क्यों बढ़ती जा रही हैं पुलिस हिरासत में मौतें?

Posted by Akshay Dubey Saathi in Hindi, Human Rights, Society
January 6, 2017

विश्व भर में मानवाधिकार के प्रति बढ़ती जागरूकता और मजबूत होती लोकतांत्रिक परम्पराओं के बीच पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें थमने के बजाए साल दर साल बढ़ती जा रही हैं। मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में साल 2010 से 2015 के बीच पुलिस हिरासत में लगभग 600 लोगों की मौत हुई है। 114 पन्ने की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस दौरान हिरासत में किसी भी कैदी की मौत के लिए एक भी पुलिसवाले को दोषी करार नहीं दिया गया है।

हालांकि पुलिस की ओर से इस तरह की मौतों के लिए आत्महत्या, दुर्घटना या बीमारी वजह बताई जाती रही है, लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि ऐसी मौतें अधिकतर पुलिस की प्रताड़ना के कारण होती है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 2015 में पुलिस हिरासत में हुई 97 मौतों में से 67 में पुलिस ने या तो संदिग्ध को 24 घंटे के भीतर मेजिस्ट्रेट के सामने पेश ही नहीं किया या फिर संदिग्ध की गिरफ़्तारी के 24 घंटे के भीतर ही मौत हो गई।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो या एनसीआरबी) के द्वारा जारी किए गए आंकड़े भी इस ओर संकेत करते हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2001 से 2013 के बीच देश के विभिन्न राज्यों में पुलिस हिरासत में 1275 लोगों की मौत हुई थी। जबकि जानकारों का मानना है कि ये आंकड़े भी पूरा सच नहीं कहते, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले मामले दबकर रह जाते हैं। आंकड़ो को लेकर यह विरोधाभास यहां भी देखा जा सकता है जहां एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2001 से 2013 के बीच देश के विभिन्न राज्यों में पुलिस हिरासत में 1275 लोगों की मौत हुई थी। वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2001 से 2010 के बीच एक दशक के दौरान ही 14231 लोगों की मौत हुई है।

एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की ओर से जारी एक रिपोर्ट कहती है कि ऐसे मामलों में आंकड़े सही तस्वीर नहीं दिखाते। इस रिपोर्ट के अनुसार इन आंकड़ों में सशस्त्र बलों के हिरासत में होने वाली मौतें शामिल नहीं हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ऐसी कई मौतों को पंजीबद्ध नहीं करता। कई मामलों में इसे प्राकृतिक व स्वास्थ्यजनित कारणों से हुई मौत करार दे दिया जाता है। छत्तीसगढ़ में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता नंद कश्यप का मानना है कि हमारे पुलिस हिरासत व्यवस्था में पारदर्शिता और न्याय का सर्वाधिक अभाव है, पुलिस कानून आज भी औपनिवेशिक है, जहां प्रत्येक नागरिक को एक जैसी नज़र से नहीं देखा जाता।

वे आगे कहते हैं कि खासकर आदिवासी क्षेत्रों में मुठभेड़ में मरने वाले न्यायालय से सज़ा पाए बगैर ही दोषी ठहरा दिए जाते हैं। जानकारों के मुताबिक अमूमन पुलिस हिरासत में मौतों की सबसे बड़ी वजह पुलिस प्रताड़ना बताई जाती है। जिस पर समय-समय पर अदालतों में भी मामले उठते रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश वी.आर. कृष्णा अय्यर ने पुलिस हिरासत में टॉर्चर को आतंकवाद से भी भयानक अपराध क़रार दिया था, क्योंकि टॉर्चर में हमेशा सरकार व पुलिस प्रशासन का अपना हित छिपा होता है।

संयुक्त राष्ट्र की जनरल असम्बली ने 10 दिसम्बर, 1948 में टॉर्चर को लेकर एक विश्वस्तरीय संधि UNCAT पास की, जिसका मक़सद टॉर्चर को कानूनी रूप से गैर-क़ानूनी बनाया जा सके। इस संधि के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र से संबंधित देश अपने देश में टॉर्चर के समाप्ती हेतु ऐसे कानून लागू करें, जिनके द्वारा टॉर्चर को बेजा क़रार दिया जा सके। यही नहीं, इस पर निगरानी रखने के लिए एक “कमिटी अगैंस्ट टॉर्चर” का भी गठन किया गया। संधि की धारा-22 के तहत कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तिगत शिकायत भी इस कमिटी में कर सकता है। हमारे देश ने भी टॉर्चर के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की इस संधि पर अक्टूबर 1997 में हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन हमारे देश में इसे लागू करने कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया।

समय-समय पर देश भर में पुलिस सुधार, जेल सुधार जैसी मांग भी उठती रही ताकि इस तरह के व्यवहार में कमी लाई जा सके। लेकिन इसका कोई खास असर नहीं हो सका। अदालतों के द्वारा बार-बार फटकार लगाने के मद्देनजर भारत सरकार ने 2008 में “काउंटर टॉर्चर बिल” संसद में प्रस्तुत किया। इसके तहत अगर कोई सरकारी व्यक्ति या पुलिस अगर किसी को गंभीर चोट, जीवन के लिए खतरा, लिंग या स्वास्थ्य को नुक़सान, या किसी भी प्रकार के शारीरिक या मानसिक पीड़ा के लिए ज़िम्मेदार पाए जाते हैं तो वो सज़ा के हक़दार होंगे। साथ ही इसमें यह भी कहा गया कि किसी जानकारी या इकबालिया बयान के लिए भी अगर टॉर्चर का इस्तेमाल होता है तो भी वह सजा के हक़दार होंगे। यह बिल लोकसभा में तो पास हो गया, लेकिन राज्यसभा में कुछ आपत्तियों के बाद फिर 2010 में संशोधित विधेयक के रूप में संसद में पेश किया गया और आज तक यह कानून के रूप में नहीं आ सका।

वरिष्ठ पत्रकार सुदीप ठाकुर कहते हैं कि हिरासत में किसी भी अपराधी या आरोपी की मौत मानवाधिकार हनन का मामला है। यह उस व्यक्ति को न्याय से वंचित रखने का अपराध है। इसका सीधा संबंध पुलिस और न्याय व्यवस्था से है,जहां मानवीय सुधारों की ज़रूरत है। कोर्ट के द्वारा पुलिस प्रताड़ना बंद करने की बात हमेशा दोहराई जाती रही है इसी कड़ी में अभी कुछ समय पहले पुलिस थानों और जेलों में सीसीटीवी लगाने की बात कही गई। महाराष्ट्र हाइकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह छह सप्ताह के भीतर थानों में सीसीटीवी लगाने का इंतजाम करे। लेकिन अदालत के ऐसे निर्देशों को कितनी गंभीरता से लिया जाता है, इसे आप अदालत के इस उदहारण से समझ सकते हैं जिसमें न्यायमूर्ति कानडे की अध्यक्षता वाले पीठ का कहना था कि डेढ़ साल पहले उसने सरकार को आदेश दिया था कि पुलिस थानों में सीसीटीवी लगाए, मगर सरकार इसके प्रति गंभीर नहीं दिखती। साथ ही इस पीठ का यह भी कहना था कि समस्या को सुलझाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो राज्य सरकार इसे कर सकती है, मगर यह प्रतीत हो रहा है कि वह इस बात के प्रति गंभीर नहीं है।

पुलिस सुधार के लिए समय-समय पर बने आयोगों और समितियों सहित विधि आयोग ने भी कई सिफारिशें और सुझाव दिए हैं। पर ये रिपोर्टें अभी तक धूल खा रही हैं। हांलाकि हाल ही में आयोजित पुलिस महानिदेशक सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुलिस को मनोविज्ञान पढ़ाने की बात कही लेकिन जब तक इस ओर गंभीर प्रयास नहीं किए जाएंगे शायद ही स्थिति बेहतर होगी। ऐसे में यह सवाल उठता है कि हमारी सरकार कब गंभीर कोशिशें करेगी कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस का आचरण ऐसा हो जाए कि आम जनता उनसे डरने के बदले खुद को सुरक्षित महसूस करे साथ ही पुलिस हिरासत में यातना दिए जाने की घटनाएं थम जाए।

फोटो आभार: गेटी इमेजेज

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

हर हफ्ते Youth Ki Awaaz हिंदी की बेहतरीन स्टोरीज़ अपने मेल में पाने के लिए यहां सब्सक्राइब करें।