हमारा समाज ये क्यों सोचता है कि लड़की का काम सिर्फ घर संभालना और बच्चे पैदा करना ही है

मामा के घर गया था। बातों बातों में नौकरीपेशा लड़कियों का मुद्दा उठा। मामी ने कुछ शिकायती लहज़े में, कुछ तारीफ़ के लहजे में बताया कि मामा हमेशा कहते हैं -अगर लड़कियों को आगे जाकर करियर नहीं बनाना, नौकरी नहीं करनी तो टेक्निकल कोर्स में हाथ नहीं डालना चाहिए। वैसे भी अच्छे टेक्निकल इंस्टीट्यूट्स में सीट्स की मारा मारी होती है। ऐसे में ऐसी डिग्री ले के घर बैठना सिर्फ अपनी ही नहीं, उस एक ज़िन्दगी से भी खिलवाड़ है जो उस जगह को आपसे अधिक डिज़र्व करता था और उस का बेहतर इस्तेमाल कर पाता।

ज़्यादातर लड़कियां हायर एजुकेशन में करियर बनाने जाती हैं या जा रही हैं, इसमें मुझे शक है। आज भी लड़कियों को अपनी पसंद के कॉलेज चुनने का हक नहीं है। हज़ार बहाने बनाये जाते हैं। अकेले कैसे रहोगी, कहाँ रहोगी, अंजान शहर है, कितना अनसेफ है, सब लोग क्या कहेंगे, कुछ ऊपर नीचे हो गया तो। पढ़कर करना भी क्या है, नौकरी तो करोगी नहीं। इन सबसे लड़ झगड़ कर लड़की अगर पढ़ भी लेती है तो सुनाया जाता है – अब एक अच्छा सा लड़का खोज कर तुझे उसके हवाले करूँ और मोह माया से मुक्त हो जाऊं।

इसके बाद वही सब, बच्चे पैदा करना, घर परिवार, सास-ससुर, रिश्तेदार। करियर की बात पर पति सीधा कहते है – क्या करोगी जॉब कर के, कोई कमी है क्या? ये बात इतनी धौंस के साथ कही जाती है कि ज़्यादातर लड़कियां कह नहीं पाती कि हां, कमी है, अपनी काबिलियत को इस्तेमाल करने की। एमबीए, एमसीए, बीटेक करने के बाद दिन रात दूध गर्म करने और दाल में नमक बराबर रखने की फ्रस्ट्रेशन कम करने की ज़रूरत है। झाड़ू की सींक हेयर पिन न बन जाये इस डर को दूर करने की ज़रूरत है। कहना चाहती है कि मैं भी तुम्हारे जितनी पढ़ी लिखी हूँ, तुमसे ज़्यादा नहीं तो कम भी नहीं, लेकिन मैं घर के काम कर रही हूँ, और तुम धौंस से दुनिया चला रहे हो। लेकिन दब जाती है आवाज़। क्योंकि पापा-मम्मी ने कहा था, अब तो वही घर तेरा है।

आजकल लड़कियां टेक्निकल कोर्स में भेजी तो जा रही हैं, लेकिन ज़्यादातर इसलिए कि पढ़ी लिखी लड़की को कमाऊ लड़का मिलेगा और दहेज़ कम लगेगा। दहेज़ तय करते वक़्त बेहद सॉलिड तर्क दिया जाता है, अरे लड़की एमसीए है। भगवान न करे कभी बुरा वक़्त आये, लेकिन आड़े वक़्त में घर में मदद करेगी। बड़ा मज़ेदार लगता है जब बाप अपनी बेटी को खुद इस तरह के तर्क देकर सभ्य तरीके से बेचता है। अपने प्रोडक्ट की खूबियां गिना कर।

इससे भी ज़्यादा मज़ेदार लगता है जब ये लड़कियां बड़ी हो जाती हैं, दो चार किशोरवय बच्चों की माँ बन जाती है, प्रौढ़ हो जाती है, थकने लगती हैं। उस वक़्त इन्हें घर में खाली देख कर पति कहता है – तुम खुद को एंगेज क्यों नहीं रखती। इतनी पढ़ी लिखी हो, टैलेंटेड हो। कुछ करो, कोई नौकरी देखो। और पत्नी सोचती है – व्हॉट द एफ़ इज़ दिस, उम्र गुज़र गयी और जब आराम करने का मन होता है तब काम करूँ, वो भी सिर्फ इसलिए कि तुम कहते हो। तुमने कहा तो नहीं किया , अब तुम कहते हो तो कर लूं। हिपोक्रेट लिबरल्स! बस कहती नहीं है-पापा की बात याद आ जाती है।

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