गरीबों के लिए पार्टियां बनती गई, जनता और ग़रीब होती गई

Posted by Birender Rawat in Hindi, Society
December 26, 2016

ऐसे समय में, जब देश की दो बड़ी पार्टियाँ एक दूसरे पर अमीरों की साथी होने का आरोप लगा रहीं हैं, यह समझना ज़रूरी है कि क्या दोनों ही पार्टियाँ जनता के सामने कोई वैकल्पिक मॉडल पेश करने की ईमानदारी कर रहीं हैं या नहीं? नारों और एक दूसरे का उपहास उड़ाने से एक दूसरे दलों के प्रति सहानुभूति रखने वाले और वाली अपने-अपने नेता का उत्साह बढ़ाने के लिए तालियाँ तो बजा लेंगे और लेंगी, लेकिन नारों से उनकी समझदारी में रत्ती भर भी इजाफा होने से रहा।

स्वीस ग्लोबल वेल्थ डाटाबुक (Suisse Global Wealth Databooks) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में ग़रीब और अमीर के बीच खाई बढ़ती ही जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार सन 2000 में भारत में 1% सबसे अमीर लोगों के पास भारत की संम्पति का 36.8% यानि लगभग 37% था। यानि 100 में से 1 व्यक्ति के पास 100 में से 37 रूपये थे। 2010 में उस एक व्यक्ति के पास 100 में से 40 रुपये पहुँचा दिए। 2012 में उस एक के पास 49 रुपये पहुँचा दिए गये। जो कि 2015 में बढ़कर 53 और 2016 में बढ़कर 58.5 रुपये हो गये। UPA के कार्यकाल में जिस आर्थिक विषमता ने फैलना शुरू किया, वह NDA के कार्यकाल में भी फली-फूली। 2000 से 2016 तक लगभग साढ़े छह साल NDA का शासन था।

जिन दोनों पार्टियों के नेता एक दूसरे पर अमीरपरस्त होने का आरोप लगा रहे हैं, उन दोनों के ही कार्यकर्ताओं में से कितने लोग हैं जो 1% अमीरों की श्रेणी में आते हैं? यदि नहीं आते या आती तो उन्हें पूछना चाहिए कि हमें वैकल्पिक मॉडल बताइए।

रिपोर्ट यह भी बताती हैं कि सन 2000 में भारत के 10% सबसे अमीर लोगों के पास भारत की 53% पूँजी थी । जोकि 2015 में 76.3% और 2016  में 80.7% हो गयी। केवल 10% लोगों की पूँजी को 53% से बढ़ाकर लगभग 81% तक पहुँचाने में साढ़े छह साल NDA ने भी बहुत मेहनत की है।

ये दोनों दल एक दूसरे पर आरोप लगाकर एक ही हित साध रहे हैं। जनता को मूल सवालों से दूर ले जाने का हित, जो कि सत्ता का मूल चरित्र है। इसलिए यह ज़रूरी हो जाता है कि जनता अपना हित समझे। वह इस खेल में मजा लेना बंद करे कि किसने कैसे किसका अपमान किया।

वर्तमान में भारत के 90% लोगों के पास भारत की कुल पूँजी का मात्र 19% है। जुमलों और चुटकलों में मजा लेने की बजाय जनता बार-बार, ज़ोर से और साहस से यह पूछे कि भारत के 90% के हाथ में 19% की बजाय 91% लाने के लिए उनके पास कौन सी नीति है और उस नीति को क्रियान्वित करने के लिए कौन सा प्रशासनिक ढाँचा है? साथ ही जनता यह भी पूछे कि उस नीति को क्रियान्वित करने के लिए जो प्रशासनिक ढाँचा तैयार करना है, उसका प्लान ऑफ़ एक्शन क्या है?

चाहे UPA हो या NDA दोनों को ही संविधान में विश्वास नहीं है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 39 कहता है कि “राज्य के द्वारा नीति निर्धारण के लिए अपनाए जाने वाले सिद्धांत: राज्य को निम्नलिखित के अनुसार नीतियां बनानी चाहिये (Certain principles of policy to be followed by the State: The State shall, in particular, direct its policy towards securing)-

(a) नागरिक अर्थात महिला और पुरुष दोनों को ही सामान रूप से जीवन जीने के संसाधनों का अधिकार है (that the citizens, men and women equally, have the right to an adequate means to livelihood);

(b) समाज में संसाधनों का नियंत्रण और वितरण इस तरह होना चाहिये कि इनका उपयोग सभी की भलाई के लिए किया जा सके (that the ownership and control of the material resources of the community are so distributed as best to sub serve the common good);

(c) अर्थव्यवस्था इस तरह से काम न करे कि सम्पत्ति और संसाधनों का फायदा एक वर्ग विशेष को ही मिले (that the operation of the economic system does not result in the concentration of wealth and means of production to the common detriment);”

राज्य दिनोंदिन रोजगार के अवसर घटाकर संविधान के अनुच्छेद 39 (क) का, शिक्षा, स्वास्थ्य, जैसे जनपक्षीय विषयों पर बजट घटाकर अनुच्छेद 39 (ख) का, तथा सन 2000 से 2016 तब 1% अमीरों की पूँजी को 37% से बढ़ाकर 58.5 % करके अनुच्छेद 39 (ग) का अपमान कर रहा है। क्योंकि राज्य चाहे वह NDA द्वारा शासित हो या UPA द्वारा दोनों ही देश को संविधान द्वारा बताई गयी दिशा से विपरीत दिशाओं में ले गये। इसलिए यह जनता की भी ज़िम्मेदारी बनती है कि वह दलों से मूल सवाल पूछे, नेताओं के चुटकलों पर ताली न बजाए।

 

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