व के दो सबसे बड़े युद्ध, प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध में हुए भीषण नरसंहार का उदाहरण हमारे सामने है। महाशक्ति या सुपरपावर बनने की अंधी होड़ और साम्राज्यवादी विस्तार की महत्वाकांक्षा ही नर को पशु और शासक को तानाशाह बना देती है। लेकिन प्रश्न यह उठता है आख़िर मानव रक्त की होली खेलकर और इंसानी लाशों के ढेर लगा कर अट्टहास करने वालों को महाशक्ति बन जाने पर भी क्या हासिल होता है?

सीरिया की आर्थिक राजधानी कहा जाने वाला शहर अलेप्पो कभी इतना आकर्षक और ख़ूबसूरत हुआ करता था कि इसे वर्ल्ड हेरिटेज सिटीज़ में रखा जाता था। उत्तर-पश्चिम में भूमध्य सागर के तट से कुछ ही दूरी पर पर स्थित अलेप्पो शहर दुनिया के प्राचीन शहरों में से एक माना जाता है, लेकिन वर्तमान में इस शहर को देखने पर आपको नज़र आएंगी उजड़ चुकी बस्तियां, खंडहर हो चुकी इमारतें और कफन तलाशती हुई लाशें! लगभग छः साल से चल रहे गृहयुद्ध के बाद अब सीरियाई सेना का दावा है कि उन्होंने ‘तथाकथित विद्रोहियों’ को अलेप्पो से खदेड़ दिया है। रूस, ईरान और स्वयं सीरिया की सेनाओं ने विद्रोहियों से जंग के नाम पर लगभग छः हज़ार साल पुराने इस शहर को खंडहर में तब्दील कर दिया है। लेकिन सीरियाई गृहयुद्ध में अब तक हलाक हुए पाँच लाख लोगों की लाशें इन तथाकथित स्वयंघोषित विजेताओं से प्रश्न कर रही हैं कि आखिर अपने ही लोगों का खून बहाकर उन्होंने अलेप्पो को कैसे जीत लिया?

अलेप्पो की बर्बादी का सिलसिला आज से लगभग छः साल पहले उस समय शुरू हुआ जब सीरिया में असद सरकार के विरूद्ध विद्रोह की आवाज़ें उठनी शुरू हुई। 2010 में लोकतंत्र के लिए शुरू हुई अरब क्रांति से प्रभावित होकर कई अरब देशों में लोकतांत्रिक सरकारों के लिए चुनाव हुए। सीरिया की जनता ने भी इससे प्रभावित होकर देश में लोकतांत्रिक सरकार के चुनाव के लिए शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन शुरू किया लेकिन राष्ट्रपति बशर अल असद की फौजों ने रूस और ईरान की मदद से उन तथाकथित विद्रोहियों को दबाने की भरपूर कोशिशें की। जिससे इस शांतिपूर्ण आंदोलन को युद्ध का रूप दे दिया गया और इस युद्ध ने अंतर्राष्ट्रीय रुप धारण कर लिया। आईसिस ने इस आग में घी का काम किया। उसका दावा है कि वह इस लोकतंत्र की लड़ाई में सीरिया की जनता के साथ खड़ा है, लेकिन उसने सीरियाई जनता के विरूद्ध ही काम किया और हिंसक प्रवृत्ति अपना कर रूस, ईरान और सीरियाई सेना को मौका दिया कि वे आतंकवाद से निपटने के नाम पर निहत्थे और शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर बमबारी कर सकें। आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर आतंकवाद का ही सहारा लिया गया और दोनों गुटों (आईसिस और सीरियाई सेना व सहयोगी देश) की तरफ से की गई कार्रवाईयों के बीच आम सीरियाई नागरिकों जो कि लोकतंत्र के लिए शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे थे, का ख़ून पानी की तरह बहाया गया।

असद सरकार शुरूआत से ही दावा कर रही है कि उनकी लड़ाई आतंकवाद और तथाकथित विद्रोहियों से है और आईसिस भी यही दावा करता है कि वे असद सरकार के विरूद्ध संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन ज़मीनी सच्चाई तो कुछ और ही है। अलेप्पो से आने वाले संदेश और वीडियोज़ रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। ऐसा लगता है कि मानो पूरे विश्व की अंतरात्मा मर गयी हो। दोनों गुट स्वयं को प्रभावी साबित करने की होड़ में यह बात भूल गए कि उनके बीच एक तीसरा गुट भी है, जिसे अलेप्पो कहते हैं। वो तीसरा गुट जो लोकतंत्र के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहा था लेकिन वहां के आम नागरिकों, महिलाओं और बच्चों का कत्ल-ए-आम किया गया, कभी आतंकवाद के नाम पर तो कभी तथाकथित विद्रोहियों के नाम पर। यहां तक कि वहां के अस्पतालों तक में बमबारी की गई। और बचे खुचे लोगों को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया लेकिन स्थिति कुछ ऐसी बनी कि वे भाग भी न पाए और जो कुछ बचकर भाग गए उन्हें कोई मुल्क (तुर्की इत्यादि के अलावा, एक रिसर्च के मुताबिक मार्च 2015 तक तुर्की में सीरिया के 1.7 मिलियन शरणार्थी थे।) पनाह देने के लिए राज़ी न हुआ। इतिहास इस बात का भी साक्षी रहेगा कि जब अपने ही देश में बेघर हुए और आतंकवाद का शिकार हुए सीरियाई नागरिक विश्व से पनाह मांग रहे थे, उस समय खुद को मानवता का रक्षक कहने वाले कई मुल्कों ने अपनी सीमाएं बंद कर ली थी।

गार्डियन अख़बार की एक पत्रकार जेनिन जियोवानी जिन्होंने 25 साल से दुनिया के अलग-अलग इलाकों में युद्ध कवर किये हैं। उन्होंने हर तरह की बर्बरता देखी है लेकिन अलेप्पो की बर्बरता ने उन्हें हिला दिया है। वह लिखती हैं कि एक युद्ध संवाददाता के रूप में उन्हें लगता है कि वह फेल हो गई हैं। उनकी दिलचस्पी किसी राजनीतिक पक्ष में नहीं है। उनकी संवेदना उन लोगों के प्रति है जो इस आतंक का शिकार हुए और इस गृहयुद्ध में फंस गए हैं। 25 साल में इससे बुरा युद्ध मैंने कभी नहीं देखा। इसमें विपक्ष भी अपराधी है, सत्ता पक्ष भी अपराधी है। लोग तहखानों में छिपने जा रहे हैं मगर तहखाने भी बचाने के लायक नहीं रहे। जेनिन ने लिखा है कि उन्होंने बोस्निया युद्ध के दौरान सरायेवो को कवर किया था। उन्हें याद है कि तहखाने में छिपकर रूसी टैंकों का इंतज़ार कितना ख़ौफनाक होता है। उन्होंने कहा कि मैं उन नागरिकों के बारे में सोच रही हूं जिनके बीच रहकर मैंने किताब लिखी है। संयुक्त राष्ट्र के लिए रिपोर्ट लिखी है। मैं सोच रही हूं कि क्या वो बचेंगे भी? मैंने आज खूब ट्वीट किया, लेकिन लोगों की खामोशी से मुझे सबक मिला है। मुझे पता चला है कि लोगों की जागरूकता मर चुकी है। दुनिया का समाज कैसे फेल हो चुका है। हमारे नेता इस युद्ध को न तो खत्म कर रहे हैं और न ही इस बर्बर नरसंहार के बारे में दुनिया को बता रहे हैं। सीरिया में जो युद्ध हो रहा है वो आतंकवाद के खिलाफ युद्ध नहीं है। आईसिस या अल नुसरा के ख़िलाफ युद्ध नहीं है। अलकायदा के खिलाफ युद्ध नहीं है। रूस और उसकी सहयोगी सेनाएं दुनिया को यही यकीन दिलाना चाहती हैं लेकिन 2011 में एक शांतिपूर्ण बगावत को किस तरह से गृह युद्ध में बदल दिया गया और फिर इसे नरसंहार में बदला गया, अलेप्पो की यही कहानी है। इस कहानी की कोई बात नहीं करता है।

अमेरिका के मशहूर विश्लेषक राबर्ट फिस्क कहते हैं कि सीरिया के गृहयुद्ध में न केवल वहाँ की तानाशाही सरकार बल्कि कई अन्य वैश्विक महाशक्तियाँ भी झूठ और ढोंग से काम ले रही हैं।

आतंकवाद को खत्म करने के नाम पर हो रहा आतंकवाद अभी और कितना भयानक रूप धारण करेगा, ये तो समय ही बताएगा। हालांकि सूत्रों के मुताबिक तुर्की व संयुक्त राष्ट्र संघ अलेप्पो में युद्धविराम का प्रयास कर रहे हैं। हद तो यह है कि मीडिया भी दो गुटों में बंट गया है। कहीं का मीडिया कहीं की बातें कर रहा है और कहीं का मीडिया कहीं की! लेकिन एक तबका ऐसा भी है जो अलेप्पो के लोगों के साथ खड़ा है। उन लोगों के समर्थन में जो लोकतंत्र चाहते हैं, जो तानाशाही से मुक्ति चाहते हैं, जो खंडहरों के नीचे दब गए हैं, उन बच्चों के समर्थन में जिनकी आँखों ने अब रोना भी बंद कर दिया है, जिन्हें अपने ही शहर में तहखानों में छिपकर गुज़ारा करना पड़ रहा है क्योंकि बाहर सिर्फ तबाही है।

संयुक्त राष्ट्र संघ और तुर्की के हस्तक्षेप से शायद अलेप्पो में शांति स्थापित हो सके। असद सरकार का दावा है कि उन्होंने तथाकथित विद्रोहियों को खदेड़ दिया है लेकिन मानवता उनके मुंह बाये खड़ी होकर एक ही प्रश्न कर रही है कि विद्रोहियों के नाम पर अपनी ही जनता का नरसंहार कर उन्हें क्या हासिल हुआ? अपने ही लोगों का खून बहाकर अलेप्पो में विजय का खोखला दावा करके वो क्या हासिल कर लेंगे?

फोटो आभार: गेटी इमेजेज

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