अथ मुलायम परिवार कथा

Posted by KP Singh
January 7, 2017

Self-Published

—-के पी सिंह , संपादक झांसी टाइम्स

 

उत्तर प्रदेश का लोकतांत्रिक राजकाज सरेआम पारिवारिक जागीर में बदल गया है। यह स्थिति गुरुवार को सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के आवास पर प्रदेश के राजनीतिक संकट के समाधान के लिए उनके कुनबे के बीच बातचीत से फिर उजागर हुई। इसमें सीएम अखिलेश भी थे। बैठक में मुलायम सिंह के दोनों गैर राजनैतिक भाई अभयराम और राजपाल भी मौजूद रहे, लेकिन न तो सरकार के दूसरे लोग इस अवसर पर थे और न पार्टी के सिवाय अमर सिंह के, जो शायद मुलायम सिंह के ही दूसरे घर को बैठक में रिप्रजेंट कर रहे थे।

राजशाही भी लोगों के लिए अच्छी जवाबदेह व्यवस्था हो सकती है। भारतीय जनता पार्टी का सुशासन का मॉडल रामराज है, जो राजतंत्रीय व्यवस्था थी लेकिन तत्कालीन नैतिक और वैधानिक मान्यताओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए एक साधारण नागरिक से मिले फीडबैक के कारण राजा रामचंद्र जी को ऐसी व्यवस्था में अपनी आदर्श पत्नी का अन्यायपूर्ण परित्याग भी राजधर्म के नाते आवश्यक लगा था। जबकि उन्हें यह निर्णय लेते समय व्यक्तिगत तौर पर असीम संत्रास के अऩुभव से गुजरना पड़ा था।

अगर उत्तर प्रदेश की जनता को संसद, राज्यों के विधानमंडलों से लेकर अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं तक में अपने घर के लोगों की भरमार करते हुए भी मुलायम सिंह मंजूर रहें और अब प्रदेश की समूची राजनीति को मथने वाली उनकी पारिवारिक उठापटक पर भी उंगली उठाना उन्हें अपनी राजभक्ति पर दाग लगाना महसूस हो रहा है तो यह मान लिया जाना चाहिए कि प्रदेश के लोगों को विश्वास हो चुका है कि मुलायम सिंह और उनके परिवार के लोग अतीत के राजाओं की तरह दैवीय शक्तियों के प्रतिनिधि हैं। इस नाते इस प्रदेश में हुकूमत में रहने और हुकूमत को चलाने का अधिकार नैसर्गिक तौर पर उनको है। इस ब्रह्मसत्य के साक्षात्कार के बाद चुनाव की आयोजना का झंझट समाप्त कर दिया जाना चाहिए, जिस पर बहुत खर्चा होता है। इस खर्चे से आधुनिक द्वारिका सैफई नगरी का स्वरूप और ज्यादा दिव्य रूप से भव्य बनाकर प्रदेश की प्रजा को नेत्रविलास के अथाह, असीम सुख की अनुभूति कराई जा सकेगी।

यह तो हुआ लोकतंत्र में सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के पारिवारिक कार्य संचालन के औचित्य का मुद्दा, अब दूसरा सवाल यह है कि थोपे जाने की स्थितियों से उबर कर जनप्रिय मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार्य हो चुके अखिलेश में ऐसा कौन सा खोट मुलायम सिंह को नजर आया जिससे उनकी चाल को बेड़ियों में जकड़ने की छूट उन्होंने अपने अनुज शिवपाल को देने की जरूरत महसूस की। प्रो. रामगोपाल यादव एक बार यह बयान दे चुके हैं कि मुलायम सिंह अपने बेटे के जलवे से जलने लगे हैं जिसके कारण उन्होंने आपा खो दिया है। अखिलेश का जलवा वाकई में बहुत बुलंद हो चुका है, जिसका अंदाजा शायद मुलायम सिंह को था नहीं क्योंकि मुलायम सिंह ने पिछले वर्ष के उत्तरार्द्ध के कई महीनों में मंच से बार-बार यह कहा कि शिवपाल को लगातार नीचा दिखाया जा रहा है जो अऩुचित है और अगर ऐसी हालत में वे उनका साथ देने के लिए खड़े हो गये तो मुख्यमंत्री के साथ उनके कुछ चाटुकार सलाहकार ही रह जाएंगे, पूरी पार्टी उनके साथ चली आएगी। लेकिन हुआ इसका उलटा, अखिलेश जब अलग खड़े हो गए तो लगभग पूरी पार्टी मुलायम सिंह का साथ छोड़कर उनके साथ चली आई है।

मुलायम सिंह इससे हतप्रभ जरूर होंगे लेकिन यह बात बिल्कुल सही नहीं हो सकती कि उन्हें अखिलेश जलन है बल्कि अगर भावनाओं को नापने का कोई मीटर इजाद हो गया होता तो पता चल जाता कि अपने बेटे से हारने में मुलायम सिंह को अपनी सबसे ज्यादा खुशनसीबी का अहसास हो रहा है। खुद अखिलेश भी इस बात को जानते हैं इसीलिए उन्होंने घोषणा कर रखी है कि तीन महीने का मौका पार्टी के लोग उन्हें दें ताकि वे जीत का तोहफा लेकर नेताजी के कदमों में रख सकें। इसके बाद वे सब कुछ छोड़ देंगे। जब पिता-पुत्र में इस हद तक गर्मजोश लगाव बरकरार है फिर कलह क्यों हो रहा है, यह जानने के लिए अखिलेश के उन बयानों पर गौर करने की जरूरत है जो पिछले वर्ष पस्त हालत में पहुंचने के बाद उनके मुंह से निकले थे। उन्होंने कहा था कि कुछ अदृश्य शक्तियां उनके खिलाफ साजिशों में जुटी हुई हैं। उन्होंने हाल में जब नेताजी के समानांतर प्रत्याशियों की अपनी सूची जारी की तो उसमें घर की दूसरी बहू अपर्णा का नाम गायब था। क्या अपने खिलाफ तनी अदृश्य साजिशी शक्तियों पर निशाना साधने के लिए उन्होंने यह उपक्रम किया?

मुलायम सिंह की परिवार कथा के रहस्य अभी तक कानाफूसियों में सिमटे हुए हैं लेकिन जान सब गए हैं कि मुलायम सिंह को किन लाचारियों की वजह से अपने प्रिय बेटे के खिलाफ  उग्र होने का अभिनय करना पड़ता है। इन अदृश्य शक्तियों में शिवपाल और अमर सिंह की पैठ है इसलिए मुलायम सिंह ने समझौता कराया पर इन लोगों ने हर समझौते को पंचर कर दिया। शिवपाल ने प्रदेश अध्यक्ष बनते ही यह जाहिर किया कि अखिलेश के प्रति ज्यादा वफादारी गुनाह में शुमार मानी जाएगी और ऐसे लोग पार्टी से बाहर कर दिए जाएंगे। अखिलेश के जिन तीन सिपहसालारों को उन्होंने निष्कासित किया था, उनको मुलायम सिंह द्वारा आशीर्वाद और माफी दिए जाने के बाद भी शिवपाल ने वापस नहीं लिया। मुलायम सिंह कहते रहे कि अखिलेश या कोई और उनकी पार्टी से चुनाव में सीएम का चेहरा घोषित नहीं किया जाएगा लेकिन शिवपाल ने यही कहा था कि अखिलेश ही विधानसभा के आगामी चुनाव में पार्टी के बहुमत में आने पर दोबारा समाजवादी पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री होंगे। यह बात मुझसे शपथपत्र पर लिखवाकर ले लो लेकिन प्रत्याशियों की सूची जारी होने के क्रम के साथ ही उन्होंने अपनी बात पलट दी और कहा कि विधायक दल चुनाव बाद जिसे चुनेगा उसको मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। विधायक दल में अखिलेश की बढ़त की किसी भी गुंजाइश को खत्म करने के लिए उनके चहेते विधायकों तक के टिकट काट दिए गए प्रत्याशियों की तो बात ही अलग है।

इसके बाद अखिलेश के सामने क्या विकल्प बचा था। खुद मुलायम सिंह भी जानते हैं कि उनकी समाजवादी पार्टी का भविष्य अब अखिलेश हैं इसलिए अखिलेश के करियर के पटाक्षेप करने का मतलब है अपने राजनीतिक इतिहास का अंत कर लेना। फिर भी मुलायम सिंह ने अखिलेश को शिवपाल के कोप से सुरक्षित करने का कोई उपाय नहीं किया जबकि उन जैसा यशकामी नेता यह करने से चूक नहीं सकता था। मतलब साफ है कि किसी नागपाश में जकड़े मुलायम सिंह वर्तमान हालातों में छटपटा से रहे हैं। अखिलेश को उनको लाचारी का बखूबी अंदाजा है इसलिए वे भी उनसे नाराज नहीं हैं। समाजवादी पार्टी का खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का फैसला उन्होंने पिता को नीचा दिखाने के लिए नहीं बल्कि अपने खिलाफ उनके इस्तेमाल की गुंजाइश को खत्म करने के लिए किया होगा।

इसका तोड़ ढूंढने की एक और चाल थी, मुलायम सिंह के लखनऊ स्थित आवास पर अन्य भाइयों के साथ उनके पूरे परिवार की बैठक की आयोजना। इसके पीछे जरूर कोई शातिर दिमाग रहा जिसके चलते अभयराम यादव से अगले दिन यह कहलवाया गया कि प्रो. रामगोपाल यादव उनके घऱ में बिगाड़ करा रहे हैं जबकि राजनीतिक पचड़ों से दूर रहने वाले अभयराम ऐसी कोई टिप्पणी करें, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता। बाहर का आदमी अंदर हो गया और अंदर के आदमी को बाहरी साबित करने की यह व्यूह रचना इसलिए की गई है क्योंकि अखिलेश जिस अमोघ शक्ति की बदौलत पारिवारिक-राजनैतिक द्वंद्व में भारी पड़ रहे हैं उसके पीछे रामगोपाल यादव हैं जिनकी कानूनी योग्यता और दूरदर्शिता की कोई काट समाजवादी पार्टी के किसी नेता में नहीं है। मुलायम सिंह परिवार की उठापटक के बीच सीबीआई का आकाशवाणीनुमा यह बयान भी बहुत गौरतलब है कि रामगोपाल के बेटे अक्षय को यादव सिंह भ्रष्टाचार मामले की जांच में अभी तक कोई क्लीनचिट नहीं दी गई है। नेताजी और पीएम मोदी में निजी स्तर पर बहुत गहरे रिश्ते हैं और रिश्ते मित्रों के संकट के समय ही तो काम आते हैं। रामगोपाल को चौतरफा घेरा जा रहा है ताकि अखिलेश को निहत्था किया जा सके। इसमें मुलायम सिंह का स्वेच्छा से योगदान नहीं है लेकिन अखिलेश के खिलाफ मंडरा रहीं अदृश्य शक्तियों की जकड़बंदी के चलते मुलायम सिंह मजबूर हैं, लाचार हैं।

जाहिर है कि मुलायम परिवार की उठापटक का राजनीतिक समाधान तो चुनाव की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों की वजह से जल्द संभव है लेकिन असल संकट का विस्तार बहुत दूरगामी है। उस पर यह सिर्फ कयास ही लगाए जा सकते हैं कि मुलायम परिवार की डांवाडोल नैया आखिर में किस किनारे लगेगी?

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