बिन कैश सब सून, नोटबंदी पर बिहार से रिपोर्ट

Posted by Zaheeb Ajmal in Business and Economy, Hindi
December 14, 2016

आठ नवम्बर की रात के बाद देश में कुछ समान्य नहीं रहा, रात आठ बजे प्रधानमंत्री ने देश को अचानक सम्बोधित किया। उन्होंने बताया कि देश में रात 12 बजे के बाद से 500 और 1000 के मौजूदा नोट नहीं चलेंगे। इसके बाद ज़्यादातर लोगों की नज़रें सिर्फ एक जगह हैं, दिमाग सिर्फ एक जगह है। यानी बैंक में पैसा कब आएगा। कौन सा एटीएम खुला है। क्या लाइन में लगने के बावजूद मेरा नंबर आएगा। बस ऐसी ही चिंता का माहौल चारों तरफ है।

शहर को थोड़ी देर भुला कर हम बिहार के सीमांचल इलाके के अररिया जिला के सरगना नाम के गाँव चलते हैं। यहां लोग बाहर मजदूरी करने जाते हैं या फिर सरगना में ही खेती कर अपना गुज़र-बसर करते हैं। विमुद्रीकरण (Demonetization) के बाद इस गाँव में मानो उथल-पुथल सी हो गयी है। आस पास कई एटीएम हैं। सेंट्रल बैंक और स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया का एटीएम सबसे करीब है। नोटबंदी से पहले वे अक्सर शाम में बंद हो जाते थे। अगर खुले भी होते थे तो उसमें पैसे नहीं होते थे या फिर 500 या 1000 के ही नोट हुआ करते थे। स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया का एक और एटीएम 2-3 किलोमीटर की दूरी पर है। इसके बाद अगला एटीएम गाँव से करीब 12 से 15 किलोमीटर की दूरी पर रानीगंज में है। यहाँ आपको पांच एटीएम मिलेंगे- बैंक ऑफ़ बड़ौदा, केनरा बैंक, बैंक ऑफ़ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक और स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया।

अगर बैंकों के बारे में बात करें तो इसकी हालत का अंदाज़ा आप इस एक बात से लगा सकते हैं। बात 7 नवम्बर की है, मैं एक साहब से मिलने गया, उनके किसी दोस्त को बैंक से कुछ पैसे निकलवाने थे। वे लिखना नहीं जानते थे। इसलिए वह उन साहब के पास आए थे ताकि वे उनका निकासी पर्ची भर दें। उन्हें 30 हज़ार निकलवाने थे। दस मिनट बाद वे लौट कर आएं और बोलें की फिर से लिख दो। बैंक वाला बोल रहा था कि 25 हज़ार ही निकलेगा। बैंक में पैसा नहीं है। जब आम दिनों में यहाँ कैश का यह हाल है तो इसके बाद का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है। यहाँ हालात और ज़्यादा ख़राब हो चुके हैं।

अभी धान की कटाई का समय है। विमुद्रीकरण का किसानों पर भारी असर पड़ा है। भगत ऋषि के पास 10 कट्ठा खेत है और 10 कट्ठा खेत फ़िलहाल बटाई पर लिए हुए हैं। भगत का कहना है कि दिक्कत तो है। भगत ने धान की कटाई कर ली है। अब उन्हें मकई की फसल के लिए बीज खरीदना है। पैसे की दिक्कत है। उन्होंने बताया कि बैंक में बहुत भीड़ है, दो घंटा बैंक में लाइन लगने के बाद पैसा मिला। वह भी बस 2000 रुपए। अब उसमें घर चलाएं या खेती करें। खेती छोड़ कर लाइन में लगना पड़ रहा है। उस 2000 रुपये से भी तीन से चार दिन राशन चलता है। उसके बाद जो धान काटे हैं, उसी का चौर बनाते हैं और किसी तरह गुज़ारा कर रहे हैं। भगत जी राशन गाँव में लगने वाले हटिया से लेते हैं। कभी-कभी उन्हें धान भी बेच कर पैसा लाना पड़ता है। एक किलो धान सात रुपए किलो बिकता है। फ़िलहाल सरगना बाज़ार में चावल 30 रुपए किलो, दाल-150 रुपए किलो, आलू-10 रुपए किलो,  प्याज- 20 रुपए किलो, गोभी-10 रुपए किलो, टमाटर- 40 रुपए किलो बिक रहा है। भगत जी के तीन बेटे हैं। तीनों पंजाब में कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम करते हैं। तीन बहू, पोते-पोतियों और खेती की ज़िम्मेदारी उन्होंने अपने सर पर ले रखी है।

सिर्फ भगत ही नहीं, बुद्धदेव मेहता का भी यही हाल है। इस बार पैसा नहीं होने की वजह से एक तो उनकी फसल की कटाई में देरी हो गयी। वह बताते हैं कि उनके पास मकई और पाट की खेती के लिए बीज और खाद खरीदने के पैसे नहीं हैं।  बुद्धदेव का कहना है कि उनका अपना पैसा जब वक़्त पर काम न आए, तो क्या फायदा। वह कहते हैं कि मरता तो गरीब ही है। नेता लोग कभी गरीब के बारे में सोच कर फैसला लें तो अच्छा हो। धान की कटाई और उसे बेचने का वक़्त है। कितनी दिक्कत हो रही है, वह हम ही लोग समझते हैं। इनकी परेशानी उनके चेहरे पर साफ़ झलकती है। हर वक़्त मुस्कुरा कर बात करने वाले मेहता चाचा काफी उदास रह रहे हैं।

कुछ दिन पहले मेरी मुलाकात पुनीत श्रीवास्तव से हुई। पुनीत गाँव में वेल्डिंग की दुकान करते हैं। गाँव में इनकी 10 बीघा खेती की ज़मीन है। इनके पिताजी खेती की निगरानी करते हैं। गाँव के मजदूरों से ही खेत में काम कराते हैं। इन्होने बताया कि केन्द्र  सरकार ने जो किया है, उसका तोड़ किसी के पास नहीं है। इससे काला धन रुकेगा। और जो काला बाजारी करते हैं, उनका नुकसान तो हो ही रहा है। वे नोटबंदी की वजह से धंधे पर असर की बात करते हैं, बताते हैं कि धंधे पर असर तो हुआ है। लेकिन कुछ ही दिन न, कुछ अच्छा होने के लिए कुछ दिन नुकसान भी सहना पड़ता है। ऐसा कदम उठाने की क्षमता पहले वाली सरकार की होती तो अब तक देश की तस्वीर बदल चुकी होती।

देखा जाए तो विमुद्रीकरण से असल चोट गरीब किसान को हुई है। वैसा किसान जो खुद खेत जोतता है। खुद कटाई और चोपाई करता है। वह परेशान और बदहाल है, न वह खाद खरीद पा रहा है और न ही बीज। उसकी आमदनी का स्रोत है तो बस उनकी खेती है। वहीं दूसरी तरफ जिनके पास काफी खेत है, दुकानें भी हैं, आमदनी के दूसरे स्रोत हैं तो वह इस विमुद्रीकरण से खुश नज़र आ रहे हैं।

जहां भगत और बुद्धदेव परेशान हैं, वही किर्तानंद ऋषि और उद्यानंद यादव की राय अलग है। वे सरकार के इस फैसले से खुश भी हैं। उद्यानंद गाँव में एक साइकिल रिपेयर की दुकान चलाते हैं। उनकी ये दुकान 1988 से है। इनका एक बेटा पंजाब में काम करता और दूसरा दिल्ली में। उद्यानंद काफी हंसमुख इंसान हैं। जब मैंने इनसे जानने की कोशिश की, कि क्या विमुद्रीकरण की वजह से धंधे पर कोई असर पड़ा है? तो उन्होंने बताया की ज़रा भी असर नहीं है। दुकान तो चल ही रही है। दस या 50 जो आना है, वह भी आ ही रहा है। उन्होंने बताया कि गरीब को इससे क्या चिंता। चिंता उसको होनी चाहिए जो करोड़ और लाखों में खेल रहा था। सरकार ने ऐसा किया है कि हम तो इसके फैन हो गए हैं। जो काला धन का धंधा करने वाले हैं, सरकार ने तो उसकी नींद हराम कर दी है। देखिएगा 30 दिसम्बर के बाद गरीब को इससे कितना फायदा होगा। सरकार गरीब के लिए सोच रही है, अच्छा ही होगा।

किर्तानंद ऋषि किसान हैं। उनका बेटा गाँव में एक कंप्यूटर की दुकान के साथ, किराना दुकान भी चलाता है। किर्तानंद ऋषि ने भी अभी कुछ दिन पहले धान की कटाई की है। उन्होंने बताया की कटाई और धान बेचने में दिक्कत तो हो रही है लेकिन क्या हम देश के लिए कुछ दिन की दिक्कत नहीं उठा सकते हैं? उनके हिसाब से केंद्र सरकार या किसी भी सरकार का ये सबसे बेहतरीन और अहम कदम है। उन्होंने बिना किसी का नाम लिये ये बताया कि गाँव में कई लोग हैं, जो काला कमाई रखे हुए हैं। उनका अब पसीना छूट रहा है। वह मानते हैं कि इससे सबसे ज़्यादा फायदा अगर किसी को होगा तो वह जन-धन खाता धारक को ही होगा। ऐसे ही नियम से ये सब काला धन और काला बाजारी रुकेगी। देश ऐसे ही आगे बढ़ेगा। उन्होंने यह भी बताया कि आप देखिएगा 30 दिसम्बर के बाद सरकार जन-धन अकाउंट में पैसा भी भेजेगी। इसलिए तो सरकार ने जन-धन अकाउंट खुलवाया था।

किर्तानंद ऋषि और उद्यानंद यादव ने देश के नाम पर अपनी कमाई दांव पर लगा दी है। हालांकि वे उसके बदले कुछ सामाजिक बदलाव की उम्मीद भी करते हैं। वे विमुद्रीकरण के  साथ जी जान से खड़े हैं। लेकिन इसी के साथ वह यह भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि मोदी सरकार चुनाव के वक्त किए गए वादे अब निभाएगी। यानी काला धन वापस ला कर वह हर व्यक्ति के अकाउंट में 15 लाख रुपए जमा करेगी। उनके सूखे पड़े जन-धन खाते में पैसे आयेंगे।

गाँव के बाज़ार सूने पड़े हैं। दुकानदारों की कमाई आधी हो चुकी हैं। सब्जी वाले मोइउद्दिन आलम कहते हैं, जहां एक हजार कमाते थे, वहीं अब 500 रुपए कमा पा रहे हैं।  किसी तरह चल रहा है। धंधा करें या लाइन में लगें। गाँव में जो लोग मजदूरी या मिस्त्री का काम कर रहे हैं, उन पर भी असर पड़ा है। महेंद्र यादव गाँव में मिस्त्री का काम करते हैं। उन्होंने एक साहब के यहाँ नौ दिन का काम किया था। लेकिन एक दिन का भी पैसा नहीं मिला। उनके बेटे ने भी उनके साथ वहीं चार दिन तक काम किया था। उसे भी सिर्फ डेढ़ दिन का पैसा दिया। उन्होंने बताया कि उसने पैसा उधार कर दिया है। बोलता है, बाद में लेना। जब होगा, तब दे देंगे। महेन्द्र के आमदनी का स्रोत सिर्फ यही मजदूरी है। घंटों लाइन में लग कर उन्होंने दो हज़ार निकाले तो किसी तरह उनका राशन पानी चल रहा है।

अब आपको थोड़ा सरगना से पंजाब जा कर काम करने वालों के अनुभव से रूबरू कराता हूं। सरगना से जो लोग बाहर काम करने जाते हैं, उनमे से कई के अकाउंट यहीं सरगना में हैं। इसकी वजह से पैसा जमा करने में दिक्कत हो रही है। क्योंकि पैसा जमा करने के लिए साथ में पासबुक भी मांगा जा रहा है। कई लोग तो इसलिए अपने गाँव वापस लौट रहे है क्योंेकि उन्हें जो पैसे मिले वे 500 या 1000 के पुराने नोट थे। यही नहीं परदेस में वे चावल, दाल, सब्जी और रोज़मर्रा के दूसरे सामान खरीदने के लिए परेशान हैं।

बाहर से लौटे कुमोद ऋषि की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। पंजाब में पटियाला के पास एक गाँव में वह धान कटाई और उसकी तय्यारी का काम कर रहे थे। तब ही उन्हें यह पता चला कि अब 500 या 1000 के पुराने नोट नहीं चलेंगे। लेकिन उन्होंने ये सोचा कि कोई न कोई दुकानदार 500-1000 लेकर उन्हें राशन दे देगा। वे किसी तरह काम चला लेंगे। कुछ दिन बाद तो सब ठीक हो ही जाएगा।

एक-दो दिन तक तो किसी तरह काम चल गया। अगर किसी दुकानदार ने पुराने नोट नहीं लिए तो उधार दे दिया। लेकिन जब उधार मिलना भी बंद हो गया और नोट भी बदलने को कोई तैयार नहीं हुआ तो कुमोद को लौटना पड़ा। लौटने का इरादा करने के बाद भी उसकी मुसीबत टली नहीं। उसने लौटने के लिए स्टेशन पर आकर जब टिकट कटा लिया तो रस्ते के लिए कुछ खाने का लेने को सोचा। लेकिन स्टेशन पर पानी खरीदने या खाना खरीदने में परेशानी का सामना करना पड़ा। एक घंटे तक इधर से उधर दुकानों पर भटकने के बाद किसी तरह एक साहब ने उसको 500 के खुल्ले पैसे दे दिए। उसका भारी नुकसान हुआ। एक ओर, जहां धान कटाई का काम कर रहा था, वहां आधा काम छोड़ कर आना पड़ा।  दूसरी ओर, इस काम के खत्म होने के बाद उसे एक कंस्ट्रक्शन साईट पर मजदूरी का काम मिल गया था। पर उसे सब छोड़कर आना पड़ा।

सरगना के पास के रहने वाले जब्बार लुधियाना में प्लास्टर का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि नोटबंदी की वजह से उसे बहुत दिक्कत हो रही है। जब्बार पिछले एक महीने से अपने पिताजी के अकाउंट में पैसा नहीं भेज पा रहा है। राशन की उसे कोई दिक्कत नहीं हो रही है। ठेकेदार खाने का इंतजाम कर रहा है। उसी की तरह आसनसोल के रहने वाले इब्राहीम करीब बारह साल से लुधियाना में काम करने आ रहे हैं। इब्राहिम, मिस्त्री का साथ देने का काम करते हैं। इब्राहिम बताते हैं कि नोटबंदी के बाद उन्हें काफी दिक्कत हो रही है। राशन लाने की दिक्कत सबसे ज़्यादा है। काम भी आधा हो गया है।

Note: With Input from Ankur, Ludhiana.

(This article has been written by Zaheeb Ajmal, Research Fellow, Centre for Equity Studies. The study is part of a broader research on labour migration, economic growth and political democracy, funded by the Economic and Social Research Council of the UK। The research is hosted at the University of Oxford. Dr. Indrajit Roy is Principal Investigator.)

 

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