ज़बरदस्त काम कर रहे हैं ये दो युवा, तैयार कर रहे हैं कल के लीडर

Posted by Vijay Mishra in Hindi, Society
January 9, 2017

संसद शब्द जब हमारे कानों तक पहुंचता है तो लोकतंत्र एवं एक लोकतांत्रिक प्रकिया तथा सरकार की छवि हमारे सामने उभर कर आती है। ठीक उसी तरह बालसंसद शब्द जैसे ही हमारे जेहन में आता है तो हमारे सामने विद्यालयों की लोकतांत्रिक तस्वीर आती है। बालसंसद के ज़रिये हम बच्चों में लोकतांत्रिक मूल्य एवं लोकतंत्र के स्वरुप को देखने लगते हैं। परन्तु एक बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सरकार द्वारा विद्यालयों के लिए संचालित बालसंसद सही मायने में अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रही है?

बाल संसद कि शुरुआत तो विद्यालयों में बड़े ज़ोर-शोर से की गई मगर यह योजना आज विद्यालयों में पूरी तरह से फेल नज़र आती है। यह ठीक उसी प्रकार अठखेलियां करती हुई नज़र आती है, जैसे भारतीय संसद, लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक प्रकिया और सरकार। हम आज तक संसद एवं लोकतांत्रिक मूल्यों को ठीक से समझ नहीं पाए हैं। इसकी वजह भी है, जिस देश की अधिकांश आबादी अपनी दो-जून के रोटी की तलाश में परेशान हो, वहां यह उम्मीद रखना कि ये लोग संसद, लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक मूल्यों तथा संसदीय कार्य प्रणाली से अवगत हों, महज़ बेमानी है।

देश के ‘युवा’ संसद, लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक मूल्यों तथा संसदीय कार्य प्रणाली को ज़रूर समझते हैं। लेकिन आज के युवा इन मूल्यों को लोगों तक ले जाने के मूड में नहीं दिखते। क्योंकि आज के युवा बाज़ारवाद एवं करियरवाद में घिरे हुए हैं एवं खुद के करियर से बाहर न देख पा रहे हैं और न ही समझ पा रहे हैं। ऐसे में बिहार के दो युवा शादान अरफी (किशनगंज) एवं वेदांत मिश्रा (गोपालगंज) ने गाँधी फैलोशिप  में आने के बाद सरकार द्वारा विद्यालयों में चलाई जा रही बालसंसद योजना को BSLDP (बालसंसद लीडरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम) के तहत सशक्त एवं सम्पूर्ण बनाने का बीड़ा उठाया है। ये दोनों राजस्थान के दो जिलों चुरू एवं डूंगरपुर के विभिन्न गांवों में काम कर रहे हैं।

इनके कार्यों को देखने का अवसर मुझे तब मिला जब मैं नववर्ष 2017 की शुरुआत के साथ-साथ महान समाज सेवी सावित्री बाई फुले एवं आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले जयपाल सिंह मुंडा के जन्मदिन के अवसर पर डूंगरपुर राजस्थान के एक रिमोट गांव गुंदीकुआं (बिच्छिवाडा ब्लॉक) गया। यहां इन दोनों के कार्यों एवं समर्पण को देखकर आत्मसंतोष के साथ-साथ सकारात्मक उर्जा का संचार हुआ। सकारात्मक उर्जा तो मेरे अन्दर पहले से भी थी, परन्तु वर्तमान परिदृश्यों को देखकर कभी-कभी डगमगा भी जाता हूं। वर्तमान परिदृश्य में युवा, जो कभी क्रांति एवं समाज को सही दिशा देने के के लिए जाने जाते थे, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को सफल बनाने से लेकर आपातकाल तक की परिस्थियों से निपटने तक में युवाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। परन्तु आज वही युवा उदासीन नजर आते हैं, बंटे हुए हैं जाति एवं क्षेत्र के नाम पर। जबकि ज़रुरत है आत्मनिर्भर बनने एवं आने वाली पीढ़ी के लिए रास्ता तैयार करने की, गांवों को सशक्त बनाने की, खास कर रिमोट एरिया के गांवों को।

सिर्फ विचारधाराओं के चंगुल में फंस कर किसी संस्थान, विद्यालय या विश्वविद्यालय की चारदीवारी के अन्दर नारेबाज़ी करने से हमारी न तस्वीर बदलेगी न तकदीर। अगर कुछ सकारात्मक एवं रचनात्मक होगा तो वेदांत, शादान एवं इनके जैसे हज़ारों युवाओं के प्रयास से जो सच में युवा होने का फर्ज अदा कर रहे हैं। गांवों में आज भी सकारात्मक स्थिति है, ग्रामीण देश को सही एवं सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ते देखना चाहते हैं। ज़रुरत है उन्हें सही दिशा दिखाने की, उनके लिए कुछ करने एवं उनके कंधे से कन्धा मिला कर चलने की।

पिछड़े गांवों में शिक्षा का प्रसार करने में वेदांत, शादान एवं इनके जैसे हज़ारों युवा लगे हुए हैं। बालसंसद को सशक्त एवं प्रभावी बनाने का इनका प्रयास निश्चित ही ग्रामीणों को एवं ग्रामीण बच्चों को सही रास्ते की और प्रशस्त करेगा। उनमें नेतृत्व क्षमता, आंतरप्रन्योरल थिंकिंग पैदा करेगा तथा बालसंसद को विद्यालयों से बाहर निकालकर समुदाय से जोड़ेगा जो आने वाले समय में मजबूत लोकतंत्र की बुनियाद बनेगा और सक्षम नागरिकों का निर्माण करेगा। इस प्रयास हेतु गांधी फेलो वेदान्त मिश्रा और शादान अरफी सहित तमाम युवाओं को शुभकामनाएं जो लग्जरी जिंदगी का त्याग कर गांव-गांव भ्रमण करते हुए एक सशक्त समाज निर्माण का सपना संजो रहे हैं। ऐसे में आपको और हमें इस मुहिम में शामिल होना चाहिए तथा वेदान्त और शादान जैसे युवाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहिए।

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