डिसेबल्ड बता के नहीं दी गई थी पोस्टिंग, खास बातचीत UPSC टॉपर इरा सिंघल से

Posted by Prashant Jha in Body Image, Hindi, Inspiration, Interviews
December 12, 2016

आप अगर बहुत ज़्यादा IAS ऑफिसर्स से निजी स्तर पर नहीं मिले/मिली हैं तो मन में एक ऐसी इमेज तो रहती है जैसे अलग ही aura या प्रभावक्षेत्र होता होगा एक IAS का। और ये बात मेरे शहर में सही भी थी। IAS छोड़िये किसी सरकारी अफसर को लेकर भी ऐसी ही धारणाएं थी। इरा सिंघल से मिलिए ये तमाम धारणाएं टूटती नज़र आती है, वो उनकी तरफ से होने वाली देरी को लेकर आपसे माफी भी मांगेंगी और ना कोई तामझाम नज़र आएगा आपको। इरा 2014 बैच की IAS टॉपर हैं,बेबाक हैं, सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं और खुल के अपनी बातें रखती हैं। पर्सन विद डिसअबिलिटी के लिए काफी काम करती हैं। उनका निजी संघर्ष भी रहा है। 2010 में इरा IRS के लिए चुनी गईं। जब पोस्टिंग की बात आई तो उनके मेडिकल कंडिशन स्कोलियोसिस का हवाला देते हुए कहा गया कि आप पुश,पुल और लिफ्ट करने में असमर्थ हैं इसलिए आपकी पोस्टिंग नहीं की जा सकती। इरा ने सेन्ट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में केस फाइल किया, और आखिरकार 2014 में उन्हें पोस्टिंग मिली लेकिन 2014 में ही उन्होंने फिर से UPSC परीक्षा दी और इस बार सबको पीछे छोड़ते हुए टॉपर बनीं। उस वक्त उन्होंने संबंधित मंत्रालयों में चिट्ठी भी लिखी लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इरा ने Youth Ki Awaaz से अलग-अलग विषयों पर बात की।

प्रशांतमैं बैठे-बैठे सुन रहा था कुछ प्लान कर रही थी आप टीम के साथ, इतना प्लान किया जाता है सबकुछ।

इरा सिंघल– हाहाहा, अभी तो बहुत छोटे लेवल पर हो रही थी, दिक्कत ये है कि हमारे यहां लोगों पर गॉवर्नमेंट सर्वेंट का रेशियो बहुत कम है। रेशियो के हिसाब से इंडिया में सबसे कम इंप्लॉई रेशियो है। यूपी में किसी किसी डीएम के पास 3 हज़ार गांव हैं, बहुत मुश्किल होता है मैनेज कर पाना कभी-कभी। और इस जॉब के लिए आप लोगों को रैंडमली हायर नहीं कर सकते हैं।

प्रशांत- सिर्फ मैनपावर में हम कम हैं या हमारे देश में सबसे करप्ट सर्विसेस भी है?

इरा- वो इसलिए भी क्योंकि जितने लोग हैं वो ओवरलोडेड हैं काम से। हम बहुत पुराने माइंडसेट से काम करते हैं, हम सामंती(फ्यूडल) मानसिकता से जी रहे हैं अभी भी। तो हमारी सर्विसेज़ में भी जो बहुत लोग आते हैं वो वही काडर लेना पसंद करते हैं जो फ्यूडल है। बहुत सारे लोग बस पावर दिखाने के लिए सर्विस में आते हैं और जैसे ही हम पावर दिखाने की वजह से काम करते हैं, करप्शन वहीं शुरु हो जाता है। आप ऑटोमेट कर देंगे चीज़ें तो ऊपरी कमाई कम हो जाऐगी और करप्शन अपने आप कम हो जाएगा।

प्रशांत- इसका मतलब ये कि हमारी सर्विसेस को एक मेजर रिफॉर्म चाहिए?

इरा- बिल्कुल, बहुत रिफॉर्म की ज़रूरत है, बड़े लेवल पर। जब कॉर्पोरेट सेक्टर में मैं काम करती थी तो मैंने कभी कोई फाईल नहीं देखी,हम इंस्टेंटली डिसिज़न लेते थे और बहुत जल्दी काम करते थे। यहां बेवजह काफी देरी होती है। एक जगह से दूसरी जगह फाइल जाने में 10 दिन लग जाते हैं। लोग पैसे लेकर फाइल मूव करवाते हैं। फाइल पर काम भी मुझे करना है डिसीज़न मुझे ही लेना है लेकिन वो 50 लोगों से होकर जाएगी। और इस प्रोसेस में काफी वक्त लग जाता है। अगर हम इ-ऑफिस को सही से इंप्लिमेंट कर दें तो सब कुछ आसान हो जाएगा, अभी क्या है कि जबतक मैं ऑफिस नहीं जाउंगी तो कुछ नहीं होगा। फिज़िकल है सबकुछ।

प्रशांत-  IAS बनने से पहले और बन जाने के बाद कितना बदल जाता है सबकुछ?

इरा- लाईफ तभी बदलती है जब आपको लगता है कि हां कुछ बहुत बड़ा कर लिया। मेरे लिए तो कुछ नहीं बदला क्योंकि ये मैं अपनी ईगो सैटिस्फाय करने या दुनिया को कुछ प्रूफ करने के लिए IAS नहीं बनी मुझे इस तरह का काम करना था इसलिए बनी। ना मुझे पावर चाहिए था ना या मेरे अंदर था कि मुझे राज करना था। मेरी एगजिस्टेंस IAS के अलावा भी है।

प्रशांत- लेट होने के लिए आपने अभी सॉरी बोला। IAS भी सॉरी बोलते हैं क्या? मैं जहां से आता हूं वहां लोग गजब रुतबा बना कर रखते हैं।

इरा- हाहाहा कभी कभी रुतबा मेनटेन भी करना पड़ता है, क्योंकि अगर कुछ मास स्केल पर होता है कहीं दंगे हो जाते हैं तो इतना तो बना कर रखना पड़ता है कि लोग आपकी बात सुने।

प्रशांत- गॉवर्नमेंट और पब्लिक के बीच सबसे ज़रूरी लिंक हो सकता है एग्जेक्यूटिव लेकिन उल्टा लोग डरते हैं।

इरा- हां ये बैलेंस बनाना ज़रूरी है कि आप अप्रोचेबल भी हैं और लोग आपकी इज्ज़त भी करें। ये भी ना हो कि लोग आपकी वैल्यू ना करें। लेकिन ये मुगालता कि आप लोगों से बड़े हैं और अच्छे हैं इसलिए यहां बैठे हैं ये गलत है।

प्रशांत- मैंने आपके फेसबुक प्रोफाइल पर पढ़ा था कि  Let our lives be about our talents not our weaknesses.ये किस बारे में था?

इरा- ये डिसएबिलिटी डे पर मैंने लिखा था। क्या होता है कि जब कोई पर्सन वीद एनी डिसएबिलिटी होता है ना तो लोग आपकी शक्ल देख कर सबसे पहला जजमेंट दे देते हैं, वो आपसे बात किए बिना ही आपको जज कर लेते हैं, they just see you and decide your worth. जैसे शादी में भी फोटो देख कर ही जज कर लेते हैं। तो अगर आप डिसएबल्ड हैं तो आपकी वीकनेस बना दी जाती है डिसएबिलिटी को। आप अपनी खूबियां देखो, come out of your insecurity and build on your strong points. नहीं तो सोसायटी हर लेवल पर याद करवाना चाहती है कि आप डिसएबल्ड हैं

प्रशांत- आपका भी पर्सनल लेवल पर एक स्ट्रगल रहा था, या यूं कहें कि जो हमारा सोशल कंस्ट्रक्ट है उसका नतीजा रहा।

इरा- ये सदियों से चला आ रहा है, किसी डिसेबल्ड को लेकर हमारी सोच इतने दिनों से बस श्राप से दया तक पहुंची है। पहले तो डिसेबल्ड लोगों को श्रापित समझा जाता था, कलंक के तरीके से देखा जाता था। अब दया दिखाते हैं कम से कम, जिसकी कोई ज़रूरत नहीं है। हर जगह संघर्ष  है, अश्वेत अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं, महिलाएं अपनी लड़ाई लड़ रही हैं, डिसेबल्ड लोगों की लड़ाई बहुत लंबी चलेगी।

प्रशांत- प्रॉब्लम कहां आ रही है?

इरा- प्रॉब्लेम ये है कि लोग डिसअबिलिटी को समझते नहीं है, और फिर उसमें अपनी समझ लगाते हैं। लोगों को लगता है कि कोई अगर फिज़िकली कमज़ोर है तो मेंटली और इमोशनली भी उतना ही कमज़ोर होगा। हमारी आंखें जितना देखती हैं हम उतना ही समझते हैं,हमारी बाकी समझ शून्य हो जाती है। आपको जो परफेक्ट नहीं दिखता है आपके लिए उसकी पूरी पर्सनैलिटी वैसी ही हो जाती है।

प्रशांत- आप इस पोज़िशन पर पहुंची फिर भी एक स्ट्रगल रहा, हर कोई नहीं पहुंच पाता, उनके लिए और भी मुश्किल हो जाती हैं चीज़ें। आप उनके लिए अपने स्तर से कोई इनिशियेटिव ले रही हैं?

इरा- मैं जितनी जगहों पर जाकर बात कर पाती हूं, मैं जाती हूं। मैं सोशल मीडिया पर भी बात करती हूं। मेरे रिज़ल्ट के बात बहुत से डिसएबल्ड लोगों को कॉन्फिडेंस आया है। मैं एक ऐप पर भी काम कर रही हूं जो IIT रुड़की के बच्चे मिलकर बना रहे हैं। जिससे डिसएबल्ड लोगों को जेनेरल इनफॉर्मेशन और जॉब की जानकारी भी मिल सकेगी।

प्रशांत- प्लैनिंग के लेवल पर भी हम बहुत कमज़ोर हैं, हमारे यहां इंफ्रास्ट्रक्चर डिसेबल्ड लोगों को ध्यान में रखकर नहीं बनाए जाते। जैसे स्टिकर्स होते हैं पब्लिक टॉयलेट्स में डिसेबल्ड लोगों के लिए लेकिन रैंप ही नहीं होता।

इरा- दिक्कत ये है कि जो प्लान कर रहा था वो मिनिस्ट्री में बैठा होता है, और जो एग्ज़िक्यूट करता है वो फील्ड में था उन्होंने आपस में कभी बात ही नहीं की। और उनकी सेंसिटिविटी कुछ नहीं है। क्योंकि उन्होंने खुद कभी वो प्रॉब्लम फेस नहीं की। पूरा का पूरा पब्लिक कनवेंस सिस्टम पर्सन विद डिसएबिलिटी के लिए ट्यून्ड ही नहीं है।

प्रशांत- मीडिया या एंटरटेनमेंट सेक्टर में भी डिसेबल्ड लोगों के लिए कुछ नहीं है, जैसे जो सुन नहीं सकते उनके लिए कम ही जगह पर साइन लैंग्वेज इंटरप्रेटर होते हैं। तो क्या एजुकेशन लेवल पर भी हमारी समझ शून्य है इन बातों को लेकर?

इरा- सबसे बड़ी बात तो पर्सन विद डिसएबिलिटी को स्कूल तक में दाखिला नहीं मिलता, सबसे पहले तो एक इनक्लूसिव सोसायटी बनानी पड़ेगी। आपने अगर अलग-अलग स्कूल में पढ़ाया बच्चों को तो समझ कहां से आएंगी ये बातें। कभी बात ही नहीं की, कभी समझा ही नहीं।

प्रशांत- तो आपको लगता है कि सरकारी स्कीम्स भी बढ़नी चाहिए कुछ?

इरा- सरकारी स्कीम ज़्यादा हो नहीं सकते। लगभग 3 परसेंट लोग डिसएबल्ड हैं और सरकार का फोकस मैजोरिटी पर ही होता है। फील्ड लेवल ऑफिसर के लिए डिसेबिलिटी प्रायोरिटी पर नहीं है। हमारे पार्लियामेंट में कितने लोग डिसेबल्ड हैं ? कौन सी पार्टी ने आजतक किसी डिसेबल्ड को टिकट दिया है? तो जब आपके सिस्टम में ही डिसेबल्ड नहीं हैं तो आप कैसे उनके लिए पॉलिसी बनाएंगे।

प्रशांत- डिसेबल्ड कैंडिडेट के लिए इग्ज़ाम का पूरा प्रॉसेस ज्यादा कठिन हो जाता है?

इरा- इस इग्ज़ाम में किसी दूसरे कैटेगरी के कैंडिडेट को सिर्फ रैंक के बेसिस पर नौकरी मिल जाएगी, लेकिन एक डिसेबल्ड कैंडिडेट को इतनी चीजें प्रूफ करनी पड़ती है। एग्ज़ाम क्लियर करने के बाद भी आपको ऑफिस के चक्कर काटने पड़ेंगे। हर साल 4-5 कैंडिडेट चक्कर काटते रहते हैं, ऑफिस का अपने फाइल का स्टेटस देखने। जब डिपार्टमेंट अलॉट होता है तो डिपार्टमेंट में बैठे लोग ये तक बोलते हैं कि सारे लंगड़े-लूल्हों को हमारे डिपार्टमेंट में क्यों भेज देते हैं।

प्रशांत-  जो हमारा सोशल बिहेवियर है उसमें डिसेबल्ड लड़की के लिए दोहरे स्तर पर संघर्ष हो जाता है?

इरा- हमारे समाज में तो ऐसे भी लगता है कि लड़की होना अपराध है उस पर से अगर आप डिसेबल्ड हैं तो लोग आपके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर देते हैं। ये बताइये कि कब ऐसा हुआ है कि फाइनैंस मिनिस्टर एक महिला है। लड़कियां तो कैदी होती हैं, क्योंकि आप तो कैद करते हैं। एक तो यहां लड़की पैदा होना क्राईम है। हालांकि बदलाव आ रहा है, आज कम से कम मैं आपके सामने बैठ कर इन मुद्दों पर बात तो कर रही हूं, मेरी मां के टाइम पर तो ये पॉसिबल ही नहीं था।

प्रशांत- पीएम मोदी ने नया टर्म दिया है दिव्यांग आप इससे सहमत हैं?

इरा- देखिए आप कुछ भी बोलिए, आप बोल सकते हैं, लेकिन कोई एक शब्द डिफाईन नहीं कर सकता आपको।

प्रशांत- यूथ आइकन का अवार्ड मिला है आपको, इसके बाद कितनी बढ़ जाती है ज़िम्मेदारी?

इरा- पता नहीं कुछ अलग नहीं कर रही मैं अभी तक तो मुझे लगा नहीं कभी कि कुछ ज़्यादा ज़िम्मेदारी हो गई है। अभी काफी कुछ करना है तो मैं खुद से बहुत इम्प्रेस्ड नहीं हूं।

प्रशांत- बहुत सारे IAS बहुत अच्छा काम करते हैं लेकिन वो पता नहीं चल पाता लोगों को।

इरा- एज़ अ जूनियर ऑफिसर हमें ही नहीं पता होता है कि हमारे सीनियर ने एक पार्टिकुलर मुद्दे को लेकर क्या किया है। मीडिया  को भी ज़्यादा पॉज़िटिव स्टोरी अट्रैक्ट नहीं करती। ऐसी इंस्पायरिंग स्टोरीज़ लोगों के सामने आना चाहिए।

प्रशांत- लास्ट में एक सवाल कि क्या ज्यादा सेंसिटिव होने की ज़रूरत है हमें?

इरा- बस इतना है कि इक्वल की तरह ट्रीट करें, पर्सन विद डिसेबिलिटी के साथ ये है कि उनको थोड़ी मदद की ज़रूरत ज़रूर है लेकिन आप दया पात्र मत बनाइये उनको, हम कई बार सेंसिटिव होने के चक्कर में ओवर सेंसिटिव हो जाते हैं, तो इक्वॉलिटी की बात करिए और अलग-अलग नाम देना बंद करिए।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

हर हफ्ते Youth Ki Awaaz हिंदी की बेहतरीन स्टोरीज़ अपने मेल में पाने के लिए यहां सब्सक्राइब करें।

Comments are closed.