“जॉन अपचर्च की फिल्म मैंगो ड्रीम्स, हम सब की यात्रा है”

Posted by Syedstauheed in Culture-Vulture, Hindi, Staff Picks
December 21, 2016

हालिया सम्पन्न हुए ‘पटना फिल्म फेस्टिवल’ में रामगोपाल बजाज व पंकज त्रिपाठी अभिनीत मैंगो ड्रीम्स देखी। ब्रिटिश फिल्मकार जॉन अपचर्च के निर्देशन में बनी यह फिल्म काफ़ी सराहना बटोर रही है। यह फिल्म विभाजन की त्रासदी के केन्द्र में है। एक व्यक्ति की अपनी जड़ों की ओर यात्रा है। एक पीड़ा, कि क्यों ज़मीन पर खींची रेखाएं इंसानियत से बढ़कर हो गई? दो समुदायों के बीच का कड़वा इतिहास है, मीठी एकरूपता है, एक दूसरे के प्रति स्नेह और सम्मान का तत्व है।

ऑटो ड्राइवर सलीम व डॉक्टर अमित बहुत भले लोग हैं,बिल्कुल आम इंसानों की तरह। इतिहास व राजनीति बीच-बीच में मनमुटाव का कारण बनी। जिस तरह हम लोग अराजक तत्वों के हाथों कठपुतली बना दिए जाते हैं, यह दोनों भी इन शक्तियों द्वारा सताए हुए हैं। फिल्म बड़ी शिद्दत से रेखांकित कर गई, कि इंसानियत से ऊपर कोई धर्म या राजनीति नहीं। जॉन की फिल्म हमें एक यात्रा पर ले जाती है। डॉक्टर अमित की यात्रा केवल उनकी नहीं बल्कि सलीम की भी यात्रा है, अनुभवों की यात्रा है।

भूलने की बीमारी से पीड़ित डॉक्टर अमित (रामगोपाल बजाज) सब कुछ भूल जाने से पहले खुद को एक बार फिर से रिविजिट करना चाहते हैं, अतीत की यादों को फिर से जीना चाहते हैं। बेटे अभि (समीर कोचर) की आराम करने की सलाह को किनारे करते हुए एक दिन घर से निकल जाते हैं। सलीम नाम का ऑटो चालक (पंकज त्रिपाठी) उनकी इस यात्रा का सहयात्री बनता है। कभी डॉक्टर अमित ने सलीम के बच्चे की जान बचाई थी, आज उस इंसानियत को लौटाने का अवसर था। सलीम बुजुर्ग हो चले डॉक्टर का खूब साथ निभाता है। अहमदाबाद से शुरू हुआ सफ़र कई मकामों से होते हुए अपनी मंजिल को पहुंचता है।

डेरा नानक का वो हिस्सा, वो जगह जो अब पाकिस्तान में पड़ता है। बंटवारे ने ज़मीन पर सीमाएं ज़रूर खींच दी थी, लेकिन दिलों को नहीं बांटा जा सकता है। अमित प्रेम की उन्ही धड़कनों को पकड़ कर वापस अपनी जड़ों की ओर आए थे। सरहद पार खोये हुए कल से मिलने आए थे। बचपन की यादों का पीछा करते हुए अमित वहां आ पहुंचे जहां कि अब पाकिस्तान पड़ता है। देखने आए थे अपना गांव… खुदा ने बिछड़े भाई (नसीरूद्दीन शाह) से भी मिला दिया। अपने भाई अभय को जिंदा देख डॉक्टर अमित जिंदगी की सबसे खूबसूरत पल से गुज़र रहे थे। अमित को बचपन की एक याद ताउम्र सताती रही थी, कि उनकी बातों ने बचपन में उनसे भाई छीन लिया था। बाग में आम तोड़ने की घटना से जुड़ा एक दुस्वप्न था दरअसल।

किरदारों के बीच संवाद, कथा को दिशा देते हैं। कथानक ने हालात से संवाद निकाले हैं, स्वाभाविक जो हो सकता था वही, कुछ भी आरोपित करने की कोशिश नहीं की गई। सलीम और डॉक्टर अमित के बीच हुए वन टू वन संवाद में कथानक की कई परतें सामने आई। फिर भी समापन तक आखरी पड़ाव के लिए उत्सुकता ख़त्म नहीं होती। सफ़र को अंतिम तक फॉलो करने से खुद को रोक नहीं सकेंगे आप। भला कोई अपनी ही यात्रा को भी अधूरा छोड़ता है क्या! जॉन अपचर्च की मैंगो ड्रीम्स हम सब की यात्रा है। किरदारों का संघर्ष अगर कथा का संघर्ष बन जाए तो रूचि बढ़ जाती है। सलीम और डॉक्टर अमित के दरम्यान महज़ चालक और सवारी का फॉर्मल रिश्ता नहीं है। वो पल दो पल का सम्बन्ध भी नहीं है। यह परिचित-अपरिचित का नाता नहीं बल्कि दो मुक्तलिफ़ शख्सियतों की साझा यात्रा है। यह फिल्म दीवारों पर सवाल उठाती है… दीवारें तो कई खड़ी कर ली हमने पर क्या गिरतों को भी कभी उठाया है।

जॉन अपचर्च की मैंगो ड्रीम्स देखकर मेरा प्रेम की विजय पर यकीन बढ़ गया। तमाम विरोधाभासों के बावजूद मानव की एकरूपता समाप्त नहीं की जा सकती। उनके बीच की यूनिवर्सल बातें मिटाई नहीं जा सकती। हम किसी भी धर्म से ताल्लुक रखते हों अंत में मानव ही तो हैं। ज़मीन पर लकीरें खींच देने से रिश्तों की सीमाएं तय नहीं की जा सकती और न ही की जानी चाहिए। इतिहास से हमें कड़वे अनुभव मिलें, दीवारे मिली, सम्प्रदायों का संघर्ष मिला। लेकिन समय ने अच्छी यादें भी दी होंगी, नफरत को टूटते हुए भी देखा होगा, एकरुपता की मिसालें भी होंगी। दरअसल हम अपने ही इतिहास को पूरी तरह नहीं जानते। यात्राएं जीवन में बहुत महत्व रखती हैं, इंसान को अपनी ही खोज पर कभी-कभी निकलना चाहिए, जैसा कि डॉक्टर अमित व सलीम निकलते हैं। सब कुछ भूल जाने से पहले,बहुत कुछ फिर से जी लेना चाहिए।

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