आखिर मुद्दा क्या है?

Posted by Dharmendra Rajmangal
January 19, 2017

Self-Published

उत्तर प्रदेश का चुनाव सच में बड़ा जटिल होता है| यहाँ पार्टियाँ ये ज्यादा देखती हैं कि कौन सा प्रत्याशी जिताऊ प्रत्याशी है? फिर चाहे वो कितना ही दागदार क्यों न हो। कौन सी जगह किस जाति या समुदाय का बाहुल्य है? वहां उसी टाइप का प्रत्याशी मैंदान में उतरा जाता है। यहाँ अधिकतर प्रत्याशी पैसे और ताकत से राजनीति में प्रवेश करते हैं।

यहाँ वो मुद्दे कम  होते जो अन्य राज्यों में देखने को मिलते हैं। अधिकतर लोग ये देखकर वोट देते हैं की प्रत्याशी उनकी जाति या धर्म का है कि नहीं? यहाँ के नेता को पता होता है कि उन्हें कौन सा समुदाय या जाति उन्हें वोट देगा। वोटरों में भी अधिकतर अपनी जाति या धर्म के प्रत्याशी को ही वोट देना पसंद करते हैं।

गाँव में बिजली, सड़क, पानी है कि नहीं, हालाँकि अब नयी जनरेशन मुद्दों को लेकर अपना मत बनाती है लेकिन उन सब की संख्या मुद्दों को न सोचने वालों से कम है। घर का मुखिया जिस भी प्रत्याशी के लिए वोट डाले, बाकी के लोग भी उसी को वोट डालते हैं। महिलाओं को घर के पुरुषों के कहे मुताबिक ही वोट डालना पड़ता है।

अगर एक प्रत्याशी का किसी बात पर समर्थन हो जाय तो सब लोग उसी का समर्थन करने लग जाते हैं। चुनावों के समय हुए मतभेद काफी समय तक वोटरों में आपसी कलह की वजह बनते हैं।

इस वार के चुनाव में पता ही नहीं चल रहा कि पार्टियाँ किस मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगीं? ऐसा लगता है जैसे वो जनता के लाभ से ज्यादा खुद जीतने और दूसरे को नीचा दिखाने के लिए चुनाव लड़ती हैं।

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