उत्तर प्रदेश में वोट डालें अपने हिसाब से

Posted by Shubham Kamal
January 7, 2017

Self-Published

नमस्कार देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के इस लोकतान्त्रिक महोत्सव में आपका स्वागत है,एक बार जनता अपनी ताकत का प्रदर्शन करने को तैयार है,चुनावी बिगुल बज चूका है,राजनितीक पार्टियों की दुकाने सज चुकी है,अब जनता को अपनी राजनितिक पार्टियों की ओर आकर्षित करने की रस्सा-कशी होगी,आइये चलते है उ०प्र० के इस चुनावी मेले में-

मैं राजनीति विज्ञान का छात्र नही हूं और न ही राजनीतिक पृष्टभूमी से आता हूं। और न ही चुनावी विशेषज्ञ पर एक यूपी वाले की तरह कहना चाहूँगा की इस आगामी विधानसभा चुनाव 2017 को लोकसभा चुनाव 2014 की तरह देखना बहुत बड़ी भूल है। और देश के सबसे बड़े राज्य जहाँ लगभग 14 करोड़ मतदाता हों वहां आप किसी भी ओपिनियन पोल य सर्वे पर विश्वास नहीं कर सकते, इस उ०प्र० के विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण स्थानीय मुद्दे और धर्म-जाति समीकरण होते हैं जिससे जनता ज़मीनी स्तर पर प्रभावित होती है कुछ राष्ट्रीय मुद्दे भी शामिल हो सकते हैं यदि उसका प्रभाव सीधे आम जनता पर पड़ा हो,आज चर्चा गरम है कि उ०प्र में अगली सरकार किसकी होगी?

यहाँ मुख्यतः 4 पार्टियां (सपा,बसपा,भाजपा,कांग्रेस) अपनी जोर आज़माइश से जनता को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है, भाजपा विकास के बूते चुनाव लड़ना चाहती है और जनता के सामने केंद्र की नीतियां और भाजपा शाषित राज्यों की दिशा-दशा रख रही है,लेकिन विकास दिखा नहीं और शायद यह बात जनता तक पहुंची हो, उ०प्र ने 73 सांसद दिए लेकिन प्रधानमंत्री की एक भी योजना पूर्णत: कामयाब न हो सकी। न ही फसल बीमा योजना,न मुद्रा योजना और न ही स्टार्टअप योजना और सबसे ज्यादा संशय तो नोटबंदी को लेकर है। 31 दिसम्बर के बाद भी हालात सामान्य नहीं है,हजारो नौकरिया जा चुकी है/मजदूरी-दिहाड़ी नहीं मिल रही/फसल बिक नहीं रही और कालाधन कहां गया यह पता नहींं। गरीब को क्या फायदा हुआ यह बात जनता के बीच खटक रही है। भाजपा का वोट बैंक सवर्णों+क्षत्रिय और कुछ ओबीसी ही हैं जिसे और भुनाने के लिए वह हिंदुत्व का सहारा ले रही है और 2014 को 2017 से जोड़कर बड़ी भूल कर रही है। भाजपा का विकास स्थानीय क्षेत्रों से गायब है(स्वच्छ भारत के तहत शौचालय को छोड़ दे तो) और भाजपा की सबसे बड़ी भूल मुख्यमंत्री पद के लिए चेहरा घोषित न करना है। ऐसे में यदि जनता भाजपा की भ्रष्टाचार रहित सरकार चुनती है तो एक ऐतिहासिक जीत होगी यदि हारी तो 2019 के लिए बड़ी मुसीबत हो जाएगी। वहीं भाजपा का फार्मूला सवर्ण+ओबीसी कितना कारगार होगा और विकास रुपी छवि में कितने दलित+मुस्लिम जुड़ते है देखने वाली बात होगी|

वहीं दूसरी ओर उ०प्र० की सबसे ताकतवर राजनीतिक पार्टी समाजवादी पार्टी अपने सम्पूर्ण विकास के एजेंडे को लेकर सत्ता वापसी का ख्वाब संजोये है,और अपने वर्चस्व की लड़ाई जीत चुके अखिलेश यादव की बेदाग छवि और युवाओं में पहचान से सपा मजबूत दशा में है, समाजवादी पार्टी के सारे समीकरण ठीक बैठते हैं जिसमे एक बहुत बड़ा मुस्लिम तबका+किसान+यादव+अन्य कुछ ओबीसी जातियों का समीकरण एक बार फिर साइकिल दौड़ाने को तैयार है,यदि बात कमजोरी की हो तो सैफई महोत्सव+बेरोजगारी +मुजफ्फरनगर दंगे+आपसी लड़ाई+बुलंदशहर रेप कांड+अखलाक मृत्यु+लचर प्रशासन व्यवस्था है। लेकिन इसके इतर यदि सपा विकास का दावा ठोकती है तो वह उसकी तुलना वृद्धा पेंशन+108 एम्बुलेंस+आधुनिक यूपी100+हौसला पोषण योजना+कन्या विद्या धन+लखनऊ मेट्रो+प्रस्तावित कानपुर मेट्रो+आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे+साइकिल पथ+लैपटाप वितरण+मुवावजे जैसे तमाम ठोस विकसित कार्यों से करती है|

ऐसे में समाजवादी पार्टी एक ऐसी मात्र पार्टी है जिसकी संभावना दोबारा सत्ता वापसी में सबसे ज्यादा है पर यह विकास का काम कितना बोलता है यह उ०प्र की जनता तय करेगी|

वहीं तीसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी है जिसका आधार पहले काशीराम और अंबेडकर के आदर्शो पर चलना था लेकिन अब वह सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय की पथ पर है। मायावती की मजबूत पकड़ उसका दलित वोट बैंक है और एक मुस्लिम और सवर्ण का तबका इससे जुड़ा हुआ है,बसपा अपने कार्यों और विकास की तुलना मजबूत प्रशासन व्यवस्था से करती है और मायावती का चेहरा बसपा की एक बड़ी मजबूती भी है,यदि मायावती का समीकरण दलित+मुस्लिम सटीक बैठता है तो बसपा की सरकार बनना तय है,लेकिन इसमें संदेह की बात यह है की 2014 की करारी हार से यह कितना उबर पाई है यह देखने वाली बात होगी,लेकिन बसपा को कमजोर आंकना उचित नहीं है।

वहीं चौथी तरफ कांग्रेस पार्टी है जो अपनी खोती साख को बचाने में जुटी है,कांग्रेस पार्टी से उ०प्र के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार शीला दीक्षित है जो ब्राह्मणों+किसानो का समीकरण के साथ चलना चाहती है और नारा दे रही है ’27 साल यूपी बेहाल’ लेकिन एक असम्ज्हस है की क्या कांग्रेस सपा से हाथ मिलाएगी,और यह उसकी मजबूरी भी है जो भी हो राहुल गाँधी ने खूब खात पे चर्चा की है और किसानो के क़र्ज़ की चिंता भी की है लेकिन क्या यह चिंता उसे वोट दिलाएगी क्यूंकि किसानो का एक बड़ा तबका सपा के भी साथ है वहीँ इसकी कमजोरी भ्रष्टाचार सहित छवि है जिसपे सबसे ज्यदा वार भाजपा ही करती है तो कांग्रेस को इस समय सपा के साथ मिल जाना ही सही होगा|

और बाकी बचे दलों भूमिका केवल 2-4 सीटे जीतना ही होता है जिससे किसी भी तरह शक्तिशाली बना जाये.

कुल मिलाकर देखा जाये तो इस चतुष्कोणीय मुकाबले में(भाजपा,सपा,बसपा,कांग्रेस) यदि सबसे ज्यादा उभरता हुआ चेहरा है तो वह है अखिलेश यादव का और उनकी ताकत उनकी बेदाग छवि और विकास पुरुष की छवि है ,मोदी जी की तरह,वह बार ज़िक्र करते है ‘काम बोलता है,अंजाम बोलता है’ और उनकी पार्टी की मज़बूत पकड़ ग्रामीण क्षेत्रों में है,वहीँ भाजपा का चेहरा खुद प्रधानमंत्री मोदी है जो अपने इमानदार कार्यो और तेज तर्रार देश व्यापी फैसले लेने के लिए जाने जाते है लेकिन क्या वह उ०प्र का मुख्यमंत्री बनना चाहेंगे?

वैसे भाजपा के पास कुछ है नही दिखाने को,बसपा के पास मज़बूत वोट बैंक है ,यह देखना दिलचस्प होगा की इस काँटों की टक्कर में बाजी कौन मारेगा और जो पार्टी इस बार बुरी तरह हारी वह शायद 2019 तक हो सकता है खाड़ी न हो पाए|

तो आप अपने मतदान का उपयोग अपने अनुसार कीजिये|

 

 

 

 

 

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