सादुलपुर के ये विधायक नायक के ‘अनिल कपूर’ से कम नहीं

Posted by Saurabh Raj in Hindi, Society
December 29, 2016

मंत्री, सांसद, विधायक, सरपंच, वार्ड पार्षद, यह शब्द दिमाग में आते ही अमूनन सबसे पहला ख़याल आपके दिमाग में क्या आता होगा? लम्बी-लम्बी गाड़ियों का काफिला, आम जनों के पहुंच से दूर, बेईमान, घमंडी या कुछ और? आज जब चारों तरफ सरकारी तंत्र की विफलता पर लम्बे-2 लेख लिखे जा रहे हैं, राइट टू एकाउंटेबिलिटी, राइट टू रिजेक्ट, राइट टू रिकॉल जैसे क़ानून की मांग चरम सीमा पर है। जनता और जन-प्रतिनिधियों के बीच की खाई और भी चौड़ी होती जा रही है, ठीक इस समय में आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि राजस्थान के चुरू जिले के सादुलपुर विधानसभा में एक जन-प्रतिनिधि मीडिया और सोशल मीडिया के तामझाम से दूर जनता के बीच में नायक फिल्म के ‘नायक’ अनिल कपूर के प्रतिरूप काम करने में चौबीस घंटे लगातार व्यस्त है।

सादुलपुर विधानसभा के बसपा पार्टी से निर्वाचित विधायक मनोज न्यान्गली विगत तीन वर्षों से अपने क्षेत्र की सेवा करने में तल्लीन हैं। उनके काम करने के तौर-तरीकों को देखकर आम जनता का लोकतंत्र में विश्वास कई गुना बढ़ जाता है। ़उनकी खासियत यह है कि वह आम जनता से महज एक फ़ोन कॉल दूर होते हैं। अपने क्षेत्र में अधिकांश समय बिताते हैं, अपने कार्यालय पर रोजाना जनता दरबार लगाते हैं और बचे हुए समय क्षेत्र के भ्रमण और लोगों से मिलने में बिताते हैं। जो भी आम जन अपनी समस्या लेकर उनके पास पहुँचते हैं, वह उस पर त्वरित कारवाई करते हैं। जैसे नायक के अनिल कपूर के पास टाइपिंग मशीन हुआ करती थी ठीक उसी तरह इनके पास इनका मोबाइल फ़ोन होता है, जिससे वह तत्काल प्रभाव में समस्या से सम्बंधित अधिकारी से संपर्क साधते हैं।

हमने विधायक मनोज न्यान्गली के साथ उनके काम करने के तौर-तरीकों एवं अन्य राजनीतिक मुद्दों पर बात की –

प्रश्न. आपके विधायकी के तीन साल का अनुभव कैसा रहा?

उत्तर- जी सादुलपुर विधानसभा के विधायक बने लगभग तीन वर्ष हो गए, अगर मैं सच बताऊँ तो यह मेरे लिए बहुत सुखद अनुभव नहीं रहा है। एक लोकतंत्र में जनता का जिस तरह से हित होना चाहिए, वह हित मुझे अभी तक कहीं भी नज़र नहीं आया है। किसी भी पार्टी की किसी भी सरकार द्वारा बनायी गयी जन-कल्याणी योजनाओं का पाला जब तक ज़िम्मेदार प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से धरातल पर नहीं कार्यान्वित किया जायेगा, तब तक आम जनता का पूर्ण हित संभव नहीं है।

प्रश्न. लेकिन आपका काम करने का तरीका काफी अलग है। आप जनता दरबार में जनता की समस्याओं से सीधे रूबरू होते हैं, तो क्या आपको चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ता?

उत्तर- जी, कई तरह की गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अगर कोई भी जनप्रतिनिधि जनता की किसी भी समस्या के निवारण की कोशिश करता है तो प्रशासन द्वारा किसी ना किसी सर्कुलर द्वारा या कानून द्वारा उस पर अड़चन लगा दी जाती है। कुल मिलाकर प्रशासनिक तंत्र भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा अड्डा बन चुका है।इसलिए चाहे कोई भी सरकार बने, पारदर्शिता बहुत ज़रूरी है साथ ही साथ पूरे सिस्टम की लायबिलिटी और जिम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

प्रश्न. तो क्या जिस तरह से वैकल्पिक राजनीति की बात हो रही है, ठीक उसी तरह हमें वैकल्पिक प्रशासनिक तंत्र पर भी बहस शुरू कर देनी चाहिए?

उत्तर- देखिए, सरकारी तंत्र के अन्दर वैकल्पिक प्रशासनिक तंत्र की बात करना मुझे तार्किक नहीं लगता। मेरा मानना है कि इससे भ्रष्टाचार और बढ़ेगा एवं लोकतंत्र के और भी हाशिये पर जाने की सम्भावना प्रबल होगी। बस लोगों की जिम्मेदारी तय कर दी जाए, भ्रष्ट अधिकारियों पर कड़ी से कड़ी कारवाई की जाए। लोकतंत्र में किसी भी क़ानून के बनने से कम से कम 6 महीने पहले सर्वदलीय विधायकों की कमिटी बननी चाहिए और वह सभी विशेषज्ञों की सहायता से क़ानून का अध्ययन करे, उसके बाद इसे सदन में लाया जाये और फिर उस पर विचार, बहस इत्यादि किया जाए.

प्रश्न. केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले पर आपका क्या विचार है?

उत्तर- मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं। जनता के बीच में रहता हूं और जहां तक आम जनता की बात करें, तो मेहनत से दस हजार, पचास हजार कमाने वाले आम नॉन-टैक्स पेयर जिनका पैसा जमा कराने के बाद कानून की कुल्हाड़ी से मारकर उनका गला घोंट दिया जाए तो देश के लिए इससे दुर्भाग्य की बात क्या होगी। केंद्र सरकार चंद चोर लोगों के लिए पूरे देश को चोर साबित करने पर तुली हुई है। यह बिलकुल व्यवहारिकता से परे है।

प्रश्न. एक आखिरी सवाल, कि आम जनता की हमेशा से शिकायत रही है कि उनके जनप्रतिनिधि जनता के लिए सुलभ नहीं है, आप ऐसे जनप्रतिनिधियों को क्या सन्देश देना चाहेंगे?

उत्तर- मैं सभी सांसद, मंत्री, विधायक से एक ही बात कहना चाहता हूं, जनता ने हमें जनप्रतिनिधि के तौर पर जो जिम्मेदारी सौंपा है उसे हम पूरा करने की तमाम कोशिशें करें। जनता के हितैषी बनकर रहिए, राजा-महाराजाओं की तरह विलासितापूर्ण जीवन जीना है तो नेता बनने की कोई जरूरत नहीं है।

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